हितचिन्‍तक- लोकतंत्र एवं राष्‍ट्रवाद की रक्षा में। आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

Friday 22 August 2008

सिमी के माध्यम से आतंकवाद का राजनीतिकरण

लेखक- रवीन्द्र मोहन यादव

सिमी (स्टूडेन्ट इस्लामिक मूवमेन्ट ऑफ इण्डिया) जिसके मार्गदर्शक हैं ओसामा बिन लादेन, भारत को दारूल हरब से दारूल इस्लाम में परिवर्तित करने के प्रमुख उद्देश्य हेतु दरकार है महमूद गजनवी की, उक्त घोषित उद्देश्यों की सार्वजनिक रूप से जानकारी कानपुर में आयोजित सम्मेलन के प्रचार हेतु प्रकाशित पोस्टर के माध्यम से जन सामान्य को हुई। कानपुर सम्मेलन की कार्यवाही एवं पारित प्रस्तावों के माध्यम से जिस प्रकार के विचारों की जानकारी सामने आई तो जन सामान्य के मन में उक्त संगठन के बारे में कट्टरवादी व हिंसक गतिविधियों में विश्वास रखने वाली छवि उभरकर आई। जब उक्त संगठन पर प्रतिबंध लगाने की बात आई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मोर्चा सम्भालते हुए सिमी को देशभक्तों का संगठन घोषित करते हुए मांग रख दी यदि ऐसा किया जाये तो उससे पहिले आर।एस.एस., बजरंग दल, दुर्गावाहिनी, शिवसेना आदि फिरकापरस्त, साम्प्रदायिक संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाया जाये। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव जिनकी सिमी पर राय आज तक अडिग एवं कायम है, कांग्रेस के साथ आने के पश्चात् भी श्री यादव सिमी को दी गई क्लीन चिट पर कायम रहेंगे, यह देखना है कि केन्द्रीय राजनीति का नया गठजोड़ सिमी के प्रश्न पर किसे प्रभावित करता है।

राष्ट्र विरोधी हिंसक गतिविधियों में सिमी की भागीदारी के पुख्ता सबूतों के अभाव एवं केन्द्रीय गृह मंत्रालय की निष्क्रियता के चलते दिल्ली उच्च न्यायालय के विशेष ट्रिब्यूनल ने सिमी पर लागू प्रतिबन्ध को समाप्त करने का निर्णय सुनाया था। उक्त विषय पर केन्द्रीय गृह मंत्रालय की होती किरकरी व गृहमंत्री के त्यागपत्र की मांग प्रारम्भ होते ही सिमी पर प्रतिबंध लागू रखने का मामला सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया, जिस पर माननीय न्यायधीशों ने 21 दिन का समय देकर सरकार को पुष्ट प्रमाणों सहित आरोप पत्र प्रस्तुत करने और सिमी को अपने बचाव हेतु पक्ष प्रस्तुत करने का आदेश जारी करते हुए प्रतिबंध को लागू रहने दिया। सिमी के घोषित उद्देश्य और मार्गदर्शक पुख्ता प्रमाण ही पर्याप्त है कि अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी सरगना ओसामा बिन लादेन उसका प्रेरणास्रोत है और जिस मोहम्मद गजनवी ने 17 बार हमला करके भारतीयों की आस्था-विश्वास के केन्द्र धार्मिक मन्दिरों को जमकर लूटा ही नहीं वहाँ पर स्थापित मूर्तियों को खण्डित किया और ऐसा न करने देने से रोकने हेतु जो भी आया उसे मौत के घाट उतार दिया। हिंसा के माध्यम से भारत में इस्लाम को प्रभावी बनाने हेतु आज भी जिन्हें महमूद गजनवी की दरकार है उनके साथ वोट की राजनीति करने वाले दल और उनके नेता मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव खुलकर सिमी की हिमायत में आकर खड़े हो गऐ हैं।

सिमी पर प्रतिबंध के विषय पर उत्तर प्रदेश एवं बिहार के प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव एवं वर्तमान केन्द्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने सिमी के पक्ष में खड़े होकर एक नयी बहस को जाने-अनजाने में प्रारम्भ कराने का अवसर प्रदान कर दिया है, क्या अब आतंकवाद का राजनीतिक संस्करण आने वाला है। सिमी के विषय पर चर्चा से पूर्व संसद में हमले का आरोपी आतंकवादी सरगना व मास्टर माइंड अफजल गुरू को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फांसी सुनाये एक अरसा व्यतीत हो गया है। राष्ट्रपति के पास जीवनदान वाली क्षमा याचिका के द्वारा फांसी को निलम्बित रखना आतंकवाद को बढ़ावा देने का कारण बनता जा रहा है वहीं अमरनाथ श्राइन बोर्ड को आवंटित भूमि निरस्त करने के पीछे भी कश्मीर घाटी में संकरे अलगाववादी तत्वों के हौंसले बढ़ाने का कारण भी केन्द्रीय सरकार की तुष्टिकरण नीति को स्पष्ट करता है। राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति हेतु आखिर कब तक राष्ट्रहितों की बलि चढ़ाई जाती रहेगी यह राष्ट्रभक्तों की चिंता का विषय बनता जा रहा है।

देश में जब-जब आतंकवादी घटना को अंजाम देकर निर्दोषों का रक्त बहाया गया दिल दहला देने वाली घटनाओं के पश्चात् केन्द्रीय सरकार खुफिया संगठनों की रिपोर्ट के आधार पर सीमा पार से प्रेरित देश में कार्यरत आतंकवादी संगठनों के साथ सिमी के लिप्त होने की बात कहते रहे हैं। सिमी के लिप्त रहने के पुख्ता सबूतों के साथ न्यायालयों में चौकस पैरवी का दायित्व सरकार का है यदि सबूत नहीं है तो जनता को भ्रमित करने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। आतंकवादी हिंसा की प्रमुख घटनाओं पर ध्यान दें तो याद आती है जुलाई 08 माह में बैंगलोर (कर्नाटक), अहमदाबाद (गुजरात) में 49, 13 मई 08 जयपुर राजस्थान में 63, 25 अगस्त 07 हैदराबाद तीन विस्फोटों में 40, 18 मई 07 बम विस्फोट से 11, 19 फरवरी 07 पाकिस्तान जा रही ट्रेन में दो विस्फोट में 66, 8 सितम्बर 06 माले गांव बम धमाकों में 22, 11 जुलाई 06 मुम्बई लोकल ट्रेन व स्टेशनों पर बम विस्फोट में 180, 7 मार्च 06 वाराणसी संकट मोचन मंदिर सहित तीन स्थानों के बम धमाकों में 15, 29 अक्टूबर 05 दिल्ली तीन बम विस्फोटों में 66, 15 अगस्त 04 असम विस्फोट में 15 स्कूली बच्चे, 25 अगस्त 03 मुम्बई दो कार बम विस्फोट में 60, 13 मार्च 03 मुम्बई ट्रेन धमाकों में 11 जानें चली गयीं।

आतंकवादी घटनाओं में केन्द्रीय सरकार के मंत्रीगण और अधिकारी प्रमुख आतंकवादी संगठनों के साथ ही सिमी को भी दोषी मानते रहे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के विशेष ट्रिब्यूनल द्वारा सिमी को दोषी न मानने का निर्णय सुनाया है। इसके दो ही प्रमुख कारण बनते हैं, केन्द्रीय सरकार द्वार सिमी के विरूध्द पुख्ता सबूत न होने के बावजूद आरोप लगाना या सिमी का इन आतंकी गविधियों में हाथ नहीं होना। वैसे एक राज की बात यह भी है कि गली-मोहल्लों के गुण्डे पर्याप्त गवाही के अभाव में हत्या जैसे जघन्य अपराध से मुक्त हो जाते हैं। न्याय प्रणाली का सिध्दान्त है कि एक भी निर्दोष नहीं फंसना चाहिए चाहे कितने भी दोषी बच जायें, न्याय तो अंधा है उसे तो सबूत चाहिए दोषी को सिध्द करने के लिए और सबूत जुटाने का कार्य केन्द्रीय सरकार को करना है। उन्हें देश पर शासन करने हेतु एक समुदाय के वोटों को भी प्राप्त करना है। धर्म निरपेक्षता का सिध्दान्त इस तुष्टीकरण की राजनीति को बल प्रदान करता है।

सिमी पर दिल्ली उच्च न्यायालय के ट्रिव्यूनल का निर्णय तब आया जब 7 फरवरी 08 को सिमी पर लागू प्रतिबंध को दो वर्ष तक बढ़ाने का अनुरोध किया गया। अपने अनुरोध के साथ अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रहमण्यम् ने 75 से अधिक खुफिया ब्यूरो के अधिकारी एवं प्रदेशों के डी।जी.पी. की रिपोर्ट को आधार बनाया गया था, प्रस्तुत की थी। सरकार की तरफ से ट्रिव्यूनल को अनुरोध किया गया था कि सिमी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों सहित आतंकवादी हमलों में लिप्त रहा है उक्त प्रकरण को गम्भीरता से लेने की आवश्यकता है। मुम्बई लोकल ट्रेन धमाके, बैंगलोर, जयपुर एवं अहमदाबाद में बम विस्फोटों एवं सूरत में मिले जीवित बमों के मामले में सिमी का हाथ होने की पुष्ट सूचनायें हैं जिनके आधार पर सिमी पर प्रतिबन्ध लागू रखना अत्यन्त आवश्यक है।

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पाखण्ड पूर्ण राजनीति ने एक नया आयाम विकसित कर लिया है। अभी तक बाहुबली और अपराध जगत के सरगना नेताओं के तारणहार हुआ करते थे उन्होंने जब स्वयं राजनीति करने का बीड़ा उठाया तो राजनीति का अपराधीकरण बदल कर अपराध का राजनीतिकरण हो गया। अपने साथ है तो हृदय परिवर्तन हो गया है और दूसरे के साथ है तो दुर्दान्त अपराधी है। वही हाल मुस्लिम समाज के मतों को अपने दल के साथ जोड़ने की खातिर सीमाओं का उल्लंघन करते हुए तुष्टीकरण किया जा रहा है। आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त न होने की बात कहते हुए अलगाववादी संगठनों के साथ वोटों के लालची नेतागण हिमायत में खड़े देखे जाते हैं। इस प्रकार लगता है कि आने वाले समय में देश को आतंकवाद के राजनीतिकरण की अवधारणा से रूबरू होना पड़ेगा जो कि राष्ट्र की एकता व अखण्डता के साथ सामाजिक जीवन के ताने-बाने को क्षति पहुंचाने वाला साबित होगा। अभी समय है देश हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए छुद्र स्वार्थ पूर्ति करने वाले राजनैतिक दलों को अपना स्टैण्ड बदलना होगा अन्यथा ऐसे दलों को किसीदीन का न छोड़ने की पहल जनता को स्वयं करनी होगी तभी देश व समाज का कल्याण होना सम्भव होगा। (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

No comments: