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Saturday 20 October 2007

नरेन्द्र मोदी का विकास संबंधी प्रयोग

-बिनोद पांडेय

गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है। चुनाव की तारीख घोषित हो चुकी है। दिसंबर के 11 और 16 तारीख को मतदान होगा वहीं फैसले की तारीख 23 दिसंबर को रखी गयी है। चुनावी आहट को सुन दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस ने इस साल के जनवरी महीने से ही अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। सोनिया की सभा के आयोजन से जहां कांग्रेस ने साल के शुरूआत से ही चुनावी बिगुल बजा रखा था, वहीं मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसी अवधि में महिला सम्मेलनों का ताबडतोड आयोजन कर चुनावी तैयारी के प्रति अपनी गंभीरता का अहसास लोगों को दिला दिया था। बहरहाल अब चुनावी समर में योध्दा आमने-सामने है। चुनावी मुद्दों की तलाश और उसमें कांट-छांट के बाद दोनों ही प्रमुख दलों ने अपने तरकश में नुकीले तीर भी कमोबेश सजा लिये हैं।

कांग्रेस की छटपटाहट इस बार के चुनाव में किसी भी हालत में सत्ता पाने की है। कांग्रेसी कार्यकर्ता सत्ता से बाहर अधिक दिनों तक नहीं रह सकते हैं। यूपी चुनाव में राहुल के प्रयोग के बाद गुजरात में भी युवा प्रयोग को ही महत्व दिया जाना तय है। स्वर्गीय राजेश पायलट के सुपुत्र सचिन पायलट एक बार पिछले माह गुजरात आकर अपनी भूमिका बता गये हैं, लिहाजा राहुल का आना अभी बाकी है। राहुल अब पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद बडी जिम्मेवारी से जुड गये हैं, सोनिया गांधी के बाद उनका कद अब दायित्व में भी बडा हो गया है। गुजरात में कांग्रेस ने अपनी टीम में नायक की घोषणा करने की बजाय संयुक्त टीम के साथ ही चुनाव लडना श्रेयस्कर समझा है। टीम में केंद्रीय मंत्रियों की लंबी फेहरिस्त है, वहीं राज्य में भी नेताओं की कमी नहीं। लिहाजा मतदान से पहले नेतृत्व की घोषणा कर कांग्रेस चुनाव में कोई खतरा लेना नहीं चाहती। और इसी वजह से गुजरात का चुनाव इस बार दिलचस्प हो गया हैं। यानी गुजरात में नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी के सामने पूरी की पूरी कांग्रेस पार्टी मैदान में है।

एक राज्य के मुख्यमंत्री से मुकाबला करने के लिए सोनिया गांधी की पूरी सेना के अलावा केन्द्रीय मंत्रिमंडल में उनके सुर में सुर मिलाने वाले कई कथित सेक्युलरवादी नेताओं की टीम से लैस कांग्रेस इस बार गुजरात चुनाव में भाग्य आजमाएगी। गुजरात में सत्ता पाने से लंबे समय से दूर रहे प्रदेश कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की छटपटाहट तो समझ में आती है, लेकिन सोनिया गांधी का मामला दूसरा है। राज्य की सत्ता हासिल कर सिर्फ कांग्रेस शासित राज्यों की संख्या में इजाफा करने तक का ही सीमित उद्देश्य उनका नहीं है। नरेन्द्र मोदी यदि फिर से गुजरात में चुनाव जीत जाते हैं तो सर्वप्रथम देश भर में एक नई बहस के जन्म लेने की संभावना उनकी इस सबसे बडी चिंता का कारण है। मोदी के चुनाव जीतने पर एक नई बहस जमीन पर आ सकती है वह है-आजादी के बाद से लेकर अभी तक के विकास के कांग्रेसी फार्मूले की।

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि आज अपने घर और बाहर दोनों ही जगह असंतुष्टों और विरोधियों से घिरे हुए हैं तो इसका कारण भी उनका विकास का यह नया फार्मूला ही माना जा सकता हैं। माना जाता है मोदी ने गुजरात में राजनीति नहीं की, विकास किया है। इनके विकास के फार्मूले में सर्वप्रथम सब्सिडी और राहत के नाम पर पैसों की बंदरबांट को ही समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया गया है। आज तक लोगों को जो सरकार के विभिन्न योजनाओं के जरिये मदद करने की कोशिश की जाती थी, उसका कागजी कार्रवाई कर अधिकांश राशि सरकारी अधिकारी या तंत्र में ताकतवर लोग निगल लेते थे। स्वर्गीय राजीव गांधी का यह बयान भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि विकास का पैसा गांव तक आते-आते 15 फीसदी तक सिमट कर रह जाता है। नरेन्द्र मोदी ने इस अवधारणा को तोड कर लोगों को या जरूरतमंदों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयास कर अनोखा कदम उठाया। इससे तंत्र की सालों से चली आ रही अवैध कमाई पर विराम लग गया।

बडी-बडी योजनाएं, जो कि सालों से अधर में लटकी हुई थी, उसे उन्होंने ताबडतोड निपटा कर उसका लाभ आम जनता को दिलाने में अपनी इच्छा शक्ति का परिचय दिया। विकास के नये आयाम में उन्होंने राज्य की कृषि और उद्योगों के विकास में अद्भुत तारतम्यता लाकर न, तो पश्चिम बंगाल जैसा सेज के नाम पर बवंडर खडा होने दिया और न ही अत्यधिक उद्योगिकरण से लोगों का जीना-मुहाल किया। बल्कि उद्योग और कृषि दोनों क्षेत्र को एक समान विकास के पायदान पर चढा राज्य को विश्व स्तर की प्रतियोगिता के लिए अनुकूल बना दिया।

दंगों के बाद अशांत वातारण में जब श्री मोदी ने सत्ता संभाली तब से लेकर एक साल से अधिक समय तक दंगे की कहानियों को उनके विरोधी ढोल-नगाडे लेकर पीटते रहे। इस कठिन समय से राज्य की जनता को उबारना आसान नहीं था। इसी समय उन्होंने वाइव्रेंट गुजरात का अभियान चला कर राज्य में पूंजी निवेश का दुष्कर अभियान चला दिया। अशांत और खून-खराबे के माहौल के तुरंत बाद इस तरह का खतरा लेकर उन्होंने राज्य की जनता को अपना इरादा जता दिया। फिर इसके बाद उन्होंने पीछे मुड कर नहीं देखा। कई बडे-बडे महोत्सवों के जरिये उन्होंने राज्य में विकास की नई इबारत लिखने की अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प को बार-बार प्रमाणित कर दिखाया।

अब जबकि राज्य पांच साल बाद चुनावी दहलीज पर खडा है तो श्री मोदी का एक अहम चुनावी मुद्दा विकास से संबंधित होना अवश्यमभावी है। राज्य की जनता पांच साल तक चैन और सुकून के साथ जीवन यापन कर सकी इसका श्रेय भी राज्य के मुखिया होने के नाते नरेन्द्र मोदी को ही जायेगा। सो यह तय है कि कांग्रेस विकास संबंधी नरेन्द्र मोदी के फार्मूले को चुनावी बहस का मुद्दा बनाने की बजाय वह उन्हीं मुद्दों को उठाना चाहेगी, जिसमें जनता के सवालों से उसे जुझना नहीं पडे।

1 comment:

अनुनाद सिंह said...

हमको विकास-चिकास से कोई लेना देना नहीं है। हमको गुजरात या भारत के पुनरुत्थान की बात करने वाला पसन्द नहीं। हमको कोई फ़ारेन वाला मांगता - रूसी हो, चीनी हो या रोम वाला।