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Friday 5 October 2007

पाकिस्तान में भगवान बुध्द की प्राचीन प्रतिमा का ध्वंस

लेखक- शाहिद रहीम

सीमा प्रांत (सरहद) के जिला 'सवात' में महात्मा बुध्द की प्राचीन प्रतिमा को बारूदी धमाके से उड़ा दिया गया। सवात के डी.आई.जी. खालिद मसंऊद ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि 'मेन्गोरा' से 15 किलोमीटर पूरब में स्थित मंगलौर के क्षेत्र 'जहांबाद' में नामालूम आतंकवादियों ने 10 और 11 सितंबर की मध्यरात्रि को बारूदी बम से महात्मा बुध्द की प्रतिमा को ध्वस्त करने का प्रयास किया, परंतु ऊंचाई पर होने के कारण प्रतिमा को विशेष हानि नहीं पहुँची।

पाकिस्तान में पेशावर स्थित पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर परवेज शाहीन के अनुसार सन् 2000 ई. में अफगानिस्तान में तालिबान के हाथों बामियान की वादी में प्राचीन बुध्द प्रतिमाओं का ध्वंस हुआ था। उसके बाद पाकिस्तान में इस प्रतिमा को नष्ट करने का प्रयास हुआ है, जो एशिया में बुध्द की दूसरी महत्वपूर्ण और सब से बड़ी प्रतिमा है।

यह प्रतिमा 2200 वर्ष पुरानी है। इस प्रतिमा की लंबाई 13 फुट और चौड़ाई 9 फुट है। 'सवात' गांधार सभ्यता का प्रमुख केन्द्र रहा है। यहां इस समय भी बुध्द की छोटी-बड़ी सैकड़ों प्रतिमाएं हैं, जिनके संरक्षण और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाई है।

ज्ञात हो कि अफगानिस्तान में तालिबान ने सन् 2000 ई. में अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी की तमाम अपीलों के बावजूद बामियान स्थित बुध्द प्रतिमाओं का ध्वंस किया था। हालांकि पाकिस्तान में हिन्दू मंदिरों का ध्वंस विगत 10 वर्षों से जारी है, लेकिन यहां बुध्द प्रतिमा के ध्वंस की यह पहली घटना है।

कबायली क्षेत्रों और सीमा प्रांत के दक्षिणी जिलों के अतिरिक्त जिला सवात में विगत दिनों तेजी से तालिबानीकरण हुआ है। यहां प्रतिबंधित संगठन 'निफाज-ए-शरियते मुहम्मदी' के नेता एक गैर कानूनी चैनल के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा पर रोक लगाने और जिहाद के समर्थन में भाषणों के लिए प्रसिध्द है। वह बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाने को पश्चिमी षडयंत्र करार देते हैं। विगत महीने सवात में आत्मघाती हमलों से सीडी सेंटरों और महिला शिक्षा केन्द्रों को उड़ाने की एक दर्जन से अधिक घटनाएं घट चुकी हैं।

सीमा प्रांत में तालिबानों का राज चल रहा है। यहां 'मानसहरा' स्थल पर अशोक काल के कुछ पाषाण-पत्र या शिलाखंड भी पुरातत्व के संरक्षण में थे, जिन्हें अब विशेष सुरक्षा की जरूरत है।

इतिहासकार एच.जी. वेल्स के अनुसार सम्राट अशोक ने एक अच्छी सरकार के लिए 14 सूत्रों को अनुक्रमित किया था, जिन्हें पत्थर के खंभों और शिला-पटों पर खुदवा कर उसने अपने राज्य के चारों ओर स्थापित करवाया। ऐसे पत्थर हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और नेपाल तथा बांग्लादेश में कोई 30 स्थलों पर मिलते हैं।

पाकिस्तान के सीमा प्रांत में 'मानसहरा' और 'मर्दान' के पास ऐसे चार-पांच शिला खंड सुरक्षित है। परंतु पुरातत्ववेत्ताओं का कथन है कि 'मर्दान' के शिला लेख पढ़े जा सकते हैं, जबकि मानसहरा के शिला-लेखों को पढ़ना अब मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि उसकी समुचित सुरक्षा नहीं हो पा रही है। पानी-हवा-धूल-मिट्टी से शिलालेख के अक्षर मिटने से लगे हैं। इसका एक मात्र कारण यह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों देशों में पुरातत्व विभाग तालिबानी सोच के अधिकारियों के अधीन है और हिन्दू तथा बौध्द संस्कृति के अवशेषों को मिटाने की योजना पर काम कर रहा है।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान सामचार)

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