लेखक - देवेन्द्र स्वरूप
3 जनवरी को बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य ने अपनी पार्टी के दैनिक मुखपत्र 'गणशक्ति' के 45वें स्थापना दिवस समारोह में उपस्थित वामपंथी कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि बंगाल के आर्थिक विकास के लिए औद्योगिकीरण आवश्यक है और औद्योगिकीरण पूंजी के बिना सम्भव नहीं है इसिलए हमें पूंजीवाद के रास्ते पर जाना होगा। बुध्ददेव ने कोई नई बात नहीं कही। वे बंगाल विधानसभा चुनाव के पूर्व ही कह चुके थे कि बंगाल में जो कुछ कर रहे हैं वह समाजवाद नहीं, पूंजीवाद है। लेकिन इस बार उन्हें बंगाल के वयोवृध्द नेता ज्योति बसु का भी खुला समर्थन मिला। 5 जनवरी को ज्योति बसु ने माकपा कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि औद्योगिक विकास के लिए हमें देशी व विदेशी पूंजी को आमंत्रित करना होगा। हमारा शासन केवल तीन राज्यों तक सीमित है। पूरे देश में पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर हम काम कर रहे हैं इसलिए हमें भी पूंजीवाद का रास्ता अपनाना ही होगा।
क्या दो शीर्ष माकपाई नेताओं के इन उद्गारों को सोवियत रूस और माओवादी चीन में कई दशाब्दियों लम्बे मार्क्सवादी प्रयोग की विफलता की कारण-मीमांसा और विचार-मंथन में से निष्पन्न वैचारिक परिवर्तन माना जाए या केवल बंगाल में सत्ता में बने रहने की मजबूरी जन्य रणनीति? यदि भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर मार्क्स, लेनिन और माओ की किताबों की तोता रटन्त से आगे बढ़कर सोवियत संघ और चीन के अनुभवों के आलोक में मार्क्सवादी विचारधारा की अवैज्ञानिकता और अपूर्णता को समझने का ईमानदार बौध्दिक प्रयास हुआ होता तो बुध्ददेव और ज्योति बसु के कथनों पर वाममोर्चे के छुटभये घटकों भाकपा, आर.एस.पी. और फार्वर्ड ब्लाक आदि की इतनी तीखी प्रतिक्रिया न होती। यहां तक कि केरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानन्दन इन वक्तव्यों की खुली आलोचना न करते। शायद इस अन्तर्संवाद से बाहर निकलने के लिए ही माकपा महासचिव प्रकाश करात ने बुध्ददेव और ज्योति बसु के वक्तव्यों का समर्थन करते हुए स्पष्ट कर दिया कि यह मात्र रणनीति है, सैध्दांतिक परिवर्तन नहीं। समाजवाद पर हमारी निष्ठा अडिग है, वही हमारा अंतिम लक्ष्य है। केन्द्र में सत्ता में आये बिना हम पूरे भारत को समाजवाद के रास्ते पर नहीं ले जा सकते। उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए रणनीति के तौर पर हम पूंजीवाद को अपना सकते हैं। रणनीति बदल सकती है, लक्ष्य नहीं, सैध्दांतिक अधिष्ठान नहीं। करात ने त्वरित आलोचना के लिए आर.एस.पी. को फटकार भी लगाई।
आर.एस.पी. के नेता के. पंकजाक्षन ने कहा था कि मैंने माक्र्सवाद की किसी किताब में नहीं पढ़ा कि औद्योगिक विकास के लिए पूंजीवाद जरूरी है। पूर्व सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी ने निजी पूंजी के बिना ही औद्योगिक ढांचा खड़ा कर दिया था। माकपा से निष्कासित केरल के एम.वी. राघवन ने, जिन्होंने कम्युनिस्ट माक्र्सवादी पार्टी नाम से नया मंच बनाया है, ज्योति बसु व बुध्ददेव की आलोचना करते हुए कहा कि यदि माकपा समझती है कि समाजवाद का कोई भविष्य नहीं है तो उसे स्वयं को भंग कर देना चाहिए। एक अन्य मार्क्सवादी ने कहा कि माकपा को अपना नाम पूंजीवादी कम्युनिस्ट पार्टी रख लेना चाहिए।
विचारधारा या अंधविश्वास?
भारतीय कम्युनिस्टों में सिंगूर, नंदीग्राम, तस्लीमा, रिजवानुर रहमान आदि प्रसंगों को लेकर जो बहस चल रही है उसे पढ़कर लगता है कि मार्क्सवाद उनके लिए वैज्ञानिक विचारधारा से अधिक एक अंधविश्वास बन गया है। यह अंधविश्वास केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं है तो बड़े-बड़े कम्युनिस्ट बौध्दिकों में भी गहरा बैठा हुआ है। बंगाल सरकार के संरक्षण में माकपाई कार्यकर्ताओं द्वारा नंदीग्राम में किसानों के नरमेध से उद्वेलित राजेन्द्र यादव, जो हंस के संपादक हैं, के इन शब्दों को पढ़िये, 'कुछ लोगों की असफलताओं के कारण छोड़कर विरोधी खेमे में चले जाना हमारा धर्म नहीं है। हमें आज भी वाम-विचारधारा में अटूट विश्वास है, क्योंकि मानव-इतिहास में आज भी वही सबसे विकसित अजेय विचारधारा है। चूंकि सभी विचारधाराओं में वही सबसे वैज्ञानिक है...' (हंस, दिसम्बर, 2007)
यहां सवाल खड़ा होता है कि किसी विचारधारा की वैज्ञानिकता की कसौटी क्या है? मार्क्सवाद का दार्शनिक अधिष्ठान द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को माना जाता है। मानव सभ्यता की मूल प्रेरणा आर्थिक कही गई है। क्या विज्ञान की पिछले डेढ़ सौ साल की प्रगति के आलोक में इस सिध्दांत को वैज्ञानिक कहा जा सकता है? माक्र्स ने मानव सभ्यता की इतिहास यात्रा को आदिम साम्यवाद, दासयुग, सामंतयुग और पूंजीवादी युगों में विभाजित करते हुए भविष्यवाणी की कि पूंजीवाद के विनाश के बीज उसके भीतर ही विद्यमान हैं और अपने चरम पर पहुंचकर वह नए साम्यवादी युग को जन्म देगा। मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद की मृत्यु अवश्यम्भावी है, मार्क्सवादियों को केवल उस दिन को नजदीक लाना है, इसके लिए सर्वहारा को संगठित करके क्रांति का बिगुल बजाना है। माक्र्स की इतिहास दृष्टि यदि वैज्ञानिक होती तो माक्र्सवादी क्रांति को सबसे पहले सर्वाधिक विकसित पूंजीवादी देशों जैसे ब्रिटेन, अमरीका, जर्मनी या फ्रांस में होना चाहिए था। किन्तु इन देशों में मार्क्सवादी क्रांति होना तो दूर, उनका पूंजीवाद ही अब रूस और चीन जैसे कम्युनिस्ट देशों पर हावी हो गया है, माक्र्सवाद को उन्होंने पूरी तरह तिलांजलि दे दी है। माक्र्सवाद की वैज्ञानिकता तो उसी दिन धराशायी हो गई थी जब लेनिन ने असंतुष्ट रूसी सिपाहियों के सहारे सत्ता परिवर्तन को मार्क्सवाद प्रेरित क्रांति का आवरण पहना दिया था। रूस में तब तक पूंजीवाद प्रारंभिक चरण में था, इसके बाद चीन में माओ के नेतृत्व में जब सत्ता-परिवर्तन हुआ तब वहां पूंजीवाद प्रसववेदना से ही गुजर रहा था। माक्र्स ने नारा दिया था दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ। किन्तु आज दृश्य क्या है? उन्हें एकता के सूत्र में बांधने का ठेका जिन मार्क्सवादियों पर है वे स्वयं ही बीसियों टुकड़ों में बिखर गये हैं और प्रत्येक अपने को सच्चा मार्क्सवादी कहता है। क्या किसी वैज्ञानिक विचारधारा के इतने अर्थ हो सकते हैं? वैज्ञानिक सत्य एक होता है, वह सार्वकालिक, सार्वभौमिक होता है।
सच तो यह है कि भारतीय कम्युनिस्टों को माक्र्सवाद की समझ लेनिन, स्टालिन और माओ के रास्ते से मिली है। यदि लेनिन ने रूस के सत्ता-परिवर्तन को मार्क्सवादी क्रांति का आवरण न पहनाया होता और 'सर्वहारा के अधिनायकवाद' के मुखौटे में कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही को स्थापित न किया होता, जार सम्राटों द्वारा निर्मित विशाल रूसी साम्राज्य के अपार साधनों के बल पर अपनी विदेश नीति को विश्व क्रांति का रूप न दिया होता, रूस की जनता को भूखों रखकर मुत प्रचार-साहित्य से पूरी दुनिया को न पाट दिया होता तो शायद माक्र्सवाद कुछ किताबी बौध्दिकों की बहस तक सिमटा रह जाता।
भारतीय कम्युनिस्टों के गहरे अंधविश्वास का ही उदाहरण है कि जब रूस की जनता स्टालिन और लेनिन की व्यक्ति-पूजा को पूरी तरह दफना चुकी है, चीन की जनता और सरकार माओ का नाम तक नहीं लेना चाहती, भारत के कम्युनिस्ट अभी भी लेनिन और माओ का झंडा उठाये घूम रहे हैं। लेनिन की अंध-भक्ति के कारण वे मार्क्सवादी क्रांति का एकमात्र लक्ष्य सत्ता पर कब्जा जमाना समझ बैठे हैं। मार्क्सवादी शब्दावरण में सत्ता को पाना, उस पर टिके रहने को ही वे क्रांति कहते हैं। उनके लिए सत्ता ही क्रांति है, क्रांति का अन्तिम लक्ष्य सत्ता है। रूस और चीन के अनुभवों से यह स्पष्ट हो गया कि कम्युनिस्ट पार्टी का अधिनायकवाद जनजीवन पर राज्य का और राज्य पर अपने शिकंजे को अधिकाधिक सुदृढ़ करता जाता है। मार्क्स के इस कथन को वह पूरी तरह भूल जाता है कि उत्पादन और वितरण के साधनों पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करने का उद्देश्य शोषण विहीन समतामूलक समाजजीवन की आदर्श स्थिति उत्पन्न करना है, यह स्थिति उत्पन्न होने पर राज्य स्वयं ही अस्तित्वहीन हो जाएगा। किन्तु इन दोनों देशों का अनुभव कहता है कि शोषण विहीन समतामूलक जीवन तो वहां खड़ा हुआ नहीं, स्वयं कम्युनिस्ट शासक ही शोषण और विषमता का स्रोत बन गये किन्तु अधिनायकवादी सत्ता-तन्त्र उत्तरोत्तर अपना शिकंजा कसता गया। चीन ने मार्क्सवाद और माओवाद को तो तिलांजलि दे दी किन्तु अधिनायकवाद शासन तंत्र को बनाए रखा है।
औद्योगिक दृष्टि से रेगिस्तान बना बंगाल
सिंगूर-नंदीग्राम और तस्लीमा प्रकरणों के बाद बंगाल में तीस वर्ष लम्बे कम्युनिस्ट शासन का जो रूप सामने आया है उसे देखकर कुछ मार्क्सवादी बुध्दिजीवी और कलाकार भी चिललित हो उठे हैं। संसदीय लोकतंत्र के चौखटे के भीतर शासन करने वाले दल का चरित्र इतना हिंसक, भ्रष्टाचारी और सत्ताप्रेमी हो सकता है, यह वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे। किन्तु इसके लिए वे बंगाल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को ही दोषी मान रहे हैं, किन्तु मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति अपनी अडिग निष्ठा का ढिंढोरा पीट रहे हैं। कई बार भारतीय कम्युनिस्टों की मार्क्सवाद के प्रति अंध श्रध्दा और व्यक्ति पूजा को देख कर उस मुस्लिम मानसिकता का स्मरण हो आता है जो इस्लाम के नाम पर होने वाली प्रत्येक हिंसा और बर्बरता को गैर इस्लामी कह कर अपना समाधान कर लेता है और मुस्लिम मानसिकता के दो मूल स्रोतों- कुरान और पैगम्बर मुहमद के प्रति अन्ध श्रध्दा लेकर चलता है, उनकी तनिक भी आलोचना सहन नहीं कर पाता। इसी प्रकार भारतीय कम्युनिस्ट मार्क्स के प्रत्येक शब्द को अन्तिम सत्य मान कर चलते हैं, और प्रत्येक उलझन के समय माक्र्स या लेनिन के उध्दरणों की तोता रटन्त करते रहते हैं।
क्या प. बंगाल का अनुभव यह बताने के लिए पर्याप्त नहीं है कि कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियनवाद ने बंगाल को औद्योगिक दृष्टि से रेगिस्तान बना दिया और अब सत्ता में टिके रहने की मजबूरी ने माकपाई मुख्यमंत्री बुध्ददेव को पूंजी आकर्षित करने के लिए ट्रेड यूनियनवाद पर अंकुश लगाने को बाध्य कर दिया है। नंदीग्राम पर 10,000 पार्टी कैडरों की फौज के आक्रमण और पाशविक बल के द्वारा वहां की जमीनों और घरों पर कब्जा करने की घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल में शासन-तंत्र और पार्टी का भेद मिट चुका है शासन-तंत्र और पार्टी तंत्र एक रूप हो चुके हैं और मिलकर जनता का उत्पीड़न व शोषण कर रहे हैं। इसे पार्टी अधिनायकवाद नहीं तो क्या कहें? यह अधिनायकवाद जनता के लिए नहीं, केवल पार्टी के लिये है। इसके कारण पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार और विलासिता को बढ़ावा मिला है। दिल्ली से प्रकाशित मेल टाइम्स (8 जनवरी) में आलोक बनर्जी ने पार्टी सूत्रों से अपने सम्बंध के आधार पर जानकारी दी है कि बंगाल में माकपा चुनावों पर 200-250 करोड़ रुपए की विशाल धनराशि खर्च करती है। 30 वर्ष लम्बे कम्युनिस्ट शासन की अजेयता से आतंकित उद्योग और व्यापार क्षेत्र उन्हें खुलकर पैसा दे रहा है। राज्यभर में पुराने जीर्ण-शीर्ण कार्यालयों का पुनर्निर्माण पंच सितारा भवनों में हो गया है। सुदूर गांवों में भी तीन मंजिले भवन बन गये हैं। जो कामरेड तीस साल पहले साइकिलों पर चला करते थे, वे अब एयर कन्डीशन्ड गाड़ियों में घूमते हैं। नंदीग्राम नरमेध के बाद मीडिया ने पार्टी के चरित्र को पूरी तरह नंगा कर दिया है। जिससे बंगाल का मध्यम वर्ग उद्वेलित हो उठा है। उधर कट्टरपंथियों के दबाव में तस्लीमा को राज्य से खदेड़ने के निर्णय ने पार्टी के छद्म सेकुलरवाद और उदार चेहरे पर से नकाब उठा दिया है। नंदीग्राम में मुस्लिम बहुसंख्या होने के कारण वह प्रश्न भी मुस्लिम प्रश्न बन गया है। सच्चर रपट में भी बंगाल के मुसलमानों की स्थिति खराब बतायी गई है। इस प्रकार नंदीग्राम, तस्लीमा, सच्चर रपट और रिजवानुर कांड ने माकपा के सामने 20 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक को बचाये रखने की गंभीर समस्या खड़ी कर दी है। मेल टाइम्स की रपट के अनुसार माकपा सांसद मुहम्मद सलीम ने पार्टी कामरेडों की बंद कमरे की मीटिंग में चेतावनी दी कि यदि हमने इस्लाम की आलोचना की तो मुसलमानों के वोट नहीं मिलेंगे। मुख्यमंत्री बुध्ददेव भी इस बात से सहमत थे।
अधिनायकवाद
इसलिए बंगाल में सत्ता को टिकाए रखने की त्रिसूत्री रणनीति बनाई गई है। एक तो बंगाली मध्यम वर्ग को शान्त करने के लिए औद्योगिक विकास में तेजी की जाए। उसके लिए देशी-विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए पूंजीवाद का उद्धोष किया जाए। दूसरे, मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने के लिए कट्टरपंथी मुस्लिम नेतृत्व को प्रसन्न किया जाए। तीसरे, विपक्ष में एकता न पैदा होने दी जाए। हाल ही में सिंगूर से कुछ किलोमीटर दूर स्थित बालागढ़ उपचुनाव में, जो माकपा का परंपरागत गढ़ रहा है, माकपा बड़ी मुश्किल से सीट बचा पायी, जीत का अन्तर बहुत कम हो गया। यदि वहां विपक्ष ने एक्यबध्द होकर मजबूत प्रत्याशी खड़ा किया होता तो माकपा की हार सुनिश्चित थी। इतने पर भी माकपा की साख कमजोर हुई है। वाम मोर्चे के घटक उसे आंखें दिखाने लगे हैं। ममता बनर्जी की ओर झुकने लगे हैं। किन्तु बंगाल में विपक्षी एकता सोनिया पार्टी व भाजपा के बिना पूरी नहीं मानी जा सकती। सोनिया पार्टी केन्द्र में सत्ता खोने के भय से माकपा को नाराज नहीं करना चाहती और भाजपा के प्रति मुस्लिम मन में इतना जहर भर दिया गया है कि संयुक्त मोर्चे में भाजपा के प्रवेश करते ही माकपा का प्रचार तंत्र मुस्लिम भावनाओं को भड़काने में जुट जाएगा। वोट बैंक राजनीति के इन अन्तर्विरोधों से कैसे पार पाया जाए, राष्ट्रीय एकता के उपासकों के लिए यही आज चिन्ता का मुख्य विषय है। बंगाल को माकपा के भ्रष्ट अधिनायकवाद से मुक्त कराने के लिए तात्कालिक दलीय स्वार्थ से ऊपर उठकर दूरगामी रणनीति ही आज की आवश्यकता है।
इसके साथ ही चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर कम्युनिस्ट बुध्दिजीवियों के सामने बौध्दिक चुनौती खड़ा करने की बड़ी आवश्यकता है। बौध्दिक क्षेत्र में माक्र्सवाद पैसा, पद, प्रतिष्ठा और सुविधाएं दिलाने वाली गिरोह बन्दी का पर्याय बन गया है। जन जीवन से कटे, बुध्दि-विलास में मगन वामपंथी बौध्दिक मार्क्स की व्यक्ति-पूजा और पार्टी अनुशासन के प्रति अंधनिष्ठा से बंधे हुए हैं। मार्क्सवाद को लेनिन का मुख्य योगदान यह रहा कि उसने 'सर्वहारा के अधिनायकवाद' को 'लोकतांत्रिक केन्द्रवाद' के शब्दाडम्बर में 'पार्टी अधिनायकवाद' का रूप दे दिया और 'पार्टी कभी गलत नहीं हो सकती' जैसे सूत्र वाक्य के द्वारा पार्टी को भगवान की जगह बैठा दिया। इसलिए बड़े श्रेष्ठ मार्क्सवादी बुध्दिजीवी भी मार्क्स या लेनिन के वाक्यों की तोतारटन्त में शर्म अनुभव नहीं करते और बौध्दिक अहंकार में चूर रहते हैं। अंध भक्ति और अहंकार कितनी दूर तक जा सकता है इसका नमूना राजेन्द्र यादव की इन पंक्तियों में देखिए। वे लिखते हैं :
'सोवियत यूनियन की लाख बुराइयों के बावजूद यह भी सच है कि दुनिया में जहां भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जमीनी संघर्ष हुए हैं उनकी एकमात्र प्रेरणा मार्क्सवाद ही रहा है। ... आज भी लाखों बुध्दिजीवियों और जुझारू जनता की प्राणशक्ति मार्क्सवाद ही है।' (हंस, दिसम्बर, 2007)
कोई राजेन्द्र जी से पूछे कि यदि यही सच है तो बंगाल, त्रिपुरा और केरल के बाहर कम्युनिस्ट पार्टियां जनाधार शून्य क्यों हैं? इस दिल्ली शहर में मार्क्सवादी प्रोफेसरों, पत्रकारों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों की इतनी बड़ी फौज होने के बाद भी दिल्ली नगर निगम में एक सीट जीतने लायक भी जनाधार उनके पास क्यों नहीं है?
Wednesday, January 23, 2008
बंगाल में पूंजीवाद या रावण का स्वर्ण मृग?
Friday, January 18, 2008
रंगनाथ मिश्रा आयोग के पीछे का राजनैतिक षडयंत्र
लेखक: डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
भारत सरकार भारतीय मजहबों को त्याग कर ईसाई और मुसलमान समाज में चले गए व्यक्तियों की जाति तलाशने के काम में जुटी हुई है। लेकिन समस्या यह है कि इस देश में जोर जबरदस्ती या लालच से भारतीय या हिन्दू समाज के लोगों को इस्लामी समाज के घेरे में लाने की कवायद काफी लंबे अरसे से हो रही है। इसकी शुरूआत मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमणों के पहले ही शुरू हो गई थी। ये लगभग सातवीं-आठवीं शताब्दी की घटनाएं हैं। उसके बाद लोदी, खिलजी, गुलाम, तुगलक और मुगल जैसी अनेक इस्लामी सल्तनतें इस देश में स्थापित हुईं और हिन्दू समाज से इस्लामी समाज की होर जाने का सिलसिला भी चलता रहा। इस्लामी समाज में जाति व्यवस्था नहीं है। इसलिए पंथ परिवर्तन के बाद उनकी जाति इस्लामी समाज में ही विलीन हो गई। यही प्रक्रिया बाद में भारत में पुर्तगाल, डच और अंग्रेजों के आने के बाद ईसाई समाज की स्थापना में हुई। हिन्दू समाज या भारतीय समाज के लोग ईसाई समाज में भी जाने लगे और वहां भी जाति व्यवस्था न होने के कारण उनकी पूर्व जाति ईसाई समाज में ही विलीन हो गई। यह तेरह शताब्दियों की कथा है और 13 शताब्दियों से निरंतर चल रही है।
21वीं शताब्दी में भारत सरकार भारतीय पंथ छोड़कर ईसाई या मुस्लिम समाज में चले गये लोगों की जाति की तलाश कर रही है। आठवीं शताब्दी में मुसलमान बन गए भारतीयों या हिन्दुओं को शायद अब अपनी उस जाति का पता भी नहीं होगा क्योंकि व्यवहार में वह लुप्त हो गई थी। परंतु भारत सरकार उनका पता लगाने के हठ पर अड़ी हुई है और यह हठ भी बड़ा अजीब है। सरकार उनकी जाति का पता लगाकर उनको सरकारी नौकरियों में और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण देने के लिए अड़ी हुई है और आश्चर्य की बात है कि जिन मौलवियों ने और पादरियों ने, इमामों ने और बिशपों ने कभी यह घोषणा की थी कि हमारे समाज में कोई जाति नहीं है। अब वही पादरी और बिशप अपने समाज में जाति तलाश रहे हैं और इतना ही नहीं, जाति है- इसके हठ पर भी अड़े हुए हैं।
इस पूरी रणनीति में सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत सरकार इमामों और बिशपों के साथ खड़ी हो गई हैं। उसने इसी रणनीति के अंतर्गत उडीसा के एक सज्जन रंगनाथ मिश्र, जो कभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्यन्यायाधीश भी रह चुके हैं और बाद में कांग्रेस की कृपा से 6 साल राज्यसभा का सुख भी भोग चुके हैं, की अगुवाई में आयोग की स्थापना कर दी और जैसा कि आशंका थी आयोग ने भारत सरकार की मंशा के अनुरूप ही यह सिफारिश कर दी है कि भारतीय पंथों को त्यागकर इस्लामी या ईसाई समाज में गए लोगों को भी अनुसूचित जातियों के भारतीयों के समान ही आरक्षण मिलना चाहिए।
ऊपर से देखने पर यह लगता है कि ईसाई अथवा इस्लामी समाज की सारी कवायद सरकारी नौकरियों में कुछ चंद स्थान पाने की है या फिर कुछ शिक्षा संस्थानों में कुछ छात्रों के भर्ती हो जाने की है। लेकिन ऊपर से यह षडयंत्र जितना सतही दिखाई देता है भीतर से उतना ही गहरा है। यह एक प्रकार से भारत की राज्यसत्ता पर कब्जा करने के लिए ईसाई और इस्लामी समाज द्वारा रची गई संयुक्त रणनीति है। जिसका संचालन पर्दे के पीछे से सोनिया गांधी और उसके अदृश्य आका कर रहे लगते हैं। मुद्दा अत्यंत स्पष्ट है। एक बार यदि सिध्दांत रूप में इस बात को स्वीकार कर लिया जाता है कि ईसाई अथवा इस्लामी समाज में भी जातियां हैं और उन जातियों में से भी कुछ को अनुसूचित श्रेणी में स्वीकार किया जाता है तो आगे सत्ता पर कब्जा करने के रास्ते अपने आप खुलते जाएंगे। रिकार्ड के लिए रंगनाथ मिश्रा ने पहला अवरोध तो हटा ही दिया है। आयोग ने ईसाई और मुस्लिम समाज में अनुसूचित जातियों की कल्पना को यथार्थ मान लेने का आग्रह किया है।
भारतीय संविधान में, संसद में और प्रदेशों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित किए हैं। यदि ईसाई और मुस्लिम समाज में भी अनुसूचित जातियों की उपस्थिति को स्वीकार कर लिया जाता है तो जाहिर है कि दलित श्रेणियों के लिए आरक्षित लोकसभा और विधानसभा की इन सीटों पर ईसाई या मुसलमान पंथ के लोग भी चुनाव लड़ सकेंगे। ईसाई और मुस्लिम समाज को इससे दोहरा लाभ होगा। वे साधारण सीटों पर तो चुनाव लड़ ही सकेंगे इसके साथ ही वे आरक्षित सीटों पर भी चुनाव लड़ेंगे और जैसी भारत में राजनैतिक कारणों से मौलवी और पादरी की एकजुटता दिखाई दे रही है उसमें यह भी संभव है कि भविष्य में ये दोनों मिलकर एक रणनीति के अनुसार चुनाव लड़ें। केरल जैसे प्रदेश में जहां ईसाइयों और मुसलमानों की संख्या पर्याप्त है वहां इन पंथों के लोगों को यदि अनुसूचित जाति का लाभ भी दिया जाता है तो स्वाभाविक है कि यह मिलकर केरल में सत्ता संभालने की स्थिति में आ सकते हैं । ऐसा प्रयोग कमोवेश असम और पश्चिमी बंगाल में भी किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड भी इस प्रयोग के अनोखे परिणाम दे सकता है। जिन शक्तियों ने अब जब सोनिया गांधी को केन्द्र में स्थापित कर दिया है वही शक्तियां राज्यों में इस्लामी और ईसाई पंथियों को सत्ता केन्द्रों तक पहुंचाने में जुटी हैं। रंगनाथ मिश्र आयोग उसी लंबे षडयंत्र की पहली कड़ी है। यदि इसको प्रारंभ में ही न तोड़ा गया तो भविष्य में इसके भयावह परिणाम निकल सकते हैं।
इसका एक और साइडइफेक्ट भी होगा। भारतीय समाज की दलित जातियों में इससे निराशा उत्पन्न होगी। आज तक उन्होंने इन विदेशी पंथों का जिस साहस और उत्साह से सामना किया है। उसमें निश्चय ही गिरावट आएगी। यह ध्यान रखना होगा कि मुस्लिम आक्रांताओं के खिलाफ जो व्यापक संघर्ष हुए उनमें ज्यादा योगदान इन्हीं तथाकथित दलित जातियों का रहा है। इतने प्रलोभनों और भय के बावजूद दलित जातियों ने अपनी परंपरा और विरासत को नहीं त्यागा। वे व्यापक हिन्दू समाज के भीतर रहकर ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती रही। संकट की इन घड़ियों में इन तथाकथित दलित जातियों के जो बंधु अपनी बिरादरी छोड़कर ईसाई समाज या मुस्लिम समाज में चले गए उन्हें बिरादरी ने हिकारत की नजर से ही देखा। मध्यकालीन युग में तो उनका सामाजिक बहिष्कार भी हुआ। लेकिन दुर्भाग्य से सरकार अब उन लोगों के साथ खड़ी नजर आ रही है जो संघर्ष काल में और संकट काल में अपनी बिरादरी को छोड़ गए थे।
जो संकट में और मुस्लिम आक्रांताओं के काल में और पादरियों के युग में भी अटल खड़े रहे उनके हितों पर सरकार कुठाराघात कर रही है। इससे संकट काल में लड़ने का भारतीय समाज का संकल्प टूटेगा और वह हतोत्साहित होगा। इसमें सोनिया गांधी को ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि शायद सोनिया गांधी की भारत में स्थापना ही उस संकल्प को तोड़ने के लिए हुई है जिसके बलबूते भारत आक्रमणों की इन अनेक शताब्दियों को सफलता पूर्वक झेल चुका है। परंतु पंडित रंगनाथ मिश्र को क्या कहा जाए?दुर्भाग्य से भारतीय इतिहास में रंगनाथ मिश्रों की भी परंपरा रही है। (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
अपने ही देश में हुए पराये
कश्मीर घाटी में पहले छोटे-बड़े गैर मुस्लिम व्यापारियों को भगाया गया, फिर सदियों से रह रहे कश्मीरी पंडितों को खदेड़ा गया, अब पिछले दिनों गैर कश्मीरी मजदूरों पर गाज गिराई गई जो अभी भी निरंतर जारी है। जैस ए मुहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों ने घाटी में रह रहे गैर कश्मीरी श्रमिकों को एक सप्ताह के अंदर-अंदर घाटी छोड़ने का अल्टीमेटम दिया है। इस अल्टीमेटम के पश्चात गैर-कश्मीरी श्रमिकों में भगदड़ सी मच गइ। उनका बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो चुका है। घाटी से बाहर जाने वाली बसों में जगह पाने के लिये श्रीनगर बस स्टैंड पर गैर कश्मीरी श्रमिकों की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं।
एक ओर गैर कश्मीरी-श्रमिकों को भगाने की मुहिम है, दूसरी ओर पर्यटकों पर जानलेवा हमले हो रहे हैं। श्रीनगर में एक पर्यटक बस में धमाका किया गया, जिससे चार गुजराती, जो घाटी में सैर करने के लिये आये थे, मारे गये। अमरनाथ यत्रियों पर भी निशाने साधे जा रहे हैं। कश्मीर में गैर-कश्मीरी श्रमिकों की संख्या लगभग तीन लाख है। वे पिछले कई वर्षों से कश्मीर की अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बने हुए हैं। आतंकी संगठनों के अल्टीमेटम के पश्चात इनका घाटी में रहना अत्यंत कठिन होता जा रहा है। श्रीनगर रोड ट्रांसपोर्ट सर्विस के एक अधिकारी के अनुसार अब तक हजारों गैर कश्मीरी श्रमिक घाटी छोड़ चुके हैं। गैर-कश्मीरी श्रमिकों को भगाने का जहरीला अभियान तो सर्वप्रथम हुरियत के सैयद गिलानी ने दिया था, जैश और हिजबुल ने इसे हवा ही नहीं दी बल्कि इस को तुरंत लागू करवाने के लिये फतवा भी निकाल दिया।
घाटी में गैर-कानूनी श्रमिक निर्माण कार्यों से जुड़े हुए हैं, रेहड़ियों पर दैनिक उपयोग में आने वाली चीजें और साग-सब्जी बेचकर अपना पेट पालते हैं। यह सब आतंकवादियों को स्वीकार नहीं क्योंकि उनकी नजर में यह गरीब लोग अमीर कश्मीरियों को लूट रहे हैं। क्षेत्रवाद की यह समस्या कश्मीर घाटी में तो है ही असम में भी गैर असमियों के विरूध्द अभियान जारी है। गैर असमियों की हत्याएं हो रही हैं उनका अपहरण हो कर फिरौतियां वसूली जा रही हैं और उन्हें राज्य से पलायन के लिये विवश किया जा रहा है। सबसे अधिक निशाने पर वहां बिहारी श्रमिक और मारवाड़ी सेठ हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों नागालैंड और मिजोरम में जहां ईसाइयों का बोलबाला है वहां भारत के किसी दूसरे राज्य से आया व्यक्ति न तो घर बना सकता है और न ही मंदिर आदि। जो लोग वहां रहते भी हैं वे अपमान और प्रताड़ना का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दीवाली जैसे त्यौहार मनाने का कोई भी साहस नहीं कर सकता। महाराष्ट्र में शिवसेना उत्तर भारतीयो को भगाने के लिये झंडा उठाए फिर रही हैं।
फिर भी हम अपने आप को धोखा देकर यह दावा कर रहे हैं कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, असम से कटक तक भारत एक है जब कि कटु सत्य यह है कि भारत महान के कई क्षेत्रों में भारतीय परायो की तरह रहे हैं या फिर उन्हें पराया बना दिया गया है। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? केवल हमारी सरकार। काश! पंडित नेहरू ने जम्मू-कश्मीरी को विशेष दर्जा देने की शेख अब्दुल्ला की मांग के आगे नतमस्तक होने से पूर्व इसके दूरगामी दुष्परिणामों की कल्पना की होती। यदि कांग्रेस सरकार की मूर्खताओं को बाद में आने वाली सरकारों ने कुछ सुधार लिया होता तो शायद लोग अपने ही देश में पराये नहीं हुए होते।
पिछले कुछ समय से पी.डी.पी. यह मांग करती आ रही है कि जम्मू-कश्मीर से सेना हटाई जाये। बाद में मुफती और उनकी पुत्री महबूबा ने यह भी धमकी दे डाली कि केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से सेना नहीं हटाई तो वे गठबंधन सरकार से बाहर निकल आयेगी। पी0डी0पी0 की इस मांग तथा धमकी पर सभी को हैरानी हुई थी क्योंकि सबसे पहले यह बात पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ ने उठाई थी और उसके बाद हुर्रियत का गरमपंथी अलगाववादी ग्रुप यह मांग उठाने लगा और अब पी0डी0पी0 ने भी उनके स्वर में स्वर मिलाना शुरू कर दिया है। उसके चार मंत्री 28 फरवरी से तीन माह तक प्रदेश कैबिनेट की बैठकों का बहिष्कार करते रहे।
प्रदेश की सुरक्षा स्थितियों को देखते हुये भाजपा, नेशनल कान्फ्रैंस, पैंथर्स पार्टी तथा बड़ी संख्या में लोग वहां से सेना तथा सुरक्षा बलों को हटाए जाने के विरूध्द आवाज उठाते रहे हैं। गठबंधन सरकार बनाये रखने के चक्कर में पी0डी0पी0 की इस मांग के सामने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का स्टैण्ड कुछ स्पष्ट न होने के कारण समस्या को और जटिल बना दिया है। हां! कुछ दिन पूर्व वहां के मुख्यमंत्री गुलाम नवी आजाद ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रदेश की सुरक्षा आवश्यकताओं को देखते हुए सेना हटाना उचित नहीं है। एक तरफ पी0डी0पी0 नेता अपनी सुरक्षा बढ़ाने की मांग करते हैं। भारतीय नेताओं का यह दोहरा व्यवहार कब तक चलेगा?
स्थितियां विषम होने तथा उनसे देश को पहुंचने वाली हानि को देखते हुए कोई भी सरकार बड़े संकोच के साथ सेना तैनात करती है। सेना तथा सुरक्षा बलों के जवान बड़े परिश्रम से स्थितियों पर नियंत्रण करते हैं, आतंकवादियों तथा घुसपैठियों की धर-पकड़ करते हैं तथा इस काम में बहुत से जवान शहीद तथा घायल होते हैं। जब वे स्थिति नियंत्रण करने में सफल होते हैं तो सेना हटाओ की मांग जोर पकड़ने लगती है, हालात बिल्कुल ठीक हो जाने पर लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेना का हटाया जाना ही उचित है परन्तु उससे पूर्व नहीं।
जिस प्रकार माओवादियों ने नेपाल में अपने पैर जमा लेने के बाद नेपाल की सीमा से लगते हुए भारत के 14 जिलों तथा अन्य 23 जिलों में भी पैर पसारना आरंभ कर दिया है, आगामी समय के लिये यह एक खतरे की घण्टी लग रही है। कुछ जिलों में समांतर सरकार चलाने का माओवादियों का खेल शुरू हो चका है। गांव-गांव में समस्त पुरूषों को जंगलों में ट्रेनिंग के लिये ले जाना माओवादियों के लिए आम बात हो गई हैं। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, विहार आदि में माओवादी, असम, नागालैंड, अरूणाचल, मिजोरम आदि ने क्रिश्चियन मिशनरी तथा माओवादी तथा नेपाल-बंगलादेश अदि को केन्द्र मानकर पाकिस्तान की आई0 एस0 आई0, जैश ए मुहम्मद तथा हिजबुल आदि तथा अन्य प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्रों द्वारा भारत को तोड़ने की कई कोशिशें युध्दस्तर पर चल रही हैं। इन कोशिशों के साथ-साथ चीन की विस्तारवादी-साम्राज्यवादी शक्ति भी तिब्बत पर काबिज होने के पश्चात तथा 1962 में भारत पर हजार वर्गमील क्षेत्र अपने अधीन करने के पश्चात अब उसकी नजर उत्तरपूर्व के पांचों राज्यों पर दिख रही है। पिछले दिनों अरूणाचल के एक भाग में चीन की सेना घुस आई थी। भारत की प्रतिरक्षा क्षमता अब कुछ ठीक होने के कारण वो वहां से खदेड़ दिये गये परन्तु चीन ने नक्शे के उस भूभाग को अपना क्षेत्र दिखाकर भारत को आगाह कर दिया है। चीन स्पष्ट रूप से कहता रहा है कि तिब्बत (हथेली) को प्राप्त कर लिया है अब उसे हथेली के साथ लगी पांच उंगलियां (असम, नागालैंड, अरूणाचल, मिजोरम, त्रिपुरा) को भी प्राप्त करना है। क्या भारत मां के अंग कटने का यह क्रम कभी समाप्त होगा या जैसे ब्रह्म भारत गया व्रहद् भारत गया, 1947 का भारत गया, 1962 का भारत गया, अब क्या कश्मीर, उत्तरपूर्व तथा अन्य कई भाग जाने को तैयार नहीं बैठे? क्या केन्द्र की कोई सरकार इन प्रश्नों का उत्तर देगी? शायद नहीं। इनके पास कुछ उत्तर होता तो शायद यह सारे प्रश्न आज खड़े ही न होते।
कश्मीर घाटी तथा बाद में जम्मू प्रांत में हुए हिन्दुओं के पलायन से, अब पिछले दिनों नागालैंड से निकाले गये भारतीयों से तथा माओवादियों के प्रभाव वाले क्षेत्र से हो रहे पलायन से तथा आईएसआई के खतरनाक इरादों से और कुछ दिन पूर्व अलकायदा द्वारा कश्मीर में जारी एक टेप से तथा भीतर में पनप रहे कई प्रकार के असंतोष से निपटने के लिये केन्द्र में एक राष्ट्रवादी सोच तथा दृढ़ संकल्प वाली सरकार ही इन प्रश्नों का उत्तर शायद दे पाये। (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)
Thursday, January 17, 2008
मार्क्सवादियों की हिंदी मंडली
लेखक- शंकर शरण
अभी किसी संगोष्ठी में एक जाने-माने हिंदी मार्क्सवादी ने कहा कि दुनिया में हर जगह सबसे बड़े राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट ही हुए हैं। यह भी कि हर राजनीतिक प्रणाली तानाशाही होती है अत: कम्युनिस्ट शासनों को अलग से तानाशाही कहना ठीक नहीं। उनके अनुसार मार्क्सवाद का लक्ष्य वही था जो पहले भारतीय शास्त्रों में सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:... के रूप में कहा गया। उन्होंने दस मिनट के अंदर ऐसी अनेक बेजोड़ बातें कहीं। इससे पता चलता है कि आखिर हिंदी वाले मार्क्सवादी कैसे बिना किसी शंका-शर्म के मार्क्सवाद का बिल्ला आज भी लहराते हैं क्योंकि उनकी मानसिकता भयंकर अंधविश्वास और घोर अज्ञान में डूबी है। वे मार्क्सीय विचार का म नहीं जानते, मगर प्रतिष्टिंत मार्क्सवादी हैं! इनके ही भरोसे हिंदी के विद्यार्थी मार्क्सवादी या उसके हमदर्द बनते रहे। इस तरह यह अज्ञानी संप्रदाय हिंदी समाज को डुबा रहा है।
-- यह बड़ी मोटी सी बात है कि इस्लाम की तरह मार्क्सीय विचार में भी अंतर्राष्ट्रीयतावाद एक मूल सिध्दांत है। इसमें भी राष्ट्रवाद को सदैव एक दोष या भटकाव माना गया। इसीलिए कम्युनिस्टों की आपसी बहस में राष्ट्रवादी कहलाना गाली जैसा रहा है। कार्ल मार्क्स के शब्दों में, मजदूरों का कोई देश नहीं होता। जब देश ही नहीं, तो देशभक्ति कैसी। लेनिन ने द्वितीय इंटरनेशनल को खारिज कर 1919 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल इसीलिए बनाया था क्योंकि उनके ख्याल में यूरोप की कम्युनिस्ट पार्टियां राष्ट्रवादी हो गई थीं। पश्चिमी में अपने देश के खिलाफ सोवियत संघ के लिए जासूसी करने वाले अधिकांश लोग संबंधित देशों के कम्युनिस्ट ही थे। भारत में भी, कम्युनिस्टों ने 1942 में राष्ट्रीय आंदोलन से द्रोह एवं अंग्रेजों से सहयोग सोवियत संघ को मदद पहुँचाने की चाह से किया। फिर 1943 में (मुस्लिम आत्मनिर्णय का अधिकार कह कर) भारत के विभाजन का मौलिक सिध्दांत कम्युनिस्ट पार्टी ने ही दिया था। उसके लिए गढ़ी गई विस्तृत अधिकारी थीसिस क्या राष्ट्रवाद का दस्तावेज था। उस एक थीसिस ने भारत को जितना तबाह किया, उसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं, किंतु हिंदी मार्क्सवादी इस घोर-सांप्रदायिक अतीत के बावजूद धर्म-निरपेक्ष हैं! भारतीय कम्युनिस्टों के लिए 1942 और 1943 कोई पहला या अंतिम राष्ट्र-विरोधी कारनामा नहीं था। उससे पहले भी उनकी नीतियाँ कोमिंटर्न या स्तालिन के कहने पर तय होती थीं।
-- राष्ट्रीय नेताओं या कांग्रेस का चरित्र हमारे कम्युनिस्ट अपनी अक्ल से नहीं, अपने रूसी या ब्रिटिश कामरेडों की बुध्दि से तय करते रहे। पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही कम्युनिस्ट भी काम करते थे। उससे वे निकाले क्यों गए। इसलिए कि कोमिंटर्न की लाइन के अनुरूप वे छल से कांग्रेस का नेतृत्व हड़पने के लिए उद्योग कर रहे थे, न कि राष्ट्रीय आंदोलन को मदद देने के लिए। इसी तरह 1962 में चीनी आक्रमण का बचाव करने के लिए ही कम्युनिस्ट पार्टी विभाजित हुई। जो लोग अलग होकर माकपा (सीपीएम) बने, उन्होंने कम्युनिस्ट अंतर्राष्ट्रीयता के नशे में नेहरू सरकार को ही दोषी बताया। यह न मानने के कारण ही भ
