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Sunday 24 August 2008

अब घटना की निंदा से नहीं चलने वाला है काम : मृत्युंजय दीक्षित

देश में परमाणु करार की आड़ में जिस प्रकार की राजनैतिक अस्थिरता व्याप्त हुई उसका लाभ उठाकर आतंकवादियों ने संचार प्रौद्योगिकी शहर बंगलुरू व गुजरात की राजधानी अहमदाबाद को अपना निशाना बनाकर जहां एक ओर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई वहीं अब वे धमकियों के सहारे यह भी तब रहे हैं कि वे अब देश के किसी भी हिस्से में, किसी भी शहर में, प्रमुख स्थल व भीड़-भाड़ वाले इलाके को अपना निशाना बनाने में कामयाब हो सकते हैं। अब आतंकवादियों की पहुंच लगभग पूरे देश में हो चुकी है।

संप्रग सरकार के कार्यकाल में आतंकवाद का दायरा बेहद विस्तृत व भयावह होता जा रहा है। देश की जनता में भय व असुरक्षा का वातावरण व्याप्त हो गया है। बंगलुरू व अहमदाबाद में हुए बम धमाकों के बाद दिल्ली से लेकर चेन्नई तक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के कई शहरों उत्तरप्रदेश के सभी प्रमुख स्थलों व शहरों में धमाके करने की धमकी आतंकवादी ई-मेल के द्वारा दे रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में धमाके, धमकी आतंकवाद व आतंकवादी दहशतगर्दी जैसे शब्द दिनभर बोले जा रहे हैं। मुस्लिम आतंकवाद के साये में पूरा देश आ गया है वहीं नक्सलवाद तथा पूर्वोत्तर के आतंकवाद की समस्या भी देश की आंतरिक सुरक्षा को बड़ी चुनौती प्रस्तुत कर रहा है। हर आतंकवादी घटना के बाद केन्द्रीय गृहमंत्री रटा-रटाया बयान देते रहते हैं। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री राजनैतिक दलों के नेतागण केवल घटनास्थल का दौरा करके अपनेर् कत्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। ताजा धमाकों ने सरकारी तंत्र की नाकामी, सुरक्षा व्यवस्था व खुफिया विफलता को उजागर किया हे। हर धमाकों के बाद लश्करे तैयबा, जैश ए मोहम्मद, सिमी व नये आतंकी संगठन इण्डियन मुजाहिदीन का नाम देश के विभिन्न समाचार चैनलों में उछलता है लेकिन अब तक जितने भी धमाके हुए हैं उन्हें अंजाम देने वाले अभियुक्तों व साजिशों का षड़यंत्र करने वाले लोगों तक पहुंचने में देश की खुफिया सएजेंसियां पूरी तरह से नाकाम रही हैं।

न्यायिक व्यवस्था इतनी लचर है कि वर्ष 1992 में मुंबई में हुए बम धमाकों के दोषियों को सजा अभी तक नहीं हो पाई है, संसद भवन पर हमले के आरोपी मोहम्मद अफजल को फांसी की सजा राजनैतिक कारणों से अभी तक नहीं हो पा रही हें। देश की विभिन्न जेलों में अनेक ऐसे खूंखार आतंकवादी बंद पड़े हैं जिन पर प्रारंभिक मुकदमा भी ठीक से प्रारंभ नहीं हो सका है। देश में मुस्लिम आतंकवाद की बढ़ोत्तरी का एक प्रमुख कारण लचर न्यायिक व्यवस्था व राजनैतिक अस्थिरता भी हैं। समाजवादी पार्टी के नेतागण मुस्लिम वोट बैंक के लालच में जामा मस्जिद में बैठक करते हैं व प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन सिमी का पूरा पक्ष लेते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री घटनाओं के बाद संघीय जांच एजेंसी बनाने की वकालत करते हैं। प्रधानमंत्री बैठकों में व्यस्त हो जाते हैं। वहीं विपक्ष के नेता पोटा कानून की जोरदार वकालत करने लगते हैं। लेकिन धीरे-धीरे फिर पूर्व की भांति सब कछ सामान्य जाता है।

बंगलुरु व अहमदाबाद की घटनों के बाद टी।वी. पर अनेक बहसें आयीं तथा उसमें देश की महत्वपूर्ण हस्तियों ने अपने विचार रखे। एक टी.वी. कार्यक्रम में कांग्रेसी सांसद सचिन पायलट अपने विचार व्यक्त कर रहे थे कि आतंकवाद को जड़ से मिटाने के लिए प्रत्येक राजनैतिक विचारधारा के लोगों को अपनी विचारधारा से ऊपर उठक राष्ट्रहित में समान रूप से सोचना होगा। यह तो वही बात हुई की सूप बोले तो, चलनी क्या बोले जिसमें 72 छेद। हां, एक अधिकारी अवश्य कुछ दमदार विचार रख रहे थे कि आतंकवादी केवल आतंकवादी होता है उसका अपना एक मिशन होता है। आतंकवादियों को किसी भी प्रकार की कानूनी व मानवाधिकारी का हक नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर के आतंकवादियों को राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए उनके परिवारों को जो आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है वह पूरी तरह से गलत है। इन सबसे आतंकवादी राष्ट्र की मुख्यधारा में तो नहीं शामिल हो रहे हैं लेकिन उनको प्रोत्साहन अवश्य मिल रहा है।

यह बात सही है कि आतंकवादी, आतंकवादी है। उसको किसी भी प्रकार का संरक्षण राष्ट्र विरोधी है। अब समय आ गया है कि सर्वसम्मति से आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई छेड़ी जाये। आतंकवाद के चलते विकास की प्रक्रिया अवरूध्द हो रही है। पर्यटन पर विपरीत असर पड़ रहा है। भारत की छवि एक बेहद कमजोर, दिशाहीन, बेचारे राष्ट्र के रूप में उभर रही है। जो राष्ट्र स्वयं की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाता हैउसके साथ संपूर्ण विश्व देता है। जब तक हम स्वयं साहसिक कदम नहीं उठाएंगे, तब तक हम पर हमले होते रहेंगे और हम निन्दा स्तुति करते रहेंगे। (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

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