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Thursday 29 January 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-1)

चुनाव आयुक्‍त के अनुसार, लोकसभा चुनाव आगामी अप्रैल-मई में आसन्‍न है। संप्रग सरकार ने केन्द्र में पौने पांच साल पूरे कर लिये हैं। इस दौरान आम जनता की बुनियादी आवश्‍यकताओं की पूरी तरह से अनदेखी हुई हैं। आर्थिक कुप्रबंधन, संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन, किसानों की दुर्दशा, राष्‍ट्रीय आस्था पर आघात, देश के विभाजन का कुप्रयास, बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ और भ्रष्‍टाचार तो मानों इस सरकार की पहचान बन गई है। वहीं यूपीए सरकार के साथ चार वर्षों तक सत्ता की चाशनी में डूबे रहे वामपंथियों का जन-विरोधी चेहरा भी बेनकाब हो गया है।

हम यहां संप्रग सरकार की गाथा को सिलसिलेवार 20 भागों में प्रस्तुत कर रहे हैं:


यूपीए सरकार ने अपने शासनकाल के पौने पांच साल पूरे कर लिए है, अत: स्वाभाविक है कि इसकी तुलना पूर्ववर्ती श्री अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से की जानी चाहिए। इन वर्षों में देश किस दिशा की तरफ बढ़ रहा है, यह हम सबके सामने है। एनडीए सरकार में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र एवं 21वीं शताब्दी की महाशक्ति बनाने का संकल्प लिया था। एनडीए सरकार ने उस दिशा में ठोस कदम भी उठाए, जिसके कारण विश्व क्षितिज पर भारत का एक नया स्वरूप उभरकर सामने आया। लेकिन इन पौने पांच वर्षों में यूपीए सरकार ने एक के बाद एक गलत और कमजोर निर्णय लिए, जिसके चलते 2020 तक भारत के विकसित राष्ट्र और महाशक्ति बनने का संकल्प और सपना बिखरता दिख रहा है।

खाद्यान्न सुरक्षा से लेकर आण्विक संप्रभुता तक और महंगाई से लेकर आतंकवाद के भंवर में देश को झोंकने वाली ऐसी सरकार जिसके विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय ही नहीं सेना के सर्वोच्च प्रमुख को भी अपना विरोध व्यक्त करने पर मजबूर होना पड़े, ऐसी सरकार के द्वारा क्या विकसित भारत का स्वप्न साकार हो सकता है? यह प्रश्न आम जनता के मन मस्तिष्क में उमड़ रहा है। अत: स्वाभाविक रूप से देश की जनता इसकी तुलना पूर्ववर्ती एनडीए सरकार से कर रही है।

संप्रभुता की दृष्टि से एनडीए सरकार ने जहां पोखरण विस्फोट करके भारत की संप्रभुता और सम्मान को नई ऊंचाइयां दी थी, वहीं यूपीए सरकार ने नाभिकीय समझौते में हमारी आण्विक संप्रभुता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया।

एनडीए सरकार में अटलजी एक सर्वमान्य लोकप्रिय राजनेता प्रधानमंत्री के रूप में थे। जिन्होंने प्रधानमंत्री पद की गरिमा को बढ़ाया। वहीं वर्तमान यूपीए सरकार ने प्रधानमंत्री पद की गरिमा को गिराया है। यह भविष्य के लिए चिंता का विषय है।

आर्थिक दृष्टि से एनडीए सरकार ने महंगाई पर पूर्ण नियंत्रण रखते हुए सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के साथ-साथ विकास की तेजी का स्वर्णिम अध्‍याय रचा था। वहीं यूपीए सरकार के पौने पांच सालों में महंगाई के हाहाकार से लेकर किसानों की आत्महत्या और एसईजेड नीति के दुरूपयोग ने एक काला अध्‍याय लिख दिया। ''कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ'' का नारा देने वालों का नकाब उतर चुका है।

पूर्ववर्ती एनडीए शासनकाल में समाज के सभी वर्गों के मध्‍य समानता का भाव स्थापित करने का प्रयास किया गया था। वहीं यूपीए सरकार ने इन पौने पांच वर्षों में वोट बैंक के लिए मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों, विश्वविद्यालय और बैंक के कर्जों तक में आरक्षण देने की पहल की। तुष्टिकरण यहां तक बढ़ा कि सेना में मुस्लिमों की गिनती करवाने की पहल प्रारंभ कर सामाजिक ताने बाने को तोड़ने का कुत्सित प्रयास किया गया।

सामरिक और कूटनीतिक दृष्टि से एनडीए सरकार ने कारगिल विजय से लेकर लाहौर घोषणा पत्र तक आतंकवाद और पाकिस्तानी घुसपैठ पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया था। यूपीए सरकार कश्मीर में सेना हटाने से लेकर सियाचीन और सरक्रीक के मुद्दों पर कूटनीतिक तौर पर पूरी तरह विफल हो रही है। वहीं अन्य पड़ोसी देश जैसे नेपाल, श्रीलंका, बंग्लादेश और अफगानिस्तान में आतंकवादी एवं विध्‍वंसक गतिविधियों के कारण स्थितियां बेकाबू हो रही हैं। केन्द्र की यूपीए सरकार मूक-दर्शक बनी हुई है।

सरकार के समय महंगाई नियंत्रण से लेकर राशन, गैस, दूध, फल, सब्जी और नमक आदि तमाम दैनिक उपयोग की वस्तुओं के साथ-साथ आम आदमी का सपना कहे जाने वाला एक अदद मकान भी आम आदमी की पहुंच में था। आज बढ़ती हुई महंगाई और बढ़ती ब्याज दरों से सब कुछ आम आदमी की पहुंच से दूर होता चला जा रहा है। बेलगाम बढ़ती महंगाई से आम आदमी की कमर टूट गई है। लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं।

एनडीए सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों से अलग हटकर कुछ एकदम नये प्रयोग किये थे जैसे राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क परियोजना, आई.टी सेक्टर का विकास, विनिवेश और परमाणु परीक्षण आदि। ये ऐसे अभिनव कार्य थे, जिन्होंने एक नये भारत के स्वरूप की आधारशिला रखी।

भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार के पास भारत के समग्र विकास और एक वैश्विक महाशक्ति बनने की व्यापक दृष्टि थी। एनडीए सरकार भारत की राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में एक युगांतर स्थापित किया था।

इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की एक नई स्थिति बनी। इस प्रक्रिया ने भारत की सामरिक शक्ति को ही विश्व में स्थापित नहीं किया बल्कि अप्रवासी भारतीयों की भारत के साथ भावनात्मक संबंधों को भी व्यावहारिक और देश के प्रगति के लिए एक आर्थिक माध्‍यम के रूप में स्थापित किया। इसके साथ एनडीए सरकार ने टेक्नालॉजी के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की, खाद्यान्न और कृषि के क्षेत्र में अग्रणी हो गये और सभी चुनौतियों को पार करके भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में विश्व के सामने आया। कोई भी देश केवल सामरिक शक्ति के द्वारा सैन्य महाशक्ति नहीं बन सकता। उसके लिए कूटनीतिक दक्षता भी परमआवश्यक है। एनडीए के शासनकाल में कूटनीति के धरातल पर हमारी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि हमने पाकिस्तान के साथ भारत की तुलना का युग समाप्त कर दिया।

एनडीए सरकार ने विश्व व्यापार संगठन की सिएटल (1999) और दोहा (2001) के माध्‍यम से संपूर्ण विश्व व्यापार पर पश्चिमी देशों और अमेरिका के वर्चस्व को समाप्त किया। विश्व व्यापार संगठन की आंतरिक व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक बनाया। विश्व के इतिहास में पहली बार आर्थिक कूटनीति में भी भारत की विजय हुई। बेहतरीन कूटनीति के चलते भारत स्पष्ट रूप से विश्व की एक सैन्य-आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ।

भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार के समय में आदरणीय अटल जी के नेतृत्व में भारत सिर्फ एक हार्ड पावर या सैन्य-आर्थिक शक्ति ही नहीं बल्कि एक सॉफ्ट पावर या सौम्य-सांस्कृतिक शक्ति के रूप में भी विश्व के सामने उभर कर आया। भारत की वास्तविक शक्ति का समग्र रूप से उदय प्रारंभ हुआ था। यह सच्चे अर्थों में ''भारत उदय'' हो रहा था।

कई बार राजनीति में जनमानस तक संदेश को पहुंचाने में वर्षों का समय लग जाता है। यूपीए के इस पौने पांच साल के कुशासन को अनुभव करने के बाद देश का जनमानस एनडीए के शासन द्वारा भारत के वास्तविक उदय के प्रयासों की सार्थकता को अब बेहतर तरह से समझ रहा है।

आम जनता अब यह समझने लगी है कि ''आम आदमी का हाथ कांग्रेस के साथ'' जैसा नारा आम आदमी के साथ विश्वासघात है। कांग्रेस ने आम जनता को धोखा दिया है। केन्द्र की यूपीए सरकार ने भारत की आत्मा की सदैव उपेक्षा की है। वोट बैंक की राजनीति का घिनौना खेल खेल रही है। यूपीए सरकार चार वर्षों तक वामपंथियों की ताल पर ''ता-ता, थैय्या'' करती रही है।

इस कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र में तथा निर्वाचन के बाद न्यूनतम साझा कार्यक्रम में किए गए किसी भी वादे को निभा नहीं पाई है।

आज यूपीए के शासन में यदि विकास की थोड़ी बहुत झलक कहीं दिखाई भी पड़ती है तो ये पूर्ववर्ती एनडीए सरकार की इसी आधारशिला का विस्तार मात्र है। आज की यूपीए सरकार से जनता पूछ रही है कि इन पौने पांच सालों में उसने एक भी नया प्रयोग विकास कार्य के लिए किया है? यदि किया है तो देश को बतायें। सच तो यह है कि उपलब्धियों के नाम पर वर्तमान केन्द्र की यूपीए सरकार की झोली खाली है इन साढ़े चार वर्षों में कांग्रेसनीत यूपीए सरकार चार उपलब्धियां भी गिना पाने में असमर्थ है।

क्रमश:

3 comments:

चन्दन चौहान said...

सही विश्लेषण है

नीरज कुमार दुबे said...

bhaisaheb maan gaye, zabardast vishleshan hai. aapne tathyon sahit apni baat ko pramukhta se saamne rakha hai. nischit roop se aapne jo kadi shuru ki hai woh padhne or sangrahniya yogya hogi. Is safal lekh ke liye bahut-bahut badhai. sarkar ki kargujarioyon se janta ko avgat karakar aap waqai ek badhiya kaam kar rahe hain. Jai Hind.

Neeraj Kumar Dubey

aarya said...

संजीव जी
नमस्कार!
अभी आपने यूपीए के कृत्यों का नही के बराबर चित्रण किया है, अभी तो यह शुरुआत लगाती है. आशा है की आप इसे अंजाम तक पहुंचाएंगे .
रत्नेश त्रिपाठी
ईतिहास संकलन योजना, झंडेवाला, न्यू दिल्ली