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Friday, 14 November, 2008

कामरेड का जुर्म

यह सिंगुर गांव की तापसी मलिक है. इसने अपनी ज़मीन टाटा को देने से मना कर दिया. इस युवती के साथ एक रात इसकी ज़मीन पर ही सीपीएम के लोगों ने बलात्कार किया और ज़िंदा जला दिया.

नई दुनिया की संपादकीय टिप्‍पणी, 14 नवंबर, 2008

कामरेड का जुर्म
सिंगूर का जुर्म सूखने का नाम नहीं ले रहा। अब एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दो नेताओं को तापसी मलिक नाम की एक किशोरवय लड़की का यौन-उत्पीड़न कर उसकी निर्मम हत्या का दोषी पाया है। दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। तापसी की दिसंबर 2006 में हत्या की गई थी। सीबीआई ने इस केस की जांच की है।
कानून व्यवस्था की गारंटी करने वाली सरकार के अपने पार्टी कामरेड हत्या और यौन-उत्पीड़न जैसे मामलों में दोषी पाए जाएं, यह शर्म की बात है मगर दुर्भाग्य से माकपा के राज्य-नेतृत्व को शर्म आनी तो दूर, न्यायपालिका के प्रति भी उसमें सम्मान की भावना नहीं है।
दोनों मुजरिमों में से एक सुहृद दत्ता तो माकपा की सिंगूर इकाई के जोनल सचिव रह चुके हैं और स्थानीय माकपाई राजनीति में वरिष्ठ नेता माने जाते हैं। हत्या में दूसरा सहयोगी देबु मलिक भी माकपा का समर्थक है। बताते हैं कि सुहृद दत्ता के निर्देश पर उसने इस जघन्य कांड को अंजाम दिया। यह तथ्य इस हत्याकांड को एक राजनीतिक आयाम भी देता है क्योंकि तापसी तृणमूल कांग्रेस की कार्यकर्ता थी, जिसकी अगुआई में सिंगूर का आंदोलन चला। विरोधियों को यों सजा देने का रिवाज प्रजातंत्र में कबूल नहीं किया जा सकता। यह अपराध इसलिए और भी शर्मनाक बन जाता है कि निजी या राजनीतिक बदले की भावना से एक लड़की को निशाना बनाया गया। पश्चिम बंगाल में माकपा की इकाइयों पर पहले भी ऐसे इल्जाम लग चुके हैं। कानून व्यवस्था की गारंटी करने वाली सरकार के अपने पार्टी कामरेड हत्या और यौन-उत्पीड़न जैसे मामलों में दोषी पाए जाएं, यह शर्म की बात है मगर दुर्भाग्य से माकपा के राज्य-नेतृत्व को शर्म आनी तो दूर, न्यायपालिका के प्रति भी उसमें सम्मान की भावना नहीं है। माकपा की राज्य इकाई ने कोर्ट का फैसला मानने से इनकार करते हुए ऊपर की अदालत में इस सजा के खिलाफ अपील करने का निर्णय किया है। पार्टी को यह पूरा प्रकरण पार्टी और वाममोर्चा सरकार के दुश्मनों की 'चाल' लगता है। सरकारी पार्टी की राज्य कमिटी कोर्ट के एक फैसले पर ऐसा बयान दे तो जनतांत्रिक सोच के लोगों को चिंता होती है। निचले कोर्ट से सजा पाए, मुजरिमों को पूरा अधिकार है कि वे ऊपर की अदालतों में अपील करें, लेकिन यह काम मुजरिम घोषित किए गए व्यक्तियों का है, न कि किसी राजनीतिक दल का-चाहे सजा प्राप्त व्यक्ति उसका पदाधिकारी ही क्यों न हो। पश्चिम बंगाल में कानून की धज्जियां पहले ही कम नहीं उड़ी हैं, (नंदी ग्राम, सिंगूर-रिजवानूर मामले तो कुछ मिसालें हैं), माकपा की राजनीतिक परिपक्वता तो इससे साबित होगी कि पार्टी राज्य में एक विधिसम्मत और न्यायसम्मत व्यवस्था लागू करे ताकि कम्यूनिज्म के चीनी प्रणेता माओत्से तुंग के शब्दों में 'सैकड़ों फूलों को खिलने का मौका मिले।' 'जनतंत्र' या 'जनवाद' दोनों की सच्ची पहचान यही है।

2 comments:

विचार-मंथन said...

Communist
Party
of
India
(Murderer)

Suresh Chandra Gupta said...

यह कम्युनिस्टों का असली चेहरा है. इस संगीन जुर्म की सजा फांसी होनी चाहिए थी. कातिलों को उम्र कैद की हलकी सजा दे कर अदालत ने तापसी के साथ अन्याय किया है.