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Thursday, 7 August, 2008

अखण्ड भारत


-अखण्ड भारत- यह सांस्कृतिक संकल्पना है, राजनैतिक नहीं।

-जिस तरह स्वाधीनता से पहले प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए स्वाधीनता की भावना प्रेरणा का मुख्य स्रोत हुआ करती थी उसी तरह स्वाधीनता के बाद अखण्ड भारत का स्वप्न प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए प्रेरणा का मुख्य स्रोत होना चाहिए और इस स्वप्न को साकार करने के लिये उसको सतत् क्रियाशील रहना चाहिए।

-विभाजन का मूल कारण है राष्ट्र और संस्कृति के बारे में भ्रामक धारणा। अंग्रेजों के जाल में हमारा नेतृत्व फंसा। तबसे राष्ट्र और संस्कृति के विषय में सर्वसामान्य जनता की भी धारणा भ्रामक हो गई। मिला-जुला राष्ट्र और मिली-जुली संस्कृति के विचार के कारण एक राष्ट्र, एक संस्कृति की बात गलत लगने लगी।

-स्वाधीनता संग्राम के एक प्रमुख नेता जवाहरलाल नेहरू कहा करते थे कि "We are a nation in the making" अर्थात् ''हम राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है''। अंग्रेजों ने यह संभ्रम फैलाने का प्रयास किया कि भारत कभी एक राष्ट्र रहा ही नहीं, उन्‍होंने इसे एक राष्ट्र बनाया है।

-अंग्रेजों की शह से पुष्ट हुई मुस्लिम लीग ने 1940 में देश के विभाजन की मांग की, अंग्रेजों ने 3 जून 1947 को विभाजन की योजना प्रस्तुत की और 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को देश का विभाजन हो गया।

विभाजन के बीज:
1906 में की गई पृथक निर्वाचक-मण्डल की मांग को भारत विभाजन की दिशा का पहला कदम कहा जा सकता है। यह स्पष्ट रूप से मुस्लिम अलगाववाद था और इसे अंग्रेजों का समर्थन प्राप्त था।
1906 में अड़तालीसवें शिया इमाम आगा खां के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल लार्ड मिण्टो से मिला। इसकी प्रमुख मांग थी- मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचक मण्डल। लार्ड मिण्टो ने इस मांग के प्रति अपनी सहमति जाहिर की और आगे चलकर 1909 के मार्ले-मिण्टो सुधारों में इसे सम्मिलित किया।
तुष्टीकरण के अंतर्गत शर्तों के आधार पर मुसलमानों को स्वाधीनता संग्राम में सम्मिलित करने के लिए कांग्रेस ने राष्ट्रीय मानबिन्दुओं के साथ समझौते किए। 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में प्रख्यात गायक पं। पलुस्कर ने जैसे ही 'वन्देमातरम्' का गायन प्रारंभ किया वैसे ही कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली ने यह कहते हुए गायन को रोकने का प्रयास किया कि इसमें मूर्ति पूजा है इसलिए इससे मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है मंच पर आसीन एक भी नेता ने इसका विरोध नहीं किया। पं. पलुस्कर ने मोहम्मद अली को यह कहकर चुप कर दिया कि मुझे यहां 'वन्देमातरम्' गाने के लिए बुलाया गया है और मैं तो गाऊंगा। इसके बाद उन्होंने संपूर्ण 'वन्देमातरम्' गाया और उस दौरान मोहम्मद अली मंच से उठकर चले गये। आगे चलकर 1937 में यह देखने के लिए एक समिति बनाई गई कि 'वन्देमातरम्' का कौन सा हिस्सा मुसलमानों के लिए आपत्तिाजनक है। उनके निष्कर्ष के अनुसार ' वन्देमातरम्' के केवल पहले दो पद ही गाये जायेंगे ऐसा तय हुआ और आगे का 'वन्देमातरम्' निकाल दिया गया। आज भी हमारे स्वीकृत राष्ट्रगीत 'वन्देमातरम्' में पहले दो पद ही हैं, संपूर्ण 'वन्देमातरम्' नहीं है।

मोहम्मद अली जिन्ना की अध्यक्षता में 1927 में प्रमुख मुस्लिम नेताओं की एक बैठक हुई। इसमें उनकी मांगें ''चार सूत्र'' के रूप में प्रस्तुत की गई इस समय तक पृथक निर्वाचन-मंडल वाली बात निष्प्रभावी हो चुकी थी, अत: चार सूत्रों के बदले पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर आरक्षण वाले संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की बात स्वीकार करने की बात कही गई-

(1) सिंध का मुंबई प्रांत से अलग किया जाये
(2) पश्चिमोत्तार सीमा प्रांत और ब्लूचिस्तान का स्तर बढ़ाकर उन्हें पूर्ण गवर्नर का प्रांत बनाया जाये।
(3) पंजाब और बंगाल इन मुस्लिम बहुल प्रांतों में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाये।
(4) केन्द्रीय विधानमंडल में कम से कम एक तिहाई सदस्य मुसलमान हों।

सभी मांगें खतरनाक थीं। विशेष रूप से सिंध को मुंबई से अलग करने की। क्योंकि इससे सिंध मुस्लिम बहुल प्रांत बननेवाला था। (सिंध के मुस्लिम बहुत प्रांत बनने से ही विभाजन के समय वह पाकिस्तान में शामिल हो गया, जबकि यदि वह हिन्दू-बहुल मुंबई प्रांत का हिस्सा होता तो सिंध आज भारत में होता।) कांग्रेस ने पहली तीन मांगें स्वीकार कर लीं। जब जिन्ना ने देखा कि कांग्रेस इतना झुक रही है तो उसने 1928 में ''जिन्ना के चौदह सूत्र' प्रस्तुत कर दिए। इनमें पिछली सारी मांगें तो थी हीं, साथ में कुछ और मांगें भी थीं, जिनमें प्रमुख थी-

(1) पंजाब, बंगाल और पश्चिमोत्तार सीमाप्रांत का कोई ऐसा पुनर्गठन न हो जिससे उनका मुस्लिम बाहुल्य समाप्त हो।
(2) केन्द्रीय और सभी प्रांतीय मंत्रिकंडलों में कम से कम एक तिहाई मुस्लिम हों।

साथ ही इसमें फिर से पृथक् निर्वाचक मण्डल की मांग की गई थी। इसमें यह भी घोषणा की गई कि मुसलमान मात्र एक समुदाय नहीं, बल्कि विशेष दृष्टि से स्वयं में एक राष्ट्र है। इस तरह कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण अलगाववादी मुस्लिम नेताओं की मांगें बढ़ती ही गई।

1930 में लंदन में हुए प्रथम गोलमेज सम्मेलन का कांग्रेस ने नमक सत्याग्रह के कारण बहिष्कार किया इस कारण वह निष्फल हुआ। 1939 में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की ओर से गांधीजी सम्मिलित हुए। आगा खां को मुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। इसमें कोई सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं निकला परन्तु इस सम्मेलन में ही पहली बार 'पाकिस्तान'' यह शब्द अस्तित्व में आया।
1939 में जब द्वितीय विश्वयुध्द आरंभ हुआ तब भारतीयों का समर्थन और सहयोग प्राप्त करने के लिए वाइसराय लिनलिथगोने गांधीजी के साथ जिन्ना को भी वार्ता क के लिए आमंत्रित किया। इस तरह अंग्रेजों ने जिन्नों को गांधीजी के बराबरी का स्थान दिया। कांग्रेस ने युध्द समाप्ति के बाद भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता की मांग की। परन्तु मुस्लिम लीग ने हमेशा की तरह केवल अलगाववाद पर आधारित मुस्लिम हित ही सामने रखा, भारत की स्वाधीनता के संबंध में कोई बात नहीं की। उन्होंने दो मांगें की-

1) कांग्रेस-शासित प्रांतों में मुसलमानों को न्याय और उचित व्यवहार मिलना चाहिए।
(2) मुस्लिम लीग की सहमति के बिना भारत की संवैधानिक प्रगति के प्रश्न पर न तो कोई घोषणा की जाये और न ही कोई संविधान बनाया जाये।

अंग्रेजों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अखिल इस्लामवाद को खाद-पानी देना प्रारंभ किया ताकि युध्द के दौरान मुस्लिम देश उनके निकट आ जायें। इसका लाभ भी मुस्लिम लीग उठा रही थी। ऐसे वायुमंडल में 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग की। इसे ''पाकिस्तान प्रस्ताव'' के रूप में जाना जाता है।

1939 में भारत के कम्युनिस्ट द्वितीय विश्वयुध्द में अंग्रेजों के विरूध्द थे क्योंकि जर्मनी के हिटलर ने रूस के स्टालिन से संधि की थी। परन्तु जब जर्मनी ने 1941 में रूस पर आक्रमण कर दिया तब अपनी पहले की भूमिका बदलकर वे अंग्रेजों के समर्थक बन गए। इस कारण उन्होंने भी 1942 के ''भारत छोड़ों'' आंदोलन का विरोध किया। साथ ही उन्होंने मुस्लिम लीग की देश विभाजन की मांग का समर्थन किया और अपने अनेक मुस्लिम सदस्यों को निर्देश दिया कि द्वि-राष्ट्र सिध्दांत को बौध्दिक बल देने के लिए वे मुस्लिम लीग में शामिल हों। उन्‍होंने तो ऐसा कहना भी प्रारंभ किया कि प्रत्येक भाषाई इकाई अलग राष्ट्र है और उन्हें अलग होने का अधिकार है। इस तरह अंग्रेज-लीग-कम्युनिस्ट गठबधंन भारत की स्वाधीनता और अखण्डता की जड़ें काटने में जुट गया।

1945-46 में जो चुनाव हुए उनमें कांग्रेस 'अखण्ड भारत' के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी तो मुस्लिम लीग 'पाकिस्तान' के नारे के साथ। इस चुनाव में जहां एक ओर सभी सामान्य क्षेत्रों में कांग्रेस विजयी रही और केन्द्रीय धारा सभा में उसे 91।3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए वहीं दूसरी ओर मुस्लिम लीग को सभी मुस्लिम सीटों पर विजय मिली। उसके मतों का प्रतिशत 86.8 था। इस बात से लीग के नेता उन्मत्ता हुए और वे खुली लड़ाई की चुनौतियां देने लगे।

कांग्रेस ने 8 मार्च 1947 की बैठक में इस घोषणा का स्वागत किया और मांग की कि पंजाब और बंगाल का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन किया जाये। इस तरह कांग्रेस ने यह संकेत दे दिया कि उसने पाकिस्तान की मांग को सिध्दांत रूप में स्वीकार कर लिया है और वह आधा पंजाब और आधा बंगाल भारत में लाने के लिए प्रयत्नशील है।

माउंटबेटन ने 2 जून को मेनन योजना सबके सामने रखी। कांग्रेस ने इसे इस शर्त पर स्वीकार किया कि मुस्लिम लीग भी इसे बिना किसी शर्त के स्वीकार करे। 2 जून की रात्रि को जब माउंटबेटन ने जिन्ना से भेंट की तो उसने कहा कि लीग को अखिल भारतीय परिषद की सहमति प्राप्त करने के लिए एक सप्ताह चाहिए। इस पर माउंटबेटन ने उसे स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि तुरंत स्वीकृति नहीं मिली तो कांग्रेस भी अपनी स्वीकृति वापस ले लेगी और उसके हाथ से पाकिस्तान प्राप्ति का अवसर सदा-सदा के लिए निकल जाएगा। तब जिन्ना ने भी अपनी स्वीकृति दी।

3 जून को एटली ने हाउस ऑफ कॉमंस में योजना की अधिकृत घोषणा की इसलिए इसे '3 जून योजना' कहा गया। इसमें सत्ता हस्तातंरण की तिथि जून 1948 से पीछे खिसककर 15 अगस्त 1947 कर दी गई।

14-15 जून को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में 3 जून योजना को स्वीकृति दी जानी थी। वरिष्ठ नेताओं में से केवल बाबू पुरुषोत्ताम दास टंडन ने विभाजन की 3 जून योजना का विरोध किया, परंतु उनके भाषण पर तालियों की भारी गड़बड़ाहट हुई। ऐसे समय गांधीजी ने 3 जून योजना का समर्थन किया। प्रस्ताव के पक्ष में 157 और विपक्ष में 29 मत पड़े। 32 सदस्य तटस्थ रहे। इस तरह वह प्रस्ताव पारित हो गया। (यहां यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि जिस कांग्रेस ने 1945-46 का चुनाव ''अखंड भारत'' के नारे पर लड़ा और जीता उसे विभाजन स्वीकार करने का क्या नैतिक अधिकार था?) इस प्रकार स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकृति देकर राष्ट्रीय एकता और अखंडता के मूल प्रश्न पर आत्मसमर्पण कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 14-15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को देश का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन होकर उसे स्वाधीनता मिली।

मुस्लिम लीग की हठधर्मिता और हिंसात्मक कारवाइयों के कारण विवश होकर कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकृति दी। परंतु यदि यह स्वीकृति नहीं दी जाती तो क्या होता? अधिक से अधिक गृहयुध्द होता। किंतु क्या देश की अखंडता के लिए गृहयुध्द नहीं किया जा सकता? अमरीकी इतिहास में अब्राहम लिंकन ने देश विभाजन और गृहयुध्द में से गृहयुध्द को चुना और अंततोगत्वा वे देश को अखंड रखने में सफल हुए। आज कोई भी उन्हें युध्दपिपासु नहीं कहता, उन्हें महापुरुष माना जाता है।

कभी-कभी ऐसा विचार भी मन में आ सकता है कि जब हमारे श्रध्देय नेताओं ने विभाजन स्वीकार कर लिया तो हमने भी उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। परंतु जरा विचार करें। जितने भी लोगों ने स्वाधीनता के लिए प्रयास किये, उनकी आंखों के सामने अखंड भारत था या खंडित भारत। इसका उत्तर - अखंड भारत।

द्वितीय विश्वयुध्द के बाद जर्मनी का विभाजन हो गया। इतनी सख्ती थीं कि अब यह विभाजन सदैव के लिए है ऐसा लगने लगा था परन्तु आज जर्मनी फिर से अपने अखण्ड रूप में है। वियतनाम का एकीकरण हो चुका है।

अखंड भारत के विषय को आम लोगों के हृदय तक पहुंचाने के लिए निम्न उपाय करने होंगे- -'अखण्ड भारत स्मृति दिवस' का आयोजन करना, ताकि युवा पीढी के सामने अखण्ड भारत का सपना बरकरार रहे।
-अखण्ड भारत का चित्र अपने कमरों में लगाना, यह हमारे आंखों के सामने रहेगा जिससे हमारा संकल्प और मजबूत होता रहे।

महापुरूषों के विचार:

मैं स्पष्ट रूप से यह चित्र देख रहा हूं कि भारतमाता अखण्ड होकर फिर से विश्वगुरू के सिंहासन पर आरूढ है।
-अरविन्द घोष

आइये, प्राप्त स्वतंत्रता को हम सुदृढ़ नींव पर खड़ी करें अखंड भारत के लिए प्रतिज्ञाबध्द हों।
-स्वातंत्र्यवीर सावरकर

अखंड भारत मात्र एक विचार न होकर विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प है। कुछ लोग विभाजन को पत्थर रेखा मानते हैं। उनका ऐसा दृष्टिकोण सर्वथा उनुचित है। मन में मातृभूमि के प्रति उत्कट भक्ति न होने का वह परिचायक है।
-पंडित दीनदयाल उपाध्याय

पाकिस्तान तो इस्लामी भावना के ही विपरीत है। यह कैसे कहा जा सकता है कि जिन प्रांतों में मुसलमान अधिक है वे पाक हैं और दूसरे सब प्रांत नापाक हैं।
-मौलाना अबुल कलाम आजाद

पश्चाताप से पाप प्राय: धुल जाता है किंतु जिनकी आत्मा को विभाजन के कुकृत्य पर संतप्त होना चाहिए था वे ही लोग अपनी अपकीर्ति की धूल में लोट लगाकर प्रसन्न हो रहे हैं। आइए, जनता ही पश्चाताप कर ले-न केवल अपनी भूलचूक के लिए, बल्कि अपने नेताओं के कुकर्मों के लिए भी।
-डा. राम मनोहर लोहिया

हम सब अर्थात् भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश इन तीनों देशों में रहने वाले लोग वस्तुत: एक ही राष्ट्र भारत के वासी हैं। हमारी राजनीतिक इकाइयां भले ही भिन्न हों, परंतु हमारी राष्ट्रीयता एक ही रही है और वह है भारतीय।
-लोकनायक जयप्रकाश नारायण

पिछले चालीस वर्ष का इतिहास इस बात का गवाह है कि विभाजन ने किसी को फायदा नहीं पहुंचाया। अगर आज भारत अपवने मूल रूप में अखंडित होता तो न केवल वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता था, बल्कि दुनिया में अमन-चैन कायम करने में उसकी खास भूमिका होती।
-जिए सिंध के प्रणेता गुलाम मुर्तजा सैयद

मुझे वास्तविक शिकायत यह है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के प्रति न केलव कांग्रेस अपितु महात्मा गांधी भी उदासीन रहे। उन्होंने जिन्ना एवं उनके सांप्रदायिक अनुयायियों को ही महत्व दिया। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि उन्होंने हमारा समर्थन किया होता तो हम जिन्ना की हर बात का खंडन कर देते और विभाजनवादी आंदोलन के आरंभ काल में पर्याप्त संख्या में मुसलमानों को राष्ट्रवादी बना देते।
-न्यायमूर्ति मोहम्मद करीम छागला

4 comments:

नलिन said...

आपका लेख पढ कर ढेर सारी जानकरी मिली । ऐसे रोचक और ज्ञानवर्घक चिट्ठे लिखते रहीए ।

अनिल रघुराज said...

अगर अखंड भारत राजनैतिक नहीं, सांस्कृतिक संकल्पना है, तब तो कोई समस्या ही नहीं है। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में हमारी संस्कृति के विभिन्न रूप मिल जाते हैं। यहां तक कि थाईलैंड, अफगानिस्तान और इंडोनेशिया तक में। लेकिन संस्कृति अंदर से आती है थोपी नहीं जा सकती। अभी नेपाल में उपराष्ट्रपति के हिंदी में शपथ लेने पर कैसा बवाल मचा, आप सब ने पढ़ा ही होगा। रही बात भारत में सांस्कृतिक अखंडता की तो इसकी शुरूआत 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की भावना से करनी होगी। एकल और अखंड भारत की भावना को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने पहले कांग्रेस बनाई, फिर उन्होंने ही अपने दलालों से 1906 में पृथक निर्वाचक मंडल की मांग उठाई। गांधी की अगुआई में कांग्रेस ने कभी भी ज़मीनी आंदोलनों को एक हद से ज्यादा पनपने नहीं दिया और 1857 तक चली आई हिंदी मानस की एकता चूर-चूर की जाती रही है। इसलिए चीजें जहां से टूटी हैं, वहीं से उनको जोड़ने की शुरुआत भी करनी होगी। दलाल सोच का नाश करना होगा। धार्मिक आधार पर विभाजन और ध्रुवीकरण की राजनीति बंद करनी होगी। किसानों को आधार बनाना होगा। तब जाकर हम सांस्कृतिक रूप से अखंड हो सकेंगे।

प्रभाकर पाण्डेय said...

आप से मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई। आपके विचारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया। भारत माता की जय।

Er. B. N. Thakur said...

बहुत बढ़िया।