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Friday, 19 October, 2007

बाल विवाह ने छीना बचपन : फिरदौस खान

फिरदौस खान युवा पत्रकार है। आपने दैनिक भास्कर और हरिभूमि में वरिष्‍ठ उप संपादक के नाते कार्य किया है। आपके लेख देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों में छपते है। निर्भीकता, ग्रामोन्‍मुख पत्रकारिता और आंकडों के आधार पर विश्‍लेषण करना आपके लेखन की विशेषता है। फिलहाल आप अनवरत् स्‍वतंत्र लेखन कार्य में जुटी हुई है। निम्न लेख में उन्होंने भारत की एक प्रमुख कुप्रथा बाल विवाह पर विचार प्रस्‍तुत किए है-
तमाम कोशिशों के बावजूद भारत में बाल विवाह जैसी कुप्रथा बदस्तूर जारी है। देश में विवाह के लिए कानूनन न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल निर्धारित है, लेकिन यहां अब भी बड़ी संख्या में नाबालिग लड़कियों का विवाह कराया जा रहा है। इस तरह के विवाह से जहां कानून द्वारा तय उम्र का उल्लंघन होता है, वहीं कम उम्र में मां बनने से लड़कियों की मौत तक हो जाती है। अफसोस और शर्मनाक बात यह भी है कि बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध करने वालों को गंभीर नतीजे तक भुगतने पड़ते हैं। मई 2005 में मध्य प्रदेश के एक गांव में बाल विवाह रोकने के प्रयास में जुटी आंगनबाड़ी सुपरवाइजर शकुंतला वर्मा से नाराज एक युवक ने नृशंसता के साथ उसके दोनों हाथ काट डाले थे। इसी तरह के एक अन्य मामले में भंवरी बाई के साथ दुर्व्यवहार किया गया था।

यूनिसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट-2007 में बताया गया है कि हालांकि पिछले 20 सालों में देश में विवाह की औसत उम्र धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन बाल विवाह की कुप्रथा अब भी बड़े पैमाने पर प्रचलित है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में औसतन 46 फीसदी महिलाओं का विवाह 18 साल होने से पहले ही कर दिया जाता है, जबकि ग्रामीण इलाकों कमें यह औसत 55 फीसदी है। अंडमान व निकोबार में महिलाओं के विवाह की औसत उम्र 19.6 साल, आंध्र प्रदेश में 17.2 साल, चंडीगढ़ में 20 साल, छत्तीसगढ़ में 17.6 साल, दादर व नगर हवेली में 18.8 साल दमन व द्वीव में 19.4 साल, दिल्ली में 19.2 साल, गोवा में 22.2 साल, गुजरात में 19.2 साल, हरियाणा में 18 साल, हिमाचल प्रदेश में 19.1 साल, जम्मू-कश्मीर में 20.1 साल, झारखंड में 17.6 साल, कर्नाटक में 18.9 साल, केरल में 20.8 साल, लक्षद्वीप में 19.1 साल, मध्य प्रदेश में 17 साल, महाराष्ट्र में 18.8 साल, मणिपुर में 21.5, मेघालय में 20.5 साल, मिजोरम में 21.8 साल, नागालैंड में 21.6 साल, उड़ीसा में 18.9 साल, पांडिचेरी में 20 साल, पंजाब में 20.5 साल, राजस्थान में 16.6 साल, सिक्किम में 20.2 साल, तमिलनाडु में 19.9 साल, त्रिपुरा में 19.3 साल, उत्तरप्रदेश में 17.5 साल, उत्तरांचल में 18.5 साल और पश्चिम बंगाल में 18.4 साल है।

गौरतलब है कि वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में 18 साल से कम उम्र के 64 लाख लड़के-लड़कियां विवाहित हैं कुल मिलाकर विवाह योग्य कानूनी उम्र से कम से एक कराड़ 18 लाख (49 लाख लड़कियां और 69 लड़के) लोग विवाहित हैं। इनमें से 18 साल से कम उम्र की एक लाख 30 हजार लड़कियां विधवा हो चुकी हैं और 24 हजार लड़कियां तलाकशुदा या पतियों द्वारा छोड़ी गई हैं। यही नहीं 21 साल से कम उम्र के करीब 90 हजार लड़के विधुर हो चुके हैं और 75 हजार तलाकशुदा हैं। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक राजस्थान देश के उन सभी राज्यों में सर्वोपरि है, जिनमें बाल विवाह की कुप्रथा सदियों से चली आ रही है । राज्य की 5.6 फीसदी नाबालिग आबाद विवाहित है। इसके बाद मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा, गोवा, हिमाचल प्रदेश और केरल आते हैं।

दरअसल, बाल विवाह को रोकने के लिए 1929 में अंग्रेजों के शासनकाल में बने शारदा एक्ट के बाद कोई कानून नहीं आया। शारदा एक्त में तीन बार संशोधन किए गए, जिनमें हर बाल विवाही के लिए लड़के व लड़की उम्र में बढ़ोतरी की गई। शारदा एक्ट के मुताबिक बाल विवाह गैरकानूनी है, लेकिन इस एक्ट में बाल विवाह को खारिज करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसी बड़ी खामी के चलते यह कारगर साबित नहीं हो पाया। इस अधिनियम में अधिकतम तीन माह तक की सजा का प्रावधान है। विडंबना यह भी है कि शादा एक्ट के तहत बाल विवाह करने वालों को सजा का प्रावधान है, लेकिन बाल विवाह कराने वालों या इसमें सहयोग देने वालों को सीधे दंडित किए जाने का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि दोषी पाए जाने पर नामामत्र सजा दी जा सकती है। इतना ही नहीं इस कानून की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि पहले तो इस संबंध में मामले ही दर्ज नहीं हो पाते और अगर हो भी जाते हैं तो दोषियों को सजा दिलाने में काफी दिक्कत होती है। नतीजतन, दोषी या तो साफ बच निकलते हैं या फिर उन्हें मामूली सजा होती हैं। अंग्रेजों ने शारदा एक्ट में कड़ी सजा का प्रावधान नहीं किया और इसे दंड संहिता की बजाय सामाजिक विधेयक के माध्यम से रोकने की कोशिश की गई। दरअसल, अंग्रेज इस कानून को सख्त बनाकर भारतीयों को अपने विरुध्द नहीं करना चाहते थे। अफसोस की बात यह भी है कि आजादी के बाद बाल विवाह को रोकने के लिए बड़े-बड़े दावे वाली सरकारों ने भी बाल विवाह को अमान्य या गैर जमानती अपराध की श्रेणी में लाने की कभी कोशिश नहीं की। महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग और मानवाधिकार आयोग भी बाल विवाह पर अंकुश लगाने के लिए जमीनी स्तर पर काम करने की बजाय भाषणों पर ही जोर देते हैं।

बाल विवाह अधिनियम-1929 और हिन्दू विवाह अधिनियम-1955 की दफा-3 में विवाह के लिए अनिवार्य शर्तों में से एक यह भी है कि विवाह के सम लड़ी की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल होनी चाहिए। अगर विवाह के समय लड़के और लड़की की उम्र निर्धारित उम्र से कम हो तो इसकी शिकायत करने पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-18 के तहत दोषी व्यक्ति को 15 दिन की कैद या एक हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। कानून की नजर में भले ही इस तरह का विवाह दंडनीय अपराध हो, लेकिन इसके बावजूद इसे गैरकानूनी नहीं माना जाता और न ही इसे रद्द किया जा सकता है। इसके अलावा अगर हिंदू लड़की उम्र विवाह के समय 15 साल से कम है और 15 साल की होने के बाद वह अपने विवाह को स्वीकार करने में मना कर दे तो वह तलाक दे सकती है लेकिन अगर विवाह के समय उसकी उम्र 15 साल से ज्यादा (भले ही 18 साल से कम हो) हो तो वह इस आधार पर तलाक लेने की अधिकारी नहीं। हिंदू विवाह अधिनियम के मुताबिक विवाह के समय लड़की उम्र 18 साल से कम नहीं होनी चाहिए, लेकिन भारतीय दंड संहिता-1860 की दफा-375 के तहत 15 साल से कम उम्र की अपनी पत्नी के साथ सहवास करना बलात्कार नहीं है। काबिले-गौर है कि भारतीय दंड संहिता-1860 की दफा-375(6) के मुताबिक किसी भी पुरुष द्वारा 16 साल से कम उम्र की लड़की के साथ उसकी सहमति या असहमति से किया गया सहवास बलात्कार है। भारतीय दंड संहिता की दफा-375 में 16 साल से कम उम्र की लड़ी के साथ बलात्कार की सजा कम से कम साल कैद और जुर्माना है, लेकिन इस उम्र की अपनी पत्नी के साथ बलात्कार के मामले में पुरुषों को विशेष छूट मिल जाती है। इतना ही नहीं अपराधिक प्रक्रिया संहिता-1973 में बलात्कार के सभी तरह के मामले संगीन अपराध हैं और गैर जमानती हैं, लेकिन 12 साल तक की पत्नी के साथ बलात्कार के मामले संगीन नहीं हैं और जमानती भी हैं। इस तरह के भेदभाव पूर्ण कानूनों के कारण भी देश में पीड़ित महिलाओं को इंसाफ नहीं मिल पाता।

देश के विभिन्न इलाकों में अक्षय तृतीया, तीज और बसंत पंचमी जैसे मौकों पर सामूहिक बाल विवाह कार्यक्रम आयोजित कर खेलने-कूदने की उम्र में बच्चों को विवाह के बंधन में बांध दिया जाता है। इन कार्यक्रमों में राजनीतिक दलों के नेता और प्रशासन के आला अधिकारी भी शिरकत कर बाल नन्हें दंपत्तियों को आशीष देते है । सर्वोच्च न्यायालय ने बाल विवाह को गंभीरता से लेते हुए मई 2005 में देशभर के जिलाधिकारियों और पुलिस प्रमुखों को आदेश दिया था कि वे इन्हें रोकने के लिए हर संभव प्रयास करें। यह निर्देश न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा और न्यायमूर्ति एच कपाड़िया की खंडपीठ ने दिया था। सर्वोच्च न्यायालय में फोरम फोर फेक्ट फाइडिंग, डॉकूमेंटेशन एंड एडवोकेसी ने एक जनहित याचिका दायर कर उत्तरी कर्नाटक के दावणगेरे और गुलबर्गा आदि जिलों में होने वाले बाल विवाह की शिकायत की थी। याचिका में बताया गया था कि दो साल पहले दो मंत्रियों ने भी ऐसे समारोह में शिरकत की थी। याचिका में बाल विवाहों को गैर कानूनी होते हुए भी अमान्य घोषित न किए जाने पर ध्यान दिलाया गया था। याचिका पर सुनवाई के दौरा सॉलिसिटर जनरल जीई वाहनवती ने बताया था कि इस कानून बाल विवाह अधिनियम-1929 की जगह लेने के लिए पिछले साल बाल विवाह विधेयक संसद में पेश किया गया था और जनता से सुझाव व आपत्तियां भी मांगी गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने इस विधेयक की धारा-31 पर आपत्ति उठाई थी कि कोई बाल विवाह तभ अमान्य होगा जब संबंधित बालक या बालिका इसके लिए कानूनी कार्रवाई करे। पिछले साल 19 दिसंबर को लोकसभा में बाल विवाह निवारण अधिनियम-2006 को मंजूरी दी गई है। राज्यसभा यह विधेयक 14 दिसंबर को ही पारित कर चुकी थी । संसद ने यह विधेयक बच्चियों की दर्दभरी दास्तानों को सुनने के बाद भावुक होकर पास किया। इस कानून को लागू कराने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई है। बाल विवाह रोकने में यह नया कानून कितना सार्थक साबित होगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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