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Tuesday 27 November 2007

वामपंथियों के किले में खून की होली

नंदीग्राम से लौटकर, चंदन मित्रा

आतंक का यह सबसे डरावना चेहरा है। गांव दर गांव औरतों-बच्चों की आंखों से झांकता खौफ। जबान गूंगी हो चुकी है, बुजुर्गों की पसलियां उनकी किस्मत की तरह पढ़ी जा सकती हैं। यह वह जगह है जहां हर घर पर लाल झंडा लगाना जरूरी है। यही है नंदीग्राम-जहां टूटे हुए घरों के पीछे दुबके हैं डरे हुए लोग।

मंगलवार को हम भी यहां थे। यानी राजग का प्रतिनिधिामंडल और मीडिया के लोग। नंदीग्राम में वैसे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) के लोग नहीं दिखते लेकिन स्थानीय निवासियों के चेहरे पर छाया डर यह बताने के लिए काफी है कि सीपीएम और उसका काडर सर्वव्यापी हैं। ज्यादातर घरों पर सीपीएम के लाल झंडे लगे हैं। कई झंडे हाल ही में टंगे हैं। कई जगहों पर हमें सड़क किनारे लाल झंडों के भारी बंडल दिखे। पता चला ये आगे के गांवों में लगेंगे। उन घरों में जिन पर सीपीएम के सशस्त्र कार्यकर्ताओं ने पिछले हफ्ते कब्जा किया। यहां हर राजनीतिक दल के दफ्तर गिरा दिए गए हैं। सड़क किनारे पड़े पार्टियों के बोर्ड और बैनर खुद अपनी दुर्दशा बता रहे हैं। नंदीग्राम के लोगों के लिए अपने घरों पर लाल झंडा लगाना अनिवार्य है। अगर वे घर तृणमूल कांग्रेस के सहयोगी संगठन भूमि उच्छेद प्रतिरोधा कमेटी के हैं तब तो सीपीएम का यह हुक्म और भी सख्ती से लागू होता है। कमेटी के अधिकतर लोग सीपीएम के हथियारबंद कार्यकर्ताओं से डर कर यह इलाका छोड़ चुके हैं। लाल झंडा लगाने का यही आदेश जमात-उल-उलेमा-ए-हिंद और उन सभी दलों पर लागू होता है जिन्होंने नंदीग्राम में सीपीएम के जमीन कब्जे का विरोध किया था। बहुत पूछने पर ग्रामीण बस इतना बोलते हैं कि उन्हें सीपीएम और पुलिस दोनों से डर लगता है। उन्हें राहत देने पहुंची सीआरपीएफ को दो दिन बाद किसी तरह सीपीएम के प्रभाव क्षेत्रों में तो जाने दिया गया लेकिन उन इलाकों में इस बल के जवान अब भी नहीं जा सके हैं जहां सर्वाधिक हिंसा हुई। सीपीएम के आतंक का एक और उदाहरण देखें। तृणमूल कांग्रेस के काफी कार्यकर्ता किसान है जो सीपीएम के डर से गांव छोड़ गए थे। वे अब धाान कटाई के लिए घर लौटना चाहते हें लेकिन उसके लिए उन्हें सीपीएम के स्थानीय दफ्तर जाकर एक 'सम्पूर्णपत्र' पर हस्ताक्षर करने होंगे, मीडिया से बात न करने का वादा करना होगा और सीपीएम में शामिल होना होगा। उसके बाद उन्हें लाल झंडा देकर घर जाने की अनुमति मिलेगी। अधिाकारी पाड़ा के पास हमें एक बुजुर्ग से बात करने का मौका मिला। उससे पूछा गया, हमला किसने किया? जवाब था, 'मोटरसाइकिल सवार थे' किसी न फिर पूछा, 'क्या एम-पार्टी के लोग थे?' बुजुर्ग ने पहले तो कहा हां, फिर बोले मैंने कुछ नहीं देखा, आप जाइए यहां से एक मुस्लिम महिला सुषमा स्वराज का हाथ पकड़ कर रोने लगी। असके दो जवान लड़के लापता थे। पहले तो वह अपना नाम बता गई लेकिन फिर सहम गई। हमें बताया गया कि जानकारियां निकलवाने के लिए सीपीएम अपने कार्यकर्ताओं को रिर्पोटर बना कर भेजती है। नंदीग्राम हाई स्कूल में प्रतिनिधिमंडल पर पथराव भी हुआ। यहां हमें दस साल का एक लड़का गोपाल मिला जिसकी मां श्यामली को उसकी आंखों के सामने गोली मार दी गई थी। लालकृष्ण आडवाणी ने पूछा, 'श्यामली का दोष क्या था?' उन्हें बताया गया कि श्यामली शांति मार्च में भाग ले रही थी। गोपाल के पिता कई महीनों से लापता हैं। नंदीग्राम में लापता का मतलब है 'मृत' कमालपुर में हमें दो मंजिला मकान जमींदोज मिला। मकान मालिक मोहिबुल ने बताया कि मकान सिर्फ इसलिए गिरा दिया गया क्योंकि उसका भाई भूमि उच्छेद प्रतिरोधा कमेटी का नेता था। पिछले बृहस्पतिवार को सीपीएम के कार्यकर्ताओं का हुजूम वहां पहुंचा। औरतों और बच्चों को घर से बाहर किया (मर्द पहले ही घर छोड़कर भाग चुके थे) और घर को आग लगा दी। लेकिन हिंसा का यह नंगा नाच उम्मीद भी जगाता है। लोग डरे हैं, हारे नहीं। कुछ हिस्सों में जहां दूसरे दलों के समर्थकों की संख्या अधिाक है, सीपीएम की निजी सेना 'हर्मद वाहिनी' भी उन्हें झुका नहीं सकी है। यह देख कर आश्चर्य हुआ कि एक राहत शिविर में हजार से अधिाक लोग हमसे मिलने पहुंचे। इतिहास साक्षी है कि दमन कुछ ही समय तक लोगों को दबा पाता है, अंतत: भावनाएं मुखर होती है। यही भावनाएं इतिहास बनाती हैं।
(लेखक राज्यसभा सदस्य और द पायनियर के संपादक है)

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