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Wednesday, 21 November, 2007

नंदीग्राम के अपराधियों को दंड कौन देगा? - तरुण विजय

वे जो खुद डरे हुए हैं या जनता के अवसन्न मन की राख से चिंगारी निकलेगी?

जिस प्रकार वामपंथी विचार के भी अनेक कलाकार, साहित्यकार एवं अन्य बुध्दिजीवी नंदीग्राम में माकपा कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी के खिलाफ कोलकाता में सड़कों पर उतर आए और लगभग 3 मील लम्बे विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए, यह इस बात का हल्का सा संकेत देता है कि सब कुछ सहने वाली धरती की तरह जनता भी बहुत कुछ बहुत समय तक सहती है, लेकिन एक दिन ऐसा भी आता है जब परिणाम की चिंता किए बिना उसकी अंतश्चेतना अन्याय के विरुध्द उठ खड़ी होती है। नंदीग्राम नरसंहार पर केन्द्र चुप है। जनता में हताशा और राजनीतिज्ञों के प्रति अविश्वास के कारण सन्नाटा है। लेकिन एक गुस्सा भीतर ही भीतर पल रहा है। यह कब, कहां और कैसे फूटेगा इसका अंदाजा लगाना कठिन है। लेकिन अन्याय करने वाले और अन्याय के प्रति चुप रहने वाले बख्शे नहीं जाएंगे, यह विश्वास करते हुए राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत कार्यकर्ताओं को निर्णायक प्रहार की सफलता हेतु जमीन, पानी और हवा (संत विनोबा के शब्दों में) तैयार करने का काम जारी रखना होगा। यह परिदृश्य रूस के राष्ट्रपति पुतिन की उपलब्धियों के संदर्भ में देखने का प्रयास समीचीन होगा।

हाल ही में प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह रुस की 28 घंटे की यात्रा पर गए थे। यह यात्रा वर्तमान संदर्भों में विशेष सामरिक महत्व की रही, क्योंकि एक ओर अमरीका से परमाणु संधि पर विवाद अभी थमा नहीं है, दूसरी ओर भारत के भूराजनीतिक क्षेत्र में रुस और चीन के साथ मैत्री का विशेष महत्व है। इस यात्रा में एक दिलचस्प बात यह रही कि यद्यपि संप्रग सरकार उन वामपंथियों के सहारे पर टिकी है जिन्हें 1917 में रुस में प्रारंभ हुई बोलशेविक क्रांति की वैचारिक संतान कहा जा सकता है, लेकिन अपनी यात्रा के दौरान न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उस क्रांति की चर्चा ही करना उचित समझा जिसकी बचे खुचे कम्युनिस्ट 90वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और न ही वे मास्को में लेनिन की सुरक्षित रखी देह पर फूल चढ़ाने गए। बोलशेविक क्रांति का नामोनिशान उसी भूमि में समाप्त हो गया है जहां वह जन्मी थी। यह सब 75 वर्ष से भी कम समय में दिखा, जबकि लगभग उसी समय प्रारंभ हुआ हिन्दुत्व का आंदोलन जो रा0स्व0संघ के नाम से पहचाना गया, 82वें वर्ष में पहले से अधिक सशक्त, सबल दिख रहा है और भारतीय वस्तुपरक प्रेक्षक भी यह मानते हैं कि रा0स्व0संघ भारत का पाथेय तय कर रहा है। दुनिया के सबसे बड़े हिन्दू संगठन के नाते तो उसकी मान्यता चतुर्दिक फैली ही है। यह अंतर होता है आत्मीयता पर आधारित एवं मातृभूमि की वंदना से प्रेरित आंदोलन तथा हिंसा और घृणा पर टिके आंदोलन में।

हालांकि डा0 मनमोहन सिंह की इस यात्रा में परमाणु सहयोग तथा दक्षिण भारत में रुस की मदद से चार नये परमाणु रिएक्टर प्रारंभ करने के बारे में समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो सके, क्योंकि रुस संभवत: अमरीका के प्रतिबंधों के कारण ऐसे समझौते फिलहाल नहीं कर सकता, लेकिन अंतरिक्ष अनुसंधान, सन् 2011 तक चंद्रमा पर भारत और रुस का संयुक्त अंतरिक्ष यान-अभियान, आतंकवाद और नशीले पदार्थों पर रोकथाम के लिए साझा रणनीति तथा बहुत बड़ी मात्रा में युध्दक सामग्री, जैसे युध्दक हेलीकाप्टर और पांचवीं पीढ़ी के अत्यंत उन्नत युध्दक विमान प्राप्त करने पर समझौता हुआ।

पुतिन इस समय रुस के महानायक के रुप में उभरे हैं, जिनकी तुलना रुसी साम्राज्य की दृढ़ नींव रखने वाले पीटर महान से की जाने लगी है। कम्युनिस्ट शासन के दौरान सोवियत संघ की आर्थिक स्थिति एक छलावे और भ्रम में छुपाकर रखी गई और दुनिया के सामने एक ऐसी महाशक्ति का मुखौटा प्रकट किया गया जो भीतर से खोखली होती जा रही थी। नतीजा यह हुआ कि अमरीकी रणनीति के कारण गोर्बाचोव सोवियत संघ के विघटन का साधन बने। शेष बचा रुस महासंघ यद्यपि आज भी दुनिया के बड़े और विशालकाय देश के नाते जाना जाता है, परंतु विघटन के समय उसकी आर्थिक नींव टूट चुकी थी। उस समय लोग थैले भरकर रुबल ले जाते थे और उनके बदले अंगुलियों पर गिने जाने वाले डालर भी नहीं मिलते थे। 1991 में बोरिस येलत्सिन रुस के पहले लोकतांत्रिक पध्दति से चुने गए राष्ट्रपति बने। परंतु वे भी रुस की आर्थिक स्थिति को संभाल नहीं पाए। उनके बाद राष्ट्रपति बने व्लादिमीर पुतिन पर केवल रुस की आर्थिक स्थिति को ही संभालने की जिम्मेदारी नहीं थी बल्कि विश्रृंखलित और विखंडित रुस के स्वाभिमान और सामर्थ्य को पुन: स्थापित करने एवं केजीबी से निकले हुए कर्मचारियों के माफिया गिरोहों की गिरफ्त से रुस को मुक्त करने का काम भी उन्हीं के कंधों पर टिका। उधर चेचन्या में बढ़ रहे इस्लामी आतंकवाद की आंच रुस को भी जला रही थी। पुतिन ने सत्ता के सूत्र बहुत कड़ाई और परिणाम की चिंता किए बिना अपने हाथ में लिए, घोटाले और जालसाजी में लिप्त देश के सबसे बड़े उद्योगपति खादरोकोव्स्की को गिरफ्तार कर 9 साल के लिए जेल में भेजा। निष्क्रिय प्रधानमंत्री को अपने कमरे में बुलाकर तुरंत बर्खास्त किया और चेचन्या के इस्लामी विद्रोहियों से किसी भी तरह की बातचीत से साफ इनकार करते हुए प्रबल सैनिक कार्रवाई द्वारा उनको कुचला। जाहिर था इसकी अमरीका के तथाकथित मानवाधिकारवादियों ने जमकर आलोचना की। बढ़ते रुस के महानायक पुतिन आज अमरीका की आंख में सबसे ज्यादा खटकने लगे हैं, क्योंकि अमरीका को लगता है कि उसकी एक धुव्रीय वैश्विक महाशक्ति बनने की यात्रा को पुतिन ही बाधित कर सकते हैं। लेकिन पुतिन दो कार्यकाल तक राष्ट्रपति बनने के बाद अब अगले वर्ष मार्च में पद छोड़ने की घोषणा कर चुके हैं। उनकी इस घोषणा का रुस में तीव्र विरोध हुआ है, क्योंकि लोग चाहते हैं कि रुस को पुतिन जैसे कठोर और दृढ़निश्चयी शासक ही बचा सकते हैं।

इस समय रुस की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत है और आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से आतंकवादियों का प्राय: निर्मूलन किया जा चुका है। पुतिन की आयु केवल 55 वर्ष है। वे ब्लैक बेल्ट धारक कराटे खिलाड़ी हैं और युवकोचित उत्साह के साथ देश में एक नई शक्ति का स्फुरण करने में कामयाब हुए हैं।

भारत के प्रधानमंत्री जब उनसे मिले तो पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम नरसंहार हो चुका था। लेकिन न तो प्रधानमंत्री नंदीग्राम में माकपाई हिंसाचार के शिकार अपने ही भारतीयों से मिलने गए और न ही उन्होंने उस क्षेत्र में मार्क्सवादी आतंक के कारण डर से पलायन करने पर विवश लोगों की सुरक्षा के लिए कारगर उपाय किए। यहां तक कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री श्री बुध्ददेव भट्टाचार्य द्वारा नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे नागरिकों पर हिंसक हमले का समर्थन ही किया गया। इस पर भी शासक दल की ओर से निंदा का एक शब्द भी नहीं कहा गया। देश में आतंकवादी कहीं भी, किसी भी जगह हमले करने के लिए स्वतंत्रता महसूस कर रहे हैं। माओवादी हिंसाचार, इस्लामी जिहाद से भी ज्यादा बर्बर साबित हुआ है। ये कम्युनिस्ट आतंकवादी आज भी स्टालिन और माओ त्से तुंग को उसी प्रकार से नायक मानते हैं जिस प्रकार माकपा इन दोनों कम्युनिस्ट नेताओं के प्रति अपनी श्रध्दा और सम्मान प्रकट करती है। सबकी ऊर्जा और प्रेरणा के केन्द्र एवं स्रोत एक ही हैं, और वे अपने अपने देश में बर्बर हिंसाचार, गुलाग, साइबेरिया और सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर अमानुषिक आंदोलनों के लिए जाने जाते हैं, बस काम करने और मुखौटे ओढ़ने के तरीके भिन्न-भिन्न हैं। माकपा और उसके सहधर्मी कम्युनिस्ट संगठन देश में असहिष्णुता, नफरत और हिंसाचार के सबसे बड़े केन्द्र बन गए हैं। केन्द्रीय गृहमंत्रालय ने केवल कम्युनिस्ट आतंकवाद पर नियंत्रण एवं निर्मूलन के लिए एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया हुआ है, जिसके 13 मुख्यमंत्री सदस्य हैं।

गृह मंत्रालय में इसी विषय पर एक विशेष डिवीजन 19 अक्तूबर, 2006 को बनाया गया था जिसका उद्देश्य है-सुरक्षा और विकास, दोनों ही दृष्टिकोण से कम्युनिस्ट आतंकवाद पर नजर रखना तथा जिन क्षेत्रों में कम्युनिस्ट आतंकवाद तीव्रता से बढ़ रहा है वहां रोकथाम के उपाय सुझाना। इसमें सरकार को जम्मू-कश्मीर के इस्लामी जिहादियों के समान ही नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक अपनी ताकत और धन का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। गृह मंत्रालय की 2007 की रिपोर्ट में गृहमंत्री श्री शिवराज पाटिल ने बताया है कि देश के 12,476 में से 395 पुलिस थाना क्षेत्रों में नक्सल या कम्युनिस्ट हिंसाचार की घटनाएं घटी हैं। 2003 में नक्सली कम्युनिस्ट आतंकवादियों ने 410 नागरिकों एवं 105 पुलिसकर्मियों की हत्या की । 2006 में यह आतंकवाद बढ़ा है और पिछले वर्ष कम्युनिस्ट आतंकवादियों द्वारा 521 नागरिकों एवं 157 पुलिसकर्मियों की हत्या की गई। मुख्यत: कम्युनिस्ट आतंकवादियों के गिरोह महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और उत्तराखंड में नये प्रभाव बनाने में जुटे हुए हैं। हालांकि झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनका पहले से ही प्रभाव चला आ रहा है। इस दृष्टि से माओवादी गुट अब एकजुट हो रहे हैं, जैसे कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया(माओवादी) यदि नई भर्तियों के लिए जुटी हुई है तो मई 2005 में स्थापित क्रांतिकारी लोकतांत्रिक मोर्चा अब भारत का जनवादी लोकतांत्रिक मोर्चा (पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ इंडिया) के नाम से जाना जाने लगा है। पिछले दिनों झारखंड में नक्सलवादियों ने 18 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, जिनमें प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता श्री बाबूलाल मरांडी का पुत्र भी था। इन क्षेत्रों के विकास और नक्सल कम्युनिस्ट आतंकवाद पर रोकथाम के लिए 13 राज्यों हेतु केन्द्र सरकार ने 3677.67 करोड़ रूपए आवंटित किए हैं।

पर जब केन्द्र में ऐसा राजा हो जो स्वयं ही डरा हुआ हो तो प्रजा कहां से संबल प्राप्त करेगी? इसलिए रुस के राष्ट्रपति पुतिन से केवल हथियार ही लेने की आवश्यकता नहीं है। आतंकवाद निर्मूलन और राष्ट्रीय स्वाभिमान जागरण हेतु शक्ति संवर्धन के लिए कुछ ग्राम साहस भी मनमोहन सिंह ले आते तो बेहतर होता।

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