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Monday, 4 August, 2008

भारत तभी तक सेकुलर है जब तक यह हिन्दू बहुल है

भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक पंथ-निरपेक्ष, समाजवादी और प्रजातांत्रिक गणतंत्र है। अनेक चुनौतियों के बाद भी लोकतंत्र यहां सफलतापूर्वक चल रहा है और पंथ-निरपेक्षता तो प्राचीन काल से भारत की विशेषता रही है। लेकिन भारत तभी तक सेकुलर और प्रजातंत्रवादी रहेगा, जब तक कि यहां हिन्दुओं का बहुमत है। जिस दिन हिन्दू-समाज की संख्या घट जायेगी उसी दिन इस देश से लोकतंत्र और सेकुलरवाद भी विदा हो जायेंगे। पाकिस्तान और बांग्लादेश भारत के ही हिस्से थे। जैसे ही वहां हिन्दू घटे दोनों के दोनों मजहबी राज्य हो गये और प्रजातंत्र भी वहां मरणासन्न हो गया। अमरनाथ बोर्ड को जमीन देने और वापस लेने का घटनाक्रम इसका ताजा उदाहरण है।

हज हाऊस और उर्स
भारत के हर प्रदेश से हर साल हजारों मुसलमान हज के लिए जाते हैं। केन्द्र सरकार हज करने वालों को आर्थिक सहायता देती है। प्रत्येक राज्य में हज-यात्रियों की सुविधा के लिये बड़े-बड़े हज हाऊस बने हुए हैं। अजमेर में हर साल ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का उर्स होता है। उर्स में आने वालों को राज्य सरकार और प्रशासन सभी सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। अजमेर में पुष्कर रोड पर विशाल मैदान में जायरीनों के लिये स्थायी विश्राम स्थल बना हुआ है। हिन्दू समाज ने कभी इस पर आपत्ति या आन्दोलन नहीं किया कि जायरीनों या हाजियों को एकड़ों जमीन क्यों नहीं दी गई है, लेकिन अमरनाथ यात्रा करने वालों को अस्थायी रूप से कुछ भूमि दिये जाने पर कश्मीर घाटी में विरोध खड़ा हो गया। हिन्दू यात्रियों को कुछ सुविधा दिये जाने पर घाटी के मुसलमान भड़क उठे, कई दिनों तक उग्र प्रदर्शन किये गये और अमरनाथ जाने वालों पर हमले किये गये। यह तभी रुका जब राज्य सरकार ने जमीन देने का आदेश निरस्त कर दिया।

यह क्यों हुआ? इसका सीधा सा उत्तर यही है कि कश्मीर में मुसलमानों का बहुमत है, वे कट्टरपंथियों के प्रभाव में हैं और जहां मुस्लिम अधिसंख्य हों, वहां इस्लाम के अतिरिक्त अन्य किसी मजहब का बने रहना असम्भव है। इतिहास में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। आज भी स्थिति यही है। बीस साल पहले घाटी से हिन्दुओं को रातों-रात घर-बार छोड़कर भागना पड़ा था। इसके बाद पचासों मंदिर वहां ध्वस्त कर दिये गये। पूरी घाटी में नाम मात्र के हिन्दू बचे हैं, वे भी मजदूरी के लिये गये लोग हैं, जो चौबीसों घण्टे आतंक में जीते हैं। अब अमरनाथ का तीर्थस्थल कट्टरपंथियों को चुभ रहा है। अमरनाथ की गुफा में बर्फ से बने पवित्र शिवलिंग का दर्शन करने पूरे भारत से हर साल लाखों लोग पहुंचते हैं। सेना की कड़ी सुरक्षा में यह यात्रा होती है। फिर भी आतंकवादी हर वर्ष कोई न कोई वारदात करते ही हैं। तीर्थयात्रियों पर बम फैंके ही जाते हैं।

पृष्ठभूमि
वर्ष 1996 में अमरनाथ यात्रा के समय जबर्दस्त बर्फीला तूफान आया, जिसमें दो सौ श्रध्दालु मारे गये थे। उस समय राज्य सरकार ने इसकी जांच के लिये 'सेनगुप्ता समिति' बनाई। समिति का सुझाव था कि पहलगाम और बालटोल के बीच यात्रियों की सुरक्षा के लिये स्थायी शिविर बनाये जाने चाहिये। 2001 तथा 2002 में यात्रियों पर आतंकी हमलों के बाद एक और सुझाव 'अमरनाथ तीर्थस्थल प्राधिकरण' (अमरनाथ श्राइन बोर्ड) गठित करने का आया। इस सुझाव के अनुसार उक्त प्राधिकरण का गठन किया गया। प्रावधान यह रखा गया कि राज्यपाल इस बोर्ड के अध्यक्ष तथा राज्यपाल के मुख्य सचिव इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी होंगे।

लगभग 6 माह पहले तत्कालीन राज्यपाल जे। ज. सिन्हा ने 'बोर्ड' के अध्यक्ष के नाते सेनगुप्ता समिति की सिफारिश के अनुसार राज्य सरकार से 40 एकड़ भूमि की मांग की। इस भूमि पर यात्रियों की सुरक्षा के लिये आवास व्यवस्था की जानी थी। यह जमीन केवल यात्रा अवधि में काम में ली जानी थी तथा इसका किराया भी प्राधिकरण की ओर से दिया था। जम्मू-कश्मीर के मंत्रिमण्डल ने बालटोल के पास 40 एकड़ भूमि देने के आदेश भी दिये। राज्य की नौकरशाही ने भरपूर प्रयत्न किया कि अमरनाथ बोर्ड की जमीन नहीं दी जाये, किन्तु जमीन दिये जाने का आदेश फिर भी निकल गया।

वन विभाग ने यह कर बाधा पहुंचाई कि पास ही में थजवास अभयारण्य है और यात्रियों के वहां ठहरने से अभयारण्य के वन्य पशुओं को तकलीफ होगी। यह भी कहा गया कि वन विभाग की भूमि अन्य किसी उद्देश्य से दी ही नहीं जा सकती, जब कि राजौरी में एक इस्लामी विश्वविद्यालय के लिये इससे भी बड़ी और गुलमर्ग में होटल बनाने के लिये 30 एकड़ वन विभाग की जमीन दी गई है। एक आपत्ति पर्यावरण प्रदूषण की भी थी। इन सब आपत्तियों के बाद भी मई में राज्य मंत्रिमण्डल ने 40 एकड़ भूमि अमरनाथ प्राधिकरण को देने की स्वीकृति दे दी।

बालटोल के पास दी गई इस भूमि पर-

-तीर्थयात्रा अवधि( अधिकतम दो माह) के लिये अस्थायी आवास बनाने की योजना थी।
इस जमीन का किराया 2 करोड़ 31 लाख 30 हजार चार सौ रुपए अमरनाथ बोर्ड ने वन विभाग को दिया है।
-भूमि पर पेड़ लगाने के लिये कुछ अतिरिक्त धन भी बोर्ड की ओर से विभाग को दिया गया है।
दो माह भूमि वन-विभाग को लौटा दी जाएगी।
-अमरनाथ बोर्ड को उक्त भूमि किराये या लीज पर किसी अन्य को देने का अधिकार भी नहीं है।
फिर भी इस भूमि-आवंटन पर तूफान खड़ा किया गया।

अलगाववादियों ने भड़काया
वास्तव में सरकार की स्वीकृति के बाद विरोधियों ने घाटी के लोगों को भड़काना प्रारम्भ कर दिया। भड़काने वालों में पीडीपी के लोग सबसे आगे थे, जबकि पीडीपी के मंत्री भी उस बैठक में
थे, जिसमें भूमि आवंटन की अनुशंसा की गई थी। इसी का परिणाम था कि विगत 22 जून से कश्मीर घाटी में हिंसक प्रदर्शन प्रारम्भ हो गये। अमरनाथ यात्रियों पर पथराव किया गया और कुछ स्थानों पर तीर्थयात्रियों पर हथगोले भी फैंके गए। श्राइन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री अरुण कुमार को भी निशाना बनाया गया।

लगभग दो महिने पहले ले। जनरल एस. के. सिन्हा के सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्व गृह सचिव श्री एन. वोहरा प्रदेश के राज्यपाल बने। इसलिए अमरनाथ बोर्ड के अध्यक्ष भी वे ही हो गए। 30 जून को उन्होंने प्राधिकरण के अध्यक्ष के नाते सरकार को लिख दिया कि उन्हें बालटोल के पास भूमि की आवश्यकता नहीं है। राज्यपाल के इस हिन्दू-विरोधी कदम से हिन्दू समाज में भी जागृति आई। जम्मू में तो भूमि-आवंटन के समर्थन में प्रदर्शन पहले ही से हो रहे थे, विश्व हिन्दू परिषद् ने 3 जुलाई को भारत-बंद रखने का आह्वान किया। पूरे देश में यह 'बंद' आशातीत रूप से सफल रहा। प्रश्न उठता है कि देश की जनता का पचास हजार करोड़ रुपया अब तक सौंपा जा चुका है, फिर भी यदि अमरनाथ यात्रियों को वहां सुविधा नहीं मिल सकती तो कैसे घाटी को भारत का अभिन्न अंग माना जाये? (साभार-पाथेय कण)

7 comments:

मिहिरभोज said...

सही कहा आपने ,हिंदु ही सर्व धर्म समभाव को जी सकता है ,

संजय बेंगाणी said...

भारत तभी तक सेकुलर है जब तक यह हिन्दू बहुल है

सहमत.

अनुनाद सिंह said...

आप कभी इस बात पर अपने विचार लिखिये कि क्या इस्लाम के जीवित रहते कभी सम्पूर्ण विश्व का सेक्युलर हो जाना सम्भव है? यदि हाँ तो कैसे? क्या आपको इस्लाम और सेक्युलरवाद परस्पर विरुद्ध या परस्पर विलोम धारणायें नहीं लगतीं?

Anonymous said...

dar asal maine ise bilkul sahi samajhta hoon, hinduon ne apne voton ki keemat hi nahi pahchani jinhone pahchan li hai vo vasool rahe hain vaise hindoo ek gulam kaum rahi hai aur isiliye gulami ke kiitanu uske andar se nahi jaate anyatha baahar se aaye huye aakranta ham par raaj kar paate, ek secular state me yah ordinance ki yadi mukhyamantri hindoo ban gaya to university ka chancellor muslim hoga, kya desh ek islaami rashtra banne ki or agrasar nahi hai?? jise banane me hamare so-called hindu dharm nirpeksh neta kar rahe hain? aur hindoo dharm guru bhi iske against kyon aage nahi aate???

Umesh said...

प्रिय बन्धु ! हम सेक्युलर है ईस लिए सनातन है । मुस्लीम, ईसाइ आदि सेक्युलर नही है, ईस लिए मिट जाने वाले है । अगर आज मुसलमानो की बीच मुहम्मद जैसा कोई प्रबुद्ध पुरुष फिर से जन्म ले ले तो वो उसे मार डालेंगें । क्योकी प्रबुद्ध पुरुष होगा तो परम्परा से ह्ट कर बात करेगा, रुढियो से विद्रोह करेगा, जिसे मुस्लीम मानस सहन ही नही कर सकता । वे सहिष्णु नही है, वे सेक्युलर नही है, इस लिए भविष्य के महामानव से वंचित रहने वाले है । ईसाईयो के बीच भी आज कोई ईश्वर पुत्र आएगा तो वे उसे मार डालेगें । हिन्दु मानस ही एसा मानस है जो आने वाले नए मुहम्मद, नए ईसा और नए बुद्ध को स्थान देगा । ईस लिए आने वाले विश्व का आध्यत्मिक प्रणेता हिन्दुओ के बीच ही आने वाला है । जिस मुहम्मद और ईसा के वचनो को वे पढते है उनका अर्थ समय के प्रवाह मे गुम हो गया है । ईन्द्रियातित अनुभवो को शब्दो मे डाला ही नही जा सकता, वे शब्द उन प्रबुद्ध पुरुषो के गैर मौजुदगी मे मानव जाति के लिए कोई अर्थ नही रखते । हिन्दु मतलब खुला दिमाग, हिन्दु मतलब सेक्युलर – यही हमारी विशेसता है ।

Jeet Bhargava said...

Sach kahaa dost. Bilkool Sahmat hun. Aapki lekhani ko pranaam. Soye hue Desh aur samaaj ke liye likhte rahiye.

prashant said...

Bandhubar naskar.aabhar sweekar kare is uttam bichar ke lie.hinduon ko ab jagna hee hoga.abhee nahee to kabhee nahee.
Dhanybaad.