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Thursday 21 August 2008

हिन्दू कश्‍मीर को मुस्लिम कालोनी किसने बनाया?

मुस्लिम तुष्टिकरण की देशघातक नीति पर चलते हुये 1947 में भारत का विभाजन स्वीकार करने वाली कांग्रेस ने एक बार फिर फिरकापरस्त अलगाववादी तत्वों के आगे घुटने टेक दिये।

उम्मीद के मुताबिक जम्मू-कश्‍मीर के नये राज्यपाल श्री एन. एन. वोहरा ने पद संभालते ही हिन्दुओं की भावनाओं पर मुस्लिम समाज की भावनाओं को तरजीह देते हुये आनन-फानन में श्राईन बोर्ड के सभी अधिकार प्रदेश की सरकार को सौंप कर एक तरफा तानाशाही फैसला थोप दिया। राज्यपाल ने श्राईन बोर्ड की बैठक नहीं बुलाई, हिन्दुओं के धार्मिक नेताओं से बात करना उचित नहीं समझा, कश्‍मीरी नेताओं के राजनीतिक पैंतरों को भीतर से नहीं झांका। राज्यपाल ने यह कहकर कि श्राईन बोर्ड को जमीन की जरूरत नहीं है संविधान, विधायिका और सरकारी परंपराओं का खुला उल्लंघन किया है।

उधर अलगाववादी संगठनों ने कश्‍मीरी राष्‍ट्रीयता और आजादी का सवाल खड़ा करके पूरी कश्‍मीर घाटी में भारत विरोधी हिंसक प्रदर्शन शुरू कर दिये। इन दोनों नेताओं ने भी इस अलगाववादी आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए इस्लामी तेल छिड़क दिया। इस तरह सभी कश्‍मीरी नेताओं का भारत विरोधी एजेंडा सामने आया और भारत की वफादारी के सभी नकाब उतर गये।

खुले भारत विरोध पर उतरे कश्‍मीरी नेता
अलगाववादी संस्थाओं, पीडीपी, एन।सी. और आतंकवाद समर्थक नेताओं के भारत विरोधी बयानों पर नजर डालने से इनके असली चेहरे साफ दिखाई देते हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन मीरवाईज उमर फारूख ने गत षुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद कश्‍मीरी मुसलमानों को भड़काते हुये कहा कि यह सवाल केवल अमरनाथ श्राईन बोर्ड को दी गई 800 कनाल जमीन वापिस लेने का ही नहीं है। असली मसला तो कश्‍मीरियों की पहचान, संस्कृति और कश्‍मीरी राष्ट्रीयता का है। हिन्दुस्थानियों और हिन्दुस्थान की फौज ने हमारी हजारों कनाल जमीन पर कब्जा कर रखा है। हमारे ऊपर बंदूक के जोर से दबदबा बनाये बैठी हिन्दुस्थानी फौज से हम निजात चाहते हैं। इसी तरह तारीक-ए-हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता सईद अलीशाह गिलानी भी बोले कि हमारा वर्तमान आंदोलन तो एक बड़े संघर्ष की शुरूआत है। हम तो कश्‍मीरियों को हिन्दुस्थान के शिकंजे से निकालना चाहते हैं। हिन्दुस्थान ने कश्‍मीर को अपनी कालोनी बनाकर रखा हुआ है। इसी तरह पीडीपी के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री मुजफ्फर बेग ने तो फिरका परस्ती की सारी हदें पार करके बयान जारी कर दिया कि सवाल कश्‍मीर और कश्‍मीरियत का है। इसलिए पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता। श्राईन बोर्ड पूरी तरह फिरका परस्त है। राज्यपाल (पूर्व) और उसके मुख्यसचिव यहां आग लगाना चाहते थे----क्या हुआ अगर भाजपा ने हमारी सप्लाई लाईन रोकने की धमकी दी है तो दूसरी सड़क तैयार है (श्रीनगर-मुजफ्फरावाद रोड़)............. आई एम. स्पीकिंग आन दा बीआफ आफ माई नेशन (कश्मीर)। उधर पीडीपी की अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती और एन.सी. के प्रधान उमर अब्दुल्ला ने भी खुलेआम अलगाववादी संगठनों की हां में हां मिलाते हुये बयान जारी कर दिये कि यह सारा मसला कश्‍मीरी राश्ट्रीयता का है। अमरनाथ श्राईन बोर्ड को जमीन देने से हमारी राश्ट्रीय पहचान को खतरा पैदा हो सकता है।

अमरनाथ श्राईन बोर्ड को दी जाने वाली जमीन के मामले का हल अपने पक्ष में होने से उत्साह में आये अलगाववादी नेताओं का जबड़ा पहले से भी ज्यादा चौड़ा हो गया। घाटी में पाकिस्तान समर्थक माहौल बना दिया गया है। पाकिस्तान और इस्लाम के झण्डे जगह-जगह लहराये जाने लगे। कलाश्निकोव-कलाश्निकोव अर्थात कश्‍मीर हमारा छोड़ दो। यह नारा भारतीय फौज, भारतीय सरकारी अफसरों, घाटी में बचे हुये और सहमे हुये चंद कश्‍मीरी पंडितों, बाहरी राज्य के मजदूरों, पर्यटकों और अमरनाथ यात्रियों के खिलाफ लगाये जा रहे थे। हिजबुल मुजाहिदीन आगे बढ़ो-हम तुम्हारे साथ हैं जैसे नारे आतंकवादियों का मनोबल बढ़ाने के लिए लगाये जाते रहे। कश्‍मीर में क्या चलेगा-निजामे मुस्तफा यह नारा स्वतंत्र इस्लामिक कश्‍मीरी गणतंत्र की हवा बनाने के लिए बड़ी-बड़ी जनसभाओं में लगाया जाता रहा।

सरकार खामोश-पुलिस मूकदर्शक
बाहरी राज्यों से कश्‍मीर में रोजी-रोटी कमाने वाले लगभग 10 लाख मजदूरों को उनके घरों से निकालकर उन्हें नंगा करके मारा पीटा गया। उन्हें भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया। श्रीनगर, सौपुर, कुलगांव, बड़गाम, पुलवामा, सोपियां इत्यादि शहरों और कस्बों में इन गरीब भारतीय मजदूरों पर हमले किये गये। अलगाववादी नेताओं ने इन्हें एक महीने में कश्मीर से चले जाने का अल्टीमेटम देते हुये कहा है कि यह लोग भारत के एजेंट हैं। भारत की सरकार हमारा जनसंख्या संतुलन बिगाड़ने के लिए इन्हें कश्मीर में बसा रही है। माहौल एक बार फिर 1947 में हुये भारत विभाजन जैसा बन चुका है। ऐसा ही माहौल कष्मीर में 1989 में बना था जब हुर्रियत कांफ्रेंस के इन्हीं नेताओं के आदेश पर मस्जिदों से उंची आवाज में कश्‍मीरी पंडितों को भाग जाने का आदेश दिया गया था। कश्‍मीर के प्राचीन और असली निवासी यह कश्‍मीरी पंडित आज अपने ही देश में विस्थापितों की बेसहारा जिन्दगी जी रहे हैं। अलगाववादी नेताओं का सफल प्रयास है कि कश्‍मीर में भारत का कुछ भी न बचे। बस केवल रह जाये तो निजामे-मुस्तफा।

हैरानी की बात तो यह है कि कश्‍मीर में चरम सीमा पर पहुंचे इस खुले फिरकापरस्त, पाक समर्थक, देशद्रोह और हिन्दू विरोध पर केंन्द्र व प्रदेश की सरकार चुपचाप तमाशा देखती रही। कश्‍मीर के राजनीतिक दल अपने-अपने वोट बैंक को बटोरने में अपनी सियासी गोटियां चल रहे हैं। किसी खास साजिश के तहत अलगाववादियों को खुली छूट दी जा रही है। अलबत्ता उनकी मांगों व खतरनाक इरादों की हिमायत करके अपने को उनके ज्यादा नजदीक लाने की होड़ चल रही है।

हिन्दू विहीन कश्‍मीरियत अर्थात इस्लामिक राष्‍ट्र
श्री अमरनाथ श्राईन बोर्ड को जम्मू-कश्‍मीर की सरकार द्वारा दी गई और फिर घुटने टेक राजनीति का शिकार होकर वापिस ली गई जमीन के अति संवेदनशील मामले ने कश्‍मीरी नेताओं के जहन में समाई हुई कश्‍मीरियत की आक्रामक भारत विरोधी मानसिकता पर से पर्दा हटा दिया है। हिन्दू पूर्वजों की संतान इन कष्मीरी नेताओं ने स्वतंत्र कश्‍मीरी राष्‍ट्र का नारा बुलंद करके एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उन्हें अपने हिन्दू पूर्वजों की उज्ज्वल, सार्वभौमिक और दिग्विजयी कश्‍मीरियत से कोई वास्ता नहीं है। इन कट्टरपंथी नेताओं को कश्‍मीर पर आक्रमण करने वाले और इनके ही पूर्वजों की महान संस्कृति को तबाह करके कष्मीर का गौरवशाली चेहरा बिगाड़ने वाले दुर्दांत हमलावरों की विरासत की चिंता है। यही वजह है कि यह कश्‍मीरी नेता एक सौ करोड़ हिन्दुओं को कश्‍मीर में एक सौ एकड़ जमीन देने को भी तैयार नहीं हैं।

स्वदेशी कश्‍मीरियत बनाम विदेशी तहजीब
तलवार के जोर पर खून की नदियां बहाने वाले विदेशी हमलावरों की संस्कृति, इतिहास और विरासत को ही कश्‍मीरियत मानने वाले कट्टरपंथी नेता गिलानी, मुफ्ती, फारूख, बेग, शबीर शाह और यासीन मलिक यह क्यों भूल जाते हैं कि मात्र पांच सौ वर्श पहले सभी कश्‍मीरी हिन्दू ही थे। वर्तमान कश्‍मीरी नेताओं के हिन्दू पूर्वजों ने भारत माता के मुकुट कष्मीर में नाग पूजा मत शैव दर्शन, बौध्द मत, वैष्णो मत आदि मानवीय दर्शन को मानवता की भलाई के लिये सारे संसार के सामने रखा था। सम्राट ललितादित्य, अवंतीवर्मन, हर्श, मेघवाहन, दुर्लभ वाहन, सम्राट चन्द्रापीड़ इत्यादि हिन्दू सम्राटों ने कश्मीरीयत को विश्वव्यापी बनाया। आर्युवेद, गणित, विज्ञान और सांख्यिकी जैसे दर्शन शास्त्र और सिध्दांत कश्‍मीर की ही धरती पर जन्मे, विकसित हुये और विश्व के कोने-कोने में पहुंचे। इस सांस्कृतिक धारोहर को समाप्त करने हेतु विदेशी हमलावरों की विरासत को थोपने के शड़यंत्रों के शिकंजे में फंसे अलगाववादी और हाथों में हथियार उठाये आतंकवादी इन्हीं हिन्दू पूर्वजों का ही खून हैं। यह लोग अपने ही बाप-दादाओं द्वारा बनाये गये मठ मंदिरों, विश्‍वविद्यालयों, सांस्कृतिक केन्द्रों और प्रेरणा स्थलों को बर्बाद करने के काम को ही जेहाद और कश्मीरियत मान बैठे हैं।

ध्यान देने की बात है कि कश्‍मीर की जमीन पर जन्मी सभी पूजा पध्दतियां शैव दर्शन, वैष्‍णव और बौध्दमत इत्यादि में कभी परस्पर संघर्ष नहीं हुआ। यह सभी मत और इनके जन्मदाता, ध्वजवाहक और अनुयायी भारत और भारतीय राष्ट्रीयता के अभिन्न अंग बने रहें। कश्‍मीर की धरती पर कनिश्क और मेहरकुल जैसे विदेशी शासकों ने भी, जो कुशाण और हूण जातियों से संबंधित थे, क्रमश: शैव मत और बौध्द मत को स्वीकार किया और अपना और अपनी जाति का भारतीयकरण करते हुये भारत राष्ट्र की मुख्यधारा में विलीन हो गये। परन्तु जब कष्मीर में इस्लाम का आगमन हुआ तो परस्पर संघर्ष, बलात् धर्मांतरण, पृथकतावाद, दूसरे मजहब को स्वीकार न करने की एक तरफा कट्टरपंथी मनोवृति और खूनी जेहाद का सिलसिला शुरू हो गया। कश्‍मीर की यही त्रासदी है और वर्तंमान में उठाया जा रहा स्वतंत्र कश्मीर राष्ट्र का बवाल भी इसी का एक हिस्सा है। कारण स्पष्ट है कि इस्लाम अपने अनुयायियों को किसी एक देश और वहां की राष्ट्रीयता संस्कृति के साथ जुड़े रहने की इजाजत नहीं देता। इस्लामी बहुमत जहां है वहां इस्लामी राज्य ही होना चाहिए। पाकिस्तान इसी वैचारिक पृष्‍ठभूमि की पैदायश है। कश्‍मीर इसी राह पर चल रहा है।

हिन्दू कश्‍मीर को मुस्लिम कालोनी किसने बनाया?
आज जिन कश्‍मीरी नेताओं को अमरनाथ यात्रा से कश्‍मीर में हिन्दू कालोनी बनाने, मुसलमानों का जनसंख्या अनुपात बिगड़ने और भारतीयों के कश्‍मीर में बस जाने का भय उत्पन्न हो गया है उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि 500 वर्श पहले के हिन्दू कश्‍मीर को शत् प्रतिशत मुस्लिम कालोनी में किसने बदला? मारतण्ड जैसे विश्‍व प्रसिध्द सूर्य मंदिर समेत हजारों हिन्दू आस्थास्थलों, मानवता के कल्याणार्थ रचे गये संस्कृत के महान ग्रंथों वाले विशालकाय पुस्तकालयों, सारे संसार को ज्ञान और विज्ञान प्रदान करने वाले विश्‍वविद्यालयों और धार्मिक संस्थानों को किसने उजाड़ा? कश्‍मीर की वास्तविक सूरत बिगाड़ने वाले विदेशी हमलावरों को कश्‍मीर में पांव पसारने और धर्मांतरण की खूनी चक्की चलाने में किसने साथ दिया?

यह कहने की जरूरत नहीं कि कश्‍मीर से भगाये गये वर्तमान कश्‍मीरी पंडित उन बहादुर हिन्दु पूर्वजों की संताने हैं जिन्होंने विदेशी हमलावरों के आगे सर नहीं झुकाया और वर्तमान कश्‍मीरी नेता उन हिन्दू पूर्वजों की संताने हैं जो विदेशी हमलावरों के जुल्मों को सहन नहीं कर सके, धर्मांतरित हो गये और अपने ही पूर्वजों की संस्कृति पर आधारित स्वदेशी कश्‍मीरियत को मिटाकर विदेशी हमलावरों के तलुवे चाटने लगे। कायरता और समर्पण का उपरोक्त सारा इतिहास कश्‍मीर के प्रसिध्द ग्रंथ राजतंरगिणी में मौजूद है और तत्कालीन व वर्तमान मुस्लिम इतिहासकारों ने भी इस कटु सत्य को अपनी पुस्तकों में लिखा है।

कश्‍मीर में विदेशी हमलावरों, हमदान के सईदो, मुगलों और अफगानों द्वारा कश्‍मीर को हिन्दू विहीन करके इस्लामी देश बनाने का यह सिलसिला आज भी जारी है। भारत विभाजन के समय जम्मू-कश्‍मीर के महाराजा हरिसिंह द्वारा इस प्रदेश का भारत में पूर्ण विलय कर दिये जाने के उपरांत शेख मोहम्मद अब्दुल्ला द्वारा सत्ता संभालने के तुरंत बाद श्रीनगर के लाल चौक पर दिया गया भाषण असल में वर्तमान कश्‍मीरी राष्ट्र की मानसिकता की शुरूआत थी। अपने भाषण में बार-बार कलमा दोहराकर वे भोले भाले कश्‍मीरियों में मजहबी उन्माद भड़काते रहे.......'' हमने कश्‍मीर का ताज खाक में से उठाया है, हम हिन्दुस्थान में जायें या पाकिस्तान में यह तो बाद का सवाल है, पहले हमने अपनी आजादी मुकंबल करनी है।'' स्‍पष्‍ट है कि शेख साहब मुस्लिमबहुल घाटी के आवाम को मजहब के नाम पर आजादी की जंग छेड़ने का इशारा कर रहे थे।

आश्‍चर्य की बात तो यह है कि जम्मू-कश्‍मीर को आजादी की जंग की राह पर चलाने वाले शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को गिरफ्तार करके पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कश्‍मीर के संबंध में की गईं अपनी अनेकों भूलों में से एक को सुधारने की कोशिश की थी, परन्तु 55 वर्षों से खुलेआम किसी न किसी रूप में कश्‍मीरियों को मजहब के आधार पर देशद्रोह के रास्ते पर चलाते आ रहे नेशनल कांफ्रेंस, पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, हुर्रियत कांफ्रेंस और कांग्रेस के कष्मीरी नेताओं को किसी ने हाथ नहीं लगाया। उलटा तुष्टिकरण की राजनीति के तहत ऐसे कईं समझौतों और वार्ताओं को अंजाम दिया गया जिनसे कश्‍मीर में अलगाववाद को हवा मिली। और अब श्रीअमरनाथ श्राईण बोर्ड से जमीन वापिस लेकर प्रदेश व केन्द्र की सरकारों ने न केवल कश्‍मीरी राष्ट्रीयता के झण्डाबरदारों के आगे समर्पण किया है बल्कि इन तत्वों को अपनी कट्टरपंथी कश्‍मीरियत के एजैंडे पर चलने के लिए प्रोत्साहित भी किया है। अन्यथा तो यदि भारत राष्ट्र के भीतर एक और राष्ट्र स्वतंत्र कश्‍मीर का राग अलापने वालों की अब तक खैर नहीं होती।

विदेशों में उपजी तहजीब कश्‍मीरियत नहीं हो सकती
स्वतंत्र कश्मीर राष्ट्र का नारा बुलंद करने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि राष्ट्र एक सांस्कृतिक अवधारणा होती है, राजनीतिक ईकाई नहीं। जिस मजहब अथवा संस्कृति के आधार पर कश्मीरियत को राष्ट्रीयता बताया जा रहा है वह मजहब अथवा संस्कृति कश्मीर की जमीन पर नहीं जन्मी। इस संस्कृति के निर्माताओं में से एक भी कश्मीरी नहीं था। यह संस्कृति विदेशी हमलावरों के साथ आई। इन हमलावरों ने कश्मीर की पांच हजार वर्श पुरानी संस्कृति, इसके संरक्षकों और अनुयायियों को तहस नहस करके विदेश में उपजी एक तहजीब को थोप दिया। कितनी अजीब बात है कि इस विदेशी आक्रामक तहजीब का डटकर मुकाबला करने और अपनी कुर्बानियाँ देकर कष्मीरियत के इस प्राचीन और सनातन स्वरूप को बचाकर रखने वाले कश्मीरी हिन्दुओं को उनकी धरती से विस्थापित होना पड़ा और उधर इन विदेशी हमलावरों के आगे कायरतापूर्वक घुटने टेक कर कश्मीरयत के असली चेहरे को बिगाड़ने वाले लोग आज कश्मीर के मालिक बनकर कश्मीरी राष्ट्र की दुहाई दे रहे हैं। इन लोगों ने अपने ही पूर्वजों की स्वदेशी कश्मीरियत को तहस-नहस करके विदेश से आये आक्रमणकारियों की तहजीब को कश्मीरियत बना दिया।

जाहिर है कि यह विदेशी तहजीब और मजहब न ही कश्मीरियत और न ही राष्ट्र हो सकती है। ऐसी कश्मीरियत जिसमें कश्मीरी हिन्दुओं का कोई स्थान नहीं, जिसमें कश्मीर की प्राचीन वास्तविक संस्कृति के लिए कोई जगह नहीं और जिसमें कश्मीर के 5 हजार वर्ष पुराने गौरवशाली इतिहास का कोई आधार नहीं, राष्ट्र का रूप नहीं ले सकती। अलगाववादी कश्मीरी नेता जिस मजहबी जनून को राष्ट्र बता रहे हैं वह हिन्दू विहीन कश्मीरियत वास्तव में मुस्लिम राष्ट्र है। राष्ट्रीयता का भाव राष्ट्र की मूल संस्कृति को समझे बिना जागृत नहीं हो सकता। भारत तो प्रांरभ से ही एक राष्ट्र, एक जन और एक संस्कृति के रूप में रहा है और कश्मीर इसी भारत राष्ट्र का अभिन्न हिस्सा था, है और रहेगा।

मजहब बदलने से पुरखे नहीं बदलते है
अत: आज के कश्मीरी आवाम खासतौर पर कश्मीरी युवकों को कश्मीरी राष्ट्र का शोर मचाने वाले नेताओं के चंगुल से निकल कर अपने हिन्दू पूर्वजों द्वारा विकसित भारत राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो जाना चाहिए। इसी रास्ते से कश्‍मीरियत की रक्षा होगी। कश्मीरी युवकों को समझना चाहिए कि उनकी रगों में हिन्दू पूर्वजों का खून है। शेष देश की भांति कश्मीर के भी हिन्दू और मुसलमानों के समान पूर्वज हैं, समान इतिहास है, समान संस्कृति है और धरती भी समान है। इसलिए हिन्दू और मुसलमानों की राष्ट्रीयता भी एक ही है। मात्र मजहब बदलने से अथवा पूजा के तौर तरीके बदलने से पुरखे नहीं बदल जाते तो फिर बाप-दादाओं की संस्कृति और राष्ट्रीयता कैसे बदल सकती है? कश्‍मीरी युवकों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि अपने पूर्वजों की तहजीब पर आधारित कश्‍मीरियत को सुरक्षित रखने से इस्लामी सिंध्दांत भी सुरक्षित रहेंगे। कश्‍मीर के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अपने खून से जिस कश्‍मीरियत को सींचा है उस खून से बगावत करने का रास्ता कश्‍मीर के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। हथियार बंद कश्‍मीरी आतंकियों के कुकृत्यों से सारा इस्लामिक जगत बदनाम हो रहा है।
अत: कश्‍मीरी नेताओं द्वारा मचाया जा रहा विदेशी कश्‍मीरियत और कश्‍मीरी राष्ट्र का शोर बेबुनियाद, हिंसक, हिन्दू विरोधी, गैर जिम्मेदाराना और इस्लाम के असूलों के भी खिलाफ है। इस्लाम यदि भाईचारे की शिक्षा देता है तो फिर यह खून खराबा क्यों? जो रास्ता कश्‍मीर के अलगाववादी नेताओं और आतंकियों ने अख्तियार किया है उससे कश्‍मीर, कश्‍मीरियत और इस्लाम की तौहीन के सिवा कुछ नहीं हाथ लगेगा। पाकिस्तान अथवा कट्टरपंथी मुल्ला-मोलवियों के बहकावे में आकर अपने कश्‍मीर की हरी-भरी वादियों को न उजाड़ें। स्वदेशी कश्‍मीरियत के साथ पुन: जुड़कर विदेशी कश्‍मीरियत को अलविदा कहें।(आस्था पर आघात पुस्तक से साभार)

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