हितचिन्‍तक- लोकतंत्र एवं राष्‍ट्रवाद की रक्षा में। आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

Monday 26 November 2007

माकपा का मुखौटा नंदीग्राम के आईने में- महाश्वेता देवी

मैं वृध्द हो गई हूं। न जाने कब चल बसूं। लेकिन चाहती हूं कि मेरे मरने के बाद योध्दा की मेरी पहचान रह जाए। मैंने जीवनभर कोई युध्द किया है, तो मुख्यत: कलम से। कलम ही मेरा हथियार है और 82 वर्ष की उम्र में मुझे अंतिम भरोसा अपने हथियार पर ही है। कलम के इस हथियार से आज भी युध्द किए जा रही हूं। इसी के साथ नृशंसता का प्रतिवाद भी यथासाध्य कर रही हूं, सड़क पर उतर कर। पहले भी किया है और जब तक जीवित रहूंगी, करती रहूंगी। नंदीग्राम में बुध्ददेव भट्टाचार्य की असामान्य 'कीर्ति' के विरूध्द अभी हमें सड़क पर उतरना पड़ा है। इस प्रसंग पर मैं बाद में आती हूं। पहले बुध्ददेव की असामान्य 'कीर्ति' पर।

क्या आपने टीवी पर नंदीग्राम में 14 मार्च को बुध्ददेव भट्टाचार्य की 'कीर्ति' को नहीं देखा? मैंने देखा। परे बंगाल ने देखा। बुध्ददेव ने 1919 के जलियांवाला बाग के डायर साहब को भी लज्जित कर दिया। माकपा की गुंडावाहिनी ने इस शताब्दी का एक नया इतिहास नंदीग्राम में लिखा। नंदीग्राम आज का जलियांवाला बाग है। नंदीग्राम ने मां, बहनों, भाइयों और पंक्तियों के रक्त से स्नान किया है। टीवी चैनल पर महिलाओं और बच्चों पर गोली चलाने का दृश्य हम सबने देखा है। निरीह और नि:शस्त्र महिलाओं, बच्चों, किशोरों और कि सानों पर अंधाधुंध फायरिंग की गई। यह फायरिंग हत्या के उद्देश्य से की गई, क्योंकि घायलों और मृतकों के पेट, गले, छाती में गोलियां लगी हैं। कई लोगों को काटकर भी मार डाला गया। हताहतों की संख्या सरकारी आंकड़े से बहुत बहु ज्यादा है। नंदीग्राम में नरसंहार के बाद कई लाशें गायब कर दी गईं। नंदीग्राम में पुलिस को रोकने के लिए वहां के आम नागरिकों ने गढ्ढे खोद कर रास्ते काट डाले थे। नरसंहार के बाद उन गढ्ढों में लाशें डाल कर ऊपर से कंक्रीट और सीमेंट से उसे पाट डाला गया। कई लाशें नदी या नहरों में या दूर जंगल में ले जाकर फेंक दीर् गईं। यह सारा कृत्य पुलिस और माकपा कैडरों ने मिलकर किया। कैडर से इतने लोगों की हत्या कराने के बाद भी बुध्ददेव मुख्यमंत्री बने रहेंगे? प्रकाश करात ने कोलकाता आकर फैसला सुनाया। हां, बने रहेंगे। बंगाल माकपा के लोग मेधा पाटकर को बाहरी कहते हैं। मैं पूछती हूं कि जब मेधा बाहरी हैं तो करात बाहरी नहीं है? माकपा की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य विनय कोंगार ने पिछले महीने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मेधा पाटकर बाहरी है। उन्होंने नरसंहार के बाद कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। कुछ स्त्री-पुरूषों के जननांग में गोली मार दी गई। वे नित्‍य क्रियाएं भी नहीं कर पा रहे हैं। क्षत-विक्षत जननांग लेकर क्या ये स्त्री-पुरूष सामान्य जीवन व्यतीत कर पाएंगे? स्त्रियों की इस त्रासदी और नंदीग्राम के नरसंहार के लिए बुध्ददेव जिम्मेदार है। वे हत्यारे हैं। नंदीग्राम के लिए आज एक ही शत्रु है और वह है बुध्ददेव सरकार।

बुध्ददेव अत्याचारी हैं, मानवाधिकार विरोधी हैं। क्या अपनी पुलिस और अपने यह भी कहा था कि मेधा और ममता नंदीग्राम जाएंगी, तो वहां के माकपा समर्थक उन्हें अपना 'पाछा' दिखाएंगे। नंदीग्राम नरसंहार के पहले मेधा पाटकर जब नंदीग्राम गई थीं, तो वहां विनय कोंगार की घोषणा के मुताबिक माकपा के कैडरों ने अपना पैंट खोलकर दिखाया था। नरसंहार के बाद मेधा जब गईं, तब कोई अभद्रता नहीं हो सकी, क्योंकि सीबीआई की टीम नंदीग्राम में मौजूद थी। नरसंहार के दिन जब ममता बनर्जी नंदीग्राम के करीब पहुचीं, तो उनकी गाड़ी रोक कर माकपा के कैडरों ने अभद्र नारे लगाए और उन्हें वापस कोलकाता जाने को कहा। ममता दूसरे दिन नंदीग्राम पहुंच सकी थीं।

मैं दिल्ली और भारत के अन्यान्य इलाकों के वामपंथी बुध्दिजीवियों से पूछना चाहती हूं कि वे नंदीग्राम के नरसंहार और महिलाओं पर अत्याचार पर क्या कहना चाहेंगे? उनकी राय में नंदीग्राम भारत में है या इराक में? नंदीग्राम में नरसंहार के विरूध्द कोलकाता हाईकोर्ट व बंगाल की अन्य अदालतों के वकील स्वत: स्फूर्त ढंग से सड़क पर उतरे। वामपंथी माने जाने वाले बुध्दिजीवी लेखक, कलाकार भी सड़क पर उतरे। नरसंहार के दूसरे दिन ही धर्मतला में लेखकों, कलाकारें ने धिक्कार जुलूस निकाला। ऐसा ही धिक्कार जुलूस 17 मार्च को भी कॉलेज स्क्वॉयर में निकला, जिसमें अपर्णा सेन, गौतम घोष, मनोज मित्र, विभास चक्रवर्ती, रूद्रप्रसाद सेनगुप्त, जया मित्र, सांली मित्र, जय गोस्वामी, नवारूण भट्टाचार्य, कबीर सुमन, प्रतूल मुखोपाध्याय, शुभा प्रसन्न समेत एक हजार से ज्यादा लेखकों, शिल्पियों और बुध्दिजीवियों ने भाग लिया।

मैंने अस्वस्थ होने के बावजूद दोनों जुलूसों में हिस्सेदारी की। लेखकों की दो सभाओं में भी मैं गई। इसके अलावा 19 मार्च को धर्मताला में आयोजित जमाए-ए-उलेमाए-हिन्द की सभा में भी मैंने भाषण किया। जैसा कि मैंने शुरू में कहा- मैं जीवन की सांध्यबेला में भी बुध्ददेव भट्टाचार्य की बर्बरता के विरूध्द युध्द किए जा रही हूं। नंदीग्राम के नरसंहार का प्रतिवाद किए जा रही हूं और जनतंत्र में आस्था रखनेवाले सभी लोगों से उम्मीद करती हूं कि वे भी मेरी आवाज से आवाज से आवाज मिलाकर नारे लगाएंगे बुध्ददेव सरकार, और नहीं दरकार, नंदीग्राम में जिन निर्दोष लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है, वह व्यर्थ नहीं जाएगी। उनकी शहादत से प्रेरणा ग्रहण कर सिंगुर, हरिपुर बारूईपुर, बारासात और राजारहाट के लोग भी जमीन अधिग्रहण के विरूध्द और ताकत के साथ युध्द छेड़ेंगे।

मैं पहले सिंगुर गई थी। यह युध्द भी स्वाधीनता संग्राम जैसा ही है। यह लक्ष्यपूर्ति तक चलता रहेगा। सरकार का कहना है कि नंदीग्राम में प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं थी, इसलिए वहां पुलिस गई। यह सरासर झूठ है। तथ्य यह है कि नंदीग्राम के लो सशस्त्र नहीं थे। इसे टीवी चैनल ने दिखाया है। सशस्त्र थे माकपा के समर्थक। उन्हें एक माकपा सांसद ने हथियार उपलब्ध कराए थे। यह कहना भी गलत है कि नंदीग्राम में पुलिस नहीं जा पा रही थी। खेजुरी से तो नंदीग्राम में सब कुछ आ रहा था। खेजुरी में बैठकर ही माकपा के नेताओं ने नंदीग्राम की कार्रवाई का ब्लू प्रिंट तैयार किया था। उसे ब्लू प्रिंट के अनुसार सुनियोजित तरीके से एक अफवाह फैलाई गई कि नंदीग्राम के माकपा समर्थक काकली गिरी के साथ जमीन उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के लोगों ने बलात्कार किया। इस अफवाह के बाद ही स्थिति को नियंत्रण में करने के नाम पर पुलिस कार्रवाई का फैसला किया गया, लेकिन कार्रवाई के ठीक पहले काकली गिरी एक चैनल पर आई और उन्होंने खुलासा किया कि यह उनके खिलाफ गलत प्रचार किया जा रहा है कि उनके साथ बलात्कार हुआ। काकली ने माकपा को बेनकाब कर दिया। मुझे उम्मीद हे कि सीबीआई भी दूध का दूध और पानी का पानी करेगी और माकपा का मुख और मुखौटा एक बार फिर देश देखेगा।

1 comment:

अनुनाद सिंह said...

क्या महाश्वेता जी आज तक कम्युनिस्टों को अहिंसा का पुजारी मानती रही हैं? मुझे नन्दीग्राम की घटनाओं पर दुख तो होता है किन्तु आश्चर्य नहीं।