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Tuesday, 6 November, 2007

हिटलर व इंदिरा गांधी की राह पर मुशर्रफ : अरुण जेटली


पिछले 24 घंटों के दौरान पाकिस्तान में हुआ घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय है। सबसे नजदीकी पड़ोसी होने के नाते भारत के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा गंभीर है। भारतीय जनता पार्टी मानती रही है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए संघर्ष और मजहबी आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाली और कानून का राज स्थापित करने के संघर्ष में भाजपा वहां की जनता के साथ प्रतिबद्धता व्यक्त करती है।

भारत में खास तौर से 1975 के बाद जन्मे या वयस्क हुई पीढ़ी के लिए पिछले 24 घंटों के दौरान पाकिस्तान का घटनाक्रम हूबहू वही है जो हम आपातकाल के दौरान झेल चुके हैं। यह विडंबना है कि जिस समय पाकिस्तान में यह घटनाक्रम चल रहा था, उस समय 1975 में भारत पर निरंकुशता के साथ आपातकाल थोपने वाली कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी भाजपा पर संवेदनहीन और सामाजिक सरोकारों से दूर होने का आरोप मढ़ रही थीं। दुनिया ने बार-बार देखा है कि आपातकाल के नाम पर लोकतांत्रिक संविधानों को ताक पर रखा गया और सत्ता की पूरी शक्ति व्यक्ति केंद्रित करने के लिए तानाशाही को थोपा गया। तानाशाहों ने आपाताकाल थोपने के लिए आतंकवाद की धमकी, अस्थिरता के खतरे और कार्यपालिका पर न्यायपालिका के अतिक्रमण जैसे मुहावरों को ढाल बनाया। एडाल्फ हिटलर ने जर्मनी की संसद रिचस्टैग में आग लगने की घटना को आपातकाल लागू करने का आधार बनाया। इंदिरा गांधी ने देश को अस्थिर करने की साजिशों का आरोप लगा कर देश पर आपातकाल थोपा। अब जनरल परवेज मुशर्रफ ने भी आतंकवाद और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका के अतिक्रमण को आधार बनाया तो कोई आश्चर्य नहीं। आपातकाल की तीनों ही घटनाओं के पीछे एक ही भावना अंतर्निहित थी। व्यक्तिगत ताकत को सुदृढ़ कर सब कुछ अपने हाथ में लेने की चाह, सत्ता खोने की सभी आशंकाओं को खत्म करने और किसी भी तरह की आलोचना को बर्दाश्त न कर पाने की भावना ही आपातकाल लागू करने का कारण बनी है। तीनों ही घटनाओं में संवैधानिक संरचना भी एक ही है। सबसे पहले तो बिना पर्याप्त कारणों के आपातकाल लागू करिए। दूसरे इस फैसले को बदलने की सभी संभावनाएं खत्म करने के लिए चाहे जजों को धमकाया जाए या फिर बदल दिया जाए। तीसरे, विरोध के हर स्वर को समाप्त कर दिया जाए। वह चाहे मीडिया पर प्रतिबंध लगाकर हो, दूरसंचार संबद्धता खत्म कर या फिर संपादकों को गिरफ्तार करके ही यह लक्ष्य पूरा होता हो। चौथा तरीका है कि नागरिक अधिकारों को बिल्कुल खत्म कर उन्हें बिना ट्रायल के जेलों में ठूंस दिया जाए और उसे अदालत में भी चुनौती न दी जा सके। इसी कड़ी में पांचवां तरीका सभी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को गिरफ्तार करवाने का है। इसके साथ ही चाटुकारिता का वह दौर शुरू हो जाता है, जिसमें आपातकाल लगाने के समर्थन में तर्क दिए जाते हैं। कहा जाता है कि राष्ट्रहित के लिए यह जरूरी था। आपातकाल के पैरोकार तो एक कदम आगे जाकर वंशवाद को लोकतंत्र के मुकाबले स्थापित करने का प्रयास करने से भी नहीं चूकते। भारत इसका एक जीवंत उदाहरण है। आपातकाल के ये पैरोकार अंतत: इसे आम आदमी के हितों से जुड़ा हुआ भी करार देते हैं। बताया जाता है कि देश की आर्थिक तरक्की होगी और गरीबों को इसका सबसे ज्यादा फायदा होगा।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि इमरजेंसी के बाद हिटलर ने 25 सूत्री और इंदिरा गांधी ने 20 सूत्री आर्थिक कार्यक्रम लागू किया था। अब पाकिस्तान से भी ऐसी किसी घोषणा की उम्मीद है। भाजपा यह इसलिए बता रही है कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा जो 1970 के मध्य में जन्मा है वह इस बात का एहसास कर सके कि 1975-77 के दौरान देश को किन दुश्वारियों का सामना करना पड़ा था। भारतीय जनमानस ने आपातकाल से लड़ने में अतुलनीय हिम्मत और साहस का प्रदर्शन किया था। हम आशा करते हैं कि पाकिस्तान की जनता भी उसी जज्बे के साथ सफलता हासिल करेगी। प्रस्तुति : राजकिशोर

1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत ही बढिया व सटीक लेख है।अच्छी विवेचना की है...सही कहा-"हिटलर व इंदिरा गांधी की राह पर मुशर्रफ : अरुण जेटली"