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Friday, 30 January, 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-2) / बेलगाम महंगाई

यूपीए की असफलताएं (भाग-1)

कमरतोड़ महंगाई ने ठंड के मौसम में भी पसीना निकाल दिया है। रोज इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की कीमतों में तो मानो आग लग गई है। आम आदमी जहां रोटी दाल के लिए हलकान है तो सरकार कीमतों पर रोक लगाने में नाकाम साबित हो रही है।

सवाल उठता है कि किसी भी देश के लिए अर्थव्यवस्था की उस मजबूती के क्या मायने हैं जब आदमी को दो वक्त की रोटी भी नसीब न हो पाये? वर्तमान केन्द्र सरकार और अर्थशास्त्रियों के लिए महंगाई सिर्फ आंकड़ों का विषय हो सकता है। पर आम आदमी के लिए तो यह जीवन मरण का प्रश्न है। इस बेलगाम महंगाई ने आम आदमी का बजट ही नहीं जीवन का ढांचा ही चरमरा दिया है।

बढ़ती महंगाई ने पिछले कुछ वर्षों के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। चुनावी वर्ष में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए सारी जुगत कर रही यूपीए सरकार को इस महंगाई ने धरातल पर ला खड़ा किया है। महंगाई ने आम आदमी के सस्ते कर्ज के सपने को तोड़ दिया है। साथ ही यूपीए का चुनावी खेल भी बिगाड़ दिया है। अब तो बड़ी बेशर्मी के साथ कांग्रेस ने भी मान लिया है कि महंगाई बेलगाम हुई है। इससे यूपीए के घटक दलों की नींद भी उड़ गयी है।

केन्द्र की यूपीए सरकार के पौन पांच वर्ष के कार्यकाल में मूल्यों में वृद्धि का सिलसिला लगातार जारी है। वर्ष 2004 में जब यूपीए सत्ता में आयी तभी आम जनता में यह चर्चा चल पड़ी थी कि कांग्रेस की सरकार आ गई है अब महंगाई भी बढ़ेगी। यह चर्चा हर गली चौराहे पर होती थी। लोगों की आशंका भी सच साबित हुई। सत्ता में आते ही मई 2004 में महंगाई जिस तेजी से बढ़ी तो फिर उसने पलट कर नहीं देखा। श्री अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने जिस तरह से महंगाई पर नियंत्रण लगाया हुआ था वह नियंत्रण यूपीए सरकार के कार्यकाल में हट गया और महंगाई तेजी से बढ़ने लगी आम जनता को फर्क साफ नजर आने लगा। 2004 से ही महंगाई का यह जो सिलसिला चला वह 2009 आते-आते सातवें आसमान पर जा पहुंचा है और मूल्यवृद्धि का यह क्रम अभी भी जारी है।

इस बीच कांग्रेस सुप्रीमो व कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की चेयरपर्सन सोनिया गांधी सार्वजनिक तौर पर महंगाई पर चिंता जताने के साथ-साथ प्रधानमंत्री को पत्र लिखने का नाटक करती रही है। यही नहीं कांग्रेस की कार्यसमिति में चिंता व्यक्त करने के अलावा कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की विशेष बैठक भी इस मुद्दे में बुलायी जाती रही है पर नतीजा वही ''ढाक के तीन पात'' वाली कहावत सिध्द कर रही है। नतीजा ''सिफर''। महंगाई थमने के बजाय सुरसा के मुंह की तरह दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है।

इसे देश का सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य कि वर्तमान केन्द्र सरकार के शीर्ष पदों पर अर्थशास्त्र के ज्ञाता विराजमान हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक राजनेता के बजाय अर्थशास्त्री के रूप में ज्यादा पहचाने जाते हैं वहीं साढे चार वर्षों तक केन्द्रीय वित्तमंत्री रहे पी. चिदम्बरम भी अर्थ जगत के अच्छे जानकार माने जाते हैं यही बात योजना आयोग के उपाध्‍यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के बारे में भी कही जा सकती है। फिर भी सरकार की इस ड्रीम टीम को महंगाई का भान तब होता है जब आंकड़े सामने आते हैं। आखिर ये कैसे अर्थशास्त्री हैं जो समय रहते आने वाले संकट के बारे में अनुमान भी नहीं लगा पाते। आर्थिक विकास दर और शेयर बाजार के आंकड़ों पर यह कथित अर्थशास्त्रियों की तिकड़ी अपनी पीठ चाहे जितनी थपथपा ले पर इन पौने पांच वर्षों में महंगाई के मोर्चे पर यह ड्रीम टीम पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।

यूपीए सरकार में मुद्रास्फीति की दर का उच्चतम स्तर पर पहुंचना वर्तमान केन्द्र सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा है। आज यदि महंगाई चौतरफा मार करती दिख रही है तो इसलिए कि केंद्र सरकार न तो भावी अंतर्राष्ट्रीय माहौल का आकलन कर सकी और न ही घरेलू हालात का। यदि खाद्यान्न की कीमतें काबू में होतीं तो महंगाई के असर को कम किया जा सकता था। ऐसा इसलिए नहीं हो सका क्योंकि अर्थशास्त्रियों से लैस केंद्रीय सत्ता ने यह अनुमान लगाने की दिलचस्पी तक नहीं दिखाई कि आने वाले समय में खाद्यान्न की पर्याप्त उपज होगी या नहीं? समस्या इसलिए और अधिक बढ़ गई, क्योंकि खाद्यान्न आयात के फैसले लेने में अनावश्यक देर की गई। पिछले कुछ दिनों से महंगाई के पीछे जमाखोरों और बिचौलियों की भूमिका का जिस तरह जिक्र होने लगा है उससे तो यह लगता है कि हर कोई केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का लाभ उठा रहा है। आठ फीसदी आर्थिक विकास दर का गुणगान करने वाली इस केन्द्र सरकार ने कृषि क्षेत्र को एकदम उपेक्षित छोड़ दिया है। गत पौने पांच वर्षों के कार्यकाल में देश के किसानों की पूरी तरह अनदेखी की गई है। किसानों के आत्महत्या का सिलसिला अभी भी जारी है। परन्तु इस कुम्भकर्णी सरकार की नींद अभी भी टूटी नहीं है। फिर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और स्थिर अनाज पैदावार ने भारत को फिर खाद्य संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है।

यह सब केन्द्र की यूपीए सरकार की असफल नीतियों का ही परिचायक है। यही नहीं अब भारत की अर्थव्यवस्था अब एक ऐसे मुकाम पर आ खड़ी हुई है जिससे यूपीए सरकार और उसके घटक दलों के हाथ पांव भी फूलने लगे हैं। महंगाई के कारणों को लेकर सरकार द्वारा समय-समय पर की जाने वाली टिप्पणियां भी उसकी संवेदनशून्यता और दिशाहीनता को ही जाहिर करती हैं। खुद प्रधानमंत्री कभी महंगाई को अर्थव्यवस्था में मजबूती का स्वाभाविक परिणाम बताते हैं तो कभी अंतर्राष्ट्रीय मंदी का नतीजा। इसका मतलब तो यह हुआ कि यूपीए सरकार के बस में कुछ है ही नहीं और यदि वास्तव में ऐसा है तो उसके सत्ता में रहने का औचित्य क्या है? सवाल उठता है कि किसी भी देश के लिए अर्थव्यवस्था की उस मजबूती के क्या मायने हैं जब आदमी को दो वक्त की रोटी भी नसीब न हो पाये? वर्तमान केन्द्र सरकार और अर्थशास्त्रियों के लिए महंगाई सिर्फ आंकड़ों का विषय हो सकता है। पर आम आदमी के लिए तो यह जीवन मरण का प्रश्न है। इस बेलगाम महंगाई ने आम आदमी का बजट ही नहीं जीवन का ढांचा ही चरमरा दिया है।

दरअसल थोक मूल्य सूचकांक की दर भी आम आदमी पर महंगाई की मार का पूरा सच बयान नहीं करती। आम उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में फुटकर बाजार में हाल ही में छह से 25 प्रतिशत तक का उछाल आया है। जीवन-यापन के लिए अनिवार्य वस्तुओं की ही बात करें तो पिछले वर्ष अक्तूबर में सरसों का तेल 65 से 70 रूपये प्रति लीटर था, जो अब बढ़कर 82 से 85 रूपये हो गया है। इसी तरह सोयाबीन या रिफांइड तेल 55-65 रूपये से बढ़कर 96-100 रूपये पर पहुंच गया है। औसत चावल का दाम भी 14-18 रूपये प्रति किलो से उछलकर 18-25 रूपये पर पहुंच गया है तो उड़द दाल का दाम 38-40 रूपये से बढ़कर 46-58 रूपये पर। अरहर दाल 36-40 रूपये से बढ़कर 45-48 रूपये हो गयी है तो गेहूं 9-10 रूपये से बढ़कर 12-14 रूपये। सब्जियों और फलों के दामों में तो और भी ज्यादा उछाल आया है।

कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ यह नारा देकर सत्ता में आई कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की कलई खुल गई है। कांग्रेस (आई) के सत्ता में आते ही आम आदमी पर महंगाई शामत बनकर आई है। कमरतोड़ इस महंगाई से आम जनता को यह समझ आ गया है कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ विश्वासघात है। अब तो आम आदमी भी बस यही दुहाई दे रहा है महंगाई... महंगाई... और बस महंगाई, अब कुछ तो रहम करो मनमोहन भाई।
यूपीए की असफलताएं (भाग-1)
क्रमश:

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