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Thursday 13 November 2008

संदेह के घेरे में क्यों हैं भारत के मुसलमान?

लेखक- मुजफ्फर हुसैन

भारतीय मुस्लिमों ने 1947 के बंटवारे के बाद पाकिस्तान न जाकर भारत में ही रहने का जो निर्णय किया था, क्या वह गलत था? स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने भाग लिया था, क्या वह इसलिए कि भारत में हो रही आतंकवादी घटनाओं के लिए एकमात्र उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाए? इसका उत्तर है- नहीं, और कदापि नहीं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जिहादी संगठनों द्वारा जिस तरह से आतंकवाद चलाया जा रहा है उसे जागरूक मुसलमानों का वर्ग जनता के बीच प्रभावी ढंग से नहीं रख सका है कि जिहादियों द्वारा इस प्रकार की हरकतें करने के पीछे उनका उद्देश्य क्या है? यह सवाल पूछने से पहले ही मुसलमानों के नेता यह कहने लगते हैं कि मुसलमान इस प्रकार का कोई कृत्य नहीं करते हैं। यदि नहीं करते हैं तो फिर ये धमाके कौन करता है? सवाल केवल भारत का ही नहीं है, बल्कि पूरे विश्व का है। हो सकता है अमरीका और इस्रायल को कट्टरवादी मुसलमान दुश्मन मानते हैं इसलिए मुसलमान यह कह सकते हैं कि उनके नाम पर यह कुकर्म इस्रायल और अमरीका करते हैं, लेकिन वे इसका ठीकरा मुसलमानों के सर पर फोड़ देते हैं। चीन तो मुसलमानों का दोस्त है।

भारत के वामपंथी और मुसलमान दो शरीर एक जान जैसे हैं, फिर चीन के जियांग प्रांत में जो आतंकवाद चल रहा है उसमें मुसलमानों का नाम क्यों लिया जा रहा है? चीनी सरकार ने मुसलमानों की दाढ़ी और टोपी पर प्रतिबंध लगा दिया है। रमजान के दिनों में उन्हें रात्रि नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद में जाने से रोका जाता है।
भारत के वामपंथी और मुसलमान दो शरीर एक जान जैसे हैं, फिर चीन के जियांग प्रांत में जो आतंकवाद चल रहा है उसमें मुसलमानों का नाम क्यों लिया जा रहा है? चीनी सरकार ने मुसलमानों की दाढ़ी और टोपी पर प्रतिबंध लगा दिया है। रमजान के दिनों में उन्हें रात्रि नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद में जाने से रोका जाता है। इंडोनेशिया और मलेशिया मुस्लिम राज्य हैं, फिर भी वहां की सरकारें जिन्हें गिरफ्तार करती हैं, वे सभी मुसलमान होते हैं। जहां कहीं आतंकवाद है वहां मुस्लिम हाजिर हैं। इसलिए रफीक जकरिया जैसे बुध्दिजीवी को अपने राजनीतिक विश्लेषण में कहना पड़ा कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है, लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान है। सऊदी अरब में मक्का की घटना हो या फिर इजिप्ट में सरकार और अल बुरहान नामक आतंकवादी संस्था के बीच चलने वाला टकराव, वहां केवल मुसलमानों का नाम ही सामने आता है। अनेक इस्लामी देशों में आतंकवाद परवान चढ़ रहा है। भारत में खालिस्तानी आंदोलन चला तो सिख समाज के भीतर ही ऐसे लोग उभरे जिन्होंने इस आंदोलन को कुचल डाला। सांझा चूल्हा जैसी योजना बनाकर महिलाओं ने जिस प्रकार खालिस्तानी आंदोलन की कमर तोड़ी, वह ज्यादा पुरानी बात नहीं है।

अनेक मुस्लिम नेता यह कहते हैं कि भारत में इस्लामी आतंकवाद बाबरी ढांचा ढहने के बाद अस्तित्व में आया। तब सवाल उठता है कि पाकिस्तान में तो ऐसा कुछ नहीं हुआ, फिर वहां आतंकवाद क्यों आया? दलील दी जाती है कि लश्करे तोयबा, अल जिहाद, अल्लाह टायगर्स और जैशे मोहम्मद जैसे सैकड़ों आतंकवादी संगठन कश्मीर के नाम पर बने। लेकिन सिमी और उसका विकराल रूप इंडियन मुजाहिदीन तो सम्पूर्ण रूप से भारतीय है। उसके संस्थापक से लेकर कार्र्यकत्ता और उसमें काम कर रहे जिहादी, सभी तो भारतीय हैं, इसलिए उनका उद्देश्य क्या है, यह वे अभी तक स्पष्ट नहीं कर सके। यदि हम अन्य संगठनों को विदेशी मान भी लें तब भी इंडियन मुजाहिदीन का इस मामले में क्या जवाब है? भारत में तो लोकतंत्र है। वे अपना राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़कर अपनी व्यथा व्यक्त कर सकते थे। उन्हें इस प्रकार से आतंकवादी बन जाने का निर्णय क्यों लेना पड़ा, इसका स्पष्टीकरण आज तक उसके किसी नेता ने नहीं दिया है।

इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि भारत के मामले में उनकी कोई अन्य योजना है। आज भारत में एक कट्टरवादी मुस्लिम वर्ग हथियार और बम विस्फोट के आधार पर यहां की सरकार और जनता को आतंकित कर रहा है तो स्वतंत्रता से पूर्व वही अपनी इस्लाम आधारित योजनाओं के दम पर भारत को आतंकित कर रहा था। साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का सिध्दांत, खिलाफत आंदोलन और अंतत: विभाजन की मांग, यह ब्लैकमेल करने की उनकी रीति-नीति थी। आज हथियार और विध्वंस के आधार पर भारत को तोड़ने की शरारत फिर से जारी है। पाकिस्तान बनाकर उनका पेट नहीं भरा, बंगलादेशियों की घुसपैठ के रूप में भी उनका समाधान नहीं हुआ इसलिए भारत सरकार को परेशान और दुखी करके दबाव के तहत किसी समझौते पर लाने की उनकी नीयत साफ झलकती है। वे सार्वजनिक रूप से तो 'इस्लामी स्टेट' बनाने की बात नहीं करते, लेकिन उनकी मंशा भीतर से यही है। पाकिस्तान की बात मुस्लिम आबादी के आधार पर की गई। इस बार फिर से 15 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को सुविधाएं देने के नाम पर सरकार को ब्लैकमेल किया जा रहा है। पाकिस्तान उन क्षेत्रों से बना जहां मुसलमान बहुतायत में बसते थे, लेकिन इस समय भारत में मुसलमान सारे देश में फैले हुए हैं इसलिए किसी भी स्थान पर कोई बहुत बड़ी ताकत बनकर नहीं उभर सकते। मात्र हिंसा, आतंक और तोड़फोड़ से ही यहां की सरकार को अपनी मौजूदगी का अहसास दिला सकते हैं। एक समय था कि देश विभाजित होते थे, लेकिन अब तो विभाजित देश एक होने का सिलसिला चल रहा है इसलिए समाज के प्रवाह को देखकर आज इन कट्टरवादियों को निर्णय लेने का अवसर है। भारत में इन दिनों गठबंधन सरकार का युग है। आज वह समय नहीं है कि कोई एक पार्टी मुसलमानों का भला कर सकती है। कांग्रेस को भी इस बात का भान होना चाहिए कि मुस्लिम वोट राज्य स्तर की पार्टियों में बंट जाने वाले हैं। इसलिए एक वर्ग के तुष्टीकरण से उन्हें भी लाभ नहीं होने वाला है।

एक पाठशाला की गणवेश पहने विद्यार्थियों में यह पता नहीं लगाया जा सकता कि कौन पिछड़ा है और कौन पढ़ाई में तेज। कौन सा विद्यार्थी नवीं कक्षा का है कौन दसवीं कक्षा का? इसी प्रकार एक जैसे कपड़े, एक जैसी दाढ़ी और एक जैसी टोपी पहने हुए लोगों के भीतर यह ढूंढ पाना कठिन है कि कौन आतंकवादी है और कौन शरीफ, कौन समाजसेवी है और कौन समाजद्रोही। क्या बीस वर्ष पूर्व यह दृश्य देखने को मिलता था? कोई इसे इस्लामी पहचान की परिभाषा दे तो क्या इससे पहले के लोग नियमों का पालन नहीं करते थे? क्या वे सच्चे मुसलमान नहीं थे? अपने आपको दूसरों से अलग-थलग बताना ही आतंक फैलाने की शुरुआत है। अपनी वेशभूषा के लिए स्कूल, सेना और अन्य सेवाओं में चुनौती देना क्या इस बात का सबूत नहीं है कि वे स्वयं को औरों से भिन्न बताकर अपनी अलग पहचान कायम करना चाहते हैं? देश में प्रचलित भाषा और प्रचलित शिक्षा पध्दति को अपनाने से ही राष्ट्रीय प्रवाह की नींव पड़ती है। भिन्नता को भारतीय संस्कृति ने हमेशा अपने हृदय में स्थान दिया है, लेकिन उस भिन्नता में भी एकता होनी चाहिए। यदि भिन्नता ही रहेगी तो वह अलगाव होगा। यदि ओसामा और मुल्ला उमर बम के गोलों को आधार बनाकर किसी नए देश अथवा किसी नई राजनीतिक शैली को जन्म देना चाहते हैं तो आज इस उच्च तकनीक वाले अंतरराष्ट्रीय युग में यह कदापि संभव नहीं है। भारतीय मुसलमान इन बातों पर विचार करेंगे और उसे व्यवहार में लाएंगे तो फिर उनको कोई संदेह की नजरों से नहीं देखेगा।

इस्लामी इतिहास इस बात का साक्षी है कि मुस्लिम राजनीति जब कभी दोराहे पर पहुंची है तब उसके सामने यह सवाल उठा कि वे अत्यंत संकीर्ण बन जाएं या फिर उदारवादी बनकर समस्या का हल खोजने का प्रयास करें। इस समय दुनिया में कट्टर विचारों पर चिंतन करने वाला वर्ग आम मुसलमानों पर हावी हो गया है। लोकतंत्र में केवल आप तकनीक, शिक्षा और मानवीय भावना से ही सफल हो सकते हैं। मुट्ठी भर लोग बम के धमाकों से एक सीमित वर्ग को सीमित समय के लिए भयभीत कर सकते हैं। उनकी क्षणिक सफलता का यह अर्थ नहीं होता कि उन्होंने दुनिया को जीत लिया है। इसलिए समय की मांग है कि मुस्लिम नेता इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें।

1 comment:

Suresh Chandra Gupta said...

सही विश्लेषण है पर क्या कोई मुसलमान सहमत होगा इस से और आत्ममंथन करेगा?

"अपने आपको दूसरों से अलग-थलग बताना ही आतंक फैलाने की शुरुआत है।"

"भिन्नता को भारतीय संस्कृति ने हमेशा अपने हृदय में स्थान दिया है, लेकिन उस भिन्नता में भी एकता होनी चाहिए। यदि भिन्नता ही रहेगी तो वह अलगाव होगा।"

"भारत में इन दिनों गठबंधन सरकार का युग है। आज वह समय नहीं है कि कोई एक पार्टी मुसलमानों का भला कर सकती है। कांग्रेस को भी इस बात का भान होना चाहिए कि मुस्लिम वोट राज्य स्तर की पार्टियों में बंट जाने वाले हैं। इसलिए एक वर्ग के तुष्टीकरण से उन्हें भी लाभ नहीं होने वाला है।"

"भारत में तो लोकतंत्र है। वे अपना राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़कर अपनी व्यथा व्यक्त कर सकते थे। उन्हें इस प्रकार से आतंकवादी बन जाने का निर्णय क्यों लेना पड़ा, इसका स्पष्टीकरण आज तक उसके किसी नेता ने नहीं दिया है।"