हितचिन्‍तक- लोकतंत्र एवं राष्‍ट्रवाद की रक्षा में। आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

Wednesday, 28 November, 2007

कब्रिस्तान के अमन को कैसे कहें कि नंदीग्राम में शांति है

लेखक- नबारूण भट्टाचार्य

अगर कब्रिस्तान के सन्नाटे को 'अमन' कहा जा सकता है तो नंदीग्राम में फिलहाल शांति है। पश्चिम बंगाल के सत्ताधारी वाममोर्चा के प्रमुख घटक माकपा नेतृत्व को यह खामोशी ज्यादा भाती है। ग्रामवासी जिन्होंने अपनी जमीन पर हक के लिए 11 महीने तक संघर्ष किया, अचानक ही माकपा समर्थकों में शुमार हो गए हैं। जब बंदूक की नाल से ताकत निकलती है तो ऐसे में किसी का क्या अख्तियार रह जाता है। यहां तक कि ऐतिहासिक उध्दरण भी 'क्रूर हास्यास्पद' हो सकते हैं। सात नवंबर को रणनीतिक रूप से अहम तेकहाली पुल पर तैनात पुलिस को हटा लेना, सशस्त्र पुलि का अपने को थाना परिसर में ही सीमित कर लेना जबकि गांव के गांव जल रहे हों, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की देरी से तैनाती और 'लिबरेशन' के लिए मिले अंतराल ने 'लोकतंत्र', 'प्रशासन', 'सरकार', 'वाम', 'मानवाधिकार' और 'सपंत्ति' तथा जीने के अधिकार जैसे शब्दों को बातिल और शून्य कर दिया है।

वे लोग जिन्हें नंदीग्राम के नक्शे पर माकपा को बलात् काबिज रखने के लिए जवाबदेही दी गई थी, वे कोई प्रतिबध्द मार्क्‍सवादी काडर नहीं थे। वे परले दर्जे के हत्यारे, डकैत, संहारक हथियारे, डकैत, संहारक हथिचार चलाने में उस्ताद और लोगों की जान मरने या उनका अंग-भंग कर मौके से भाग निकलने में माहिर थे। कोई आश्चर्य नहीं कि अर्जेंटीना से आए फिल्म प्रतिनिधियों को कोलकाता में आयोजित हो रहे फिल्मोत्सव का माहौल दमघोंटू लगा और वे चले गये। हम माकपा महासचिव प्रकाश करात एंड कंपनी की 'माओवादी' भूत वाली कहानी पर भरोसा कर सकते हैं जब तक कि वह लोगों की नजरों में इराक में संहारक हथियार वाली बुश की थ्योरी की तरह फुस्स न हो जाए और छोटा अंगरिया मामले में वर्षों से सीबीआई को वांछित अपराधी सकूल अली वर तपन घोष को नंदीग्राम में मारे गए लोगों और घायलों को ठिकाने लगाते ले जाते रंगे हाथ पकड़ जाने का सच पूरी तरह से उजगार नहीं हो जाता। प्रदेश के गृह सचिव को 13 नवंबर तक यह इलहाम नहीं था कि नंदीग्राम में माओवादी भी मौजूद हैं। इनमें से किसी को पकड़ा भी नहीं गया। किसी को यह बात मालूम नहीं थी लेकिन माओवादियों की कारगुजारियों के बारे में प्रकाश करात बेहतर जानते हैं और इस रहस्य की जानकारी उन्हें सीधो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नारायणन से मिली थी। अगर ऐसा हुआ भी तो यह सोचकर हैरत होती है कि ऐसे समय में जब पाक में आपात्काल का ऐलान हो रहा हो, सुरक्षा सलाहकार के पास इतना फालतू समय फिर भी बच जाता है कि वह नंदीग्राम में माओवादियों को ढूंढ निकाल ले! मैं तो अदना-सा-आदमी हूं और कलम का सिपाही हूं।

हम अपने इस सौभाग्य पर रश्क कर सकते हैं कि हमारे पास गोपाल कृष्ण गांधी के रूप में एक संवेदनशील समीक्षक राज्यपाल हैं, जिनकी बौध्दिक साख एक माक्र्सवादी चिंतक के रूप में बिमान बोस (वाममोर्चे के संयोजक) की तुलना में कहीं ज्यादा है। जैसा कि सभी जानते हैं कि बंगाल के लोग आजादी के बाद से ही ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं के साक्षी रहे हैं जब प्रदेश सरकार और प्रशासन के हर काम में माकपा काडरों की दखलंदाजी चलती है। चाहे प्रेस हो, प्रख्यात सामाजिक नेता या विपक्ष का नेता; किसी को भी वहां घुसने की इजाजत नहीं होती! कानून उनके हाथों उसी तरह बंदी हो जाती है जैसा स्टालिन के जमाने में होता था।

नंदीग्राम में जारी इस खूनी मंजर के बीच कोलकाता में फिल्मोत्सव मनाने का इंतजाम किया गया। जिस दिन शाम को दीप जलाकर फिल्म समारोह का उद्धाटन होना था, उसी दिन दोपहर को नंदीग्राम में विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए जमीन से बेदखल किए जा रहे निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर माकपा के नकाबपोशधारी गुंडे गोलिया बरसा रहे थे। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार तक किए गए। टेलीविजन के चैनलों ने दिखाया कि बुलेट खाए मानव अंगों से रिसते खून से नंदीग्राम की जमीन किस कदर रक्तरंजित हो गई थी। हजारों लोग बेघर हो गए। गांव घर लौटने के बुध्ददेव भट्टाचार्य के आह्वान के बावजूद बहुतों ने अभी जाने को राजी नहीं हैं। मरने वालों की सरकारी संख्या तो सागर में एक बूंद भर है। मृतकों की सही-सही संख्या किसी भी जगह, इतिहास या भूगोल में नहीं बताई जाती। नंदीग्राम भी इस तथ्य का कोई अपवाद नहीं है। यह भी कोई अलहदा नहीं है कि किसी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस अपराधा को अंजाम दिया है, यद्यपि किसी को भी हैरानी हो सकती है कि नरसंहार को अंजाम देने वाला और उसका रक्षक एक ही नामवली कैसे सटीक बैठते हैं। एक बाद खुद कार्ल माक्र्स ने अपने शिक्षण के दौरान कहा था, 'अगर यही माक्र्सवाद है तो ईश्वर को धान्यवाद कि मैं मार्क्‍सवादी हूं।' देश के सभी वामपंथ समर्थकों को इस दार्शनिक के विचारों से अपने को जोड़ना चाहिए। नंदीग्राम के साथ अनोखा यह हुआ कि वहां की हिंसक घटनाएं लोकतांत्रिक संघीय ढांचे में हुई। केन्द्र में बैठे हमारे नेता ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसे होने दिया। इसमें कोई अजूबा नहीं कि परमाणु करार पर भारत अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की बातचीत पर वामदलों ने अपना रवैया नरम कर लिया है और जब नंदीग्राम में विरोधियों से निपटने का काम पूरा हो गया, तो अब केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल को आने की झंडी दी गई।

इन रिकार्डों का एक दिन फैसले के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। नंदीग्राम की हिंसक घटनाओं को लेकर मैं भावनात्मक रूप से काफी उद्विग्न हूं, इसलिए संभव है जहां-तहां तथ्यों की थोड़ी भूल हो जाए किन्तु मुझसे बड़े सच की अनदेखी कदापि नहीं हो सकती। ऐसा नहीं कि लोग मारिचझानपी, नानपुर, केशपरु, गरबेटा आदि जगहों में हुई कारगुजारियों से अनजाने थे, बल्कि तब प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक, मीडिया आज इतना विकसित जनसंचार माधयम नहीं था। सत्ता में बैठे लोग जो यह सोचते थे कि वैश्वीकरण की ताकत जनता की प्रतिरोधा करने की क्षमता कमतर कर देगी, नंदीग्राम की घटना ने उनकी आंखों में उंगली डालकर दिखा दिया कि सच वह नहीं है। नंदीग्राम हिंसा के पश्चात् कोलकाता, दिल्ली, बंगलुरू और अन्य शहरों के सभ्य नागरिक समाज के प्रदर्शनों में जबरदस्त प्रतिरोधा के स्वर बुलंद किए हैं। पश्चिम बंगाल के बुध्दिजीवियों ने यह साबित कर दिया कि वे बिकाऊ नहीं हैं, हालांकि कुछ लोगों ने शैतानों के हाथों अपनी आत्मा बेच दी है। शकारी का साथ देने से अच्छा है खरगोश के साथ दौड़ना। इस बीच बिमान बोस गरजते हैं, 'नंदीग्राम में एक नया सवेरा हो रहा है', तो यह पश्चिम बंगाल के क्षितिज पर एक बड़ा ब्लैक होल बनाता है और यह जल्द ही देश के अन्य हिस्सों को भी अपना ग्रास बना लेगा। टेलीविजन के पर्दे पर उभरता एक चित्र 'नंदीग्राम का उपसंहार' है। एक गाय गोली से बिंधी आंखों से खूनी चीत्कार करती है। बेजुबान मासूम गाय नंदीग्राम की वीभत्स मारकाट का बयान कर जाती है। मैं तो फिलहाल कुछ बोलूंगा नहीं।
(लेखक मशहूर बांग्ला कवि और साहित्यकार हैं)

No comments: