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Saturday 6 October 2007

तब माकपा अब माकपाः राष्ट्रीय सहारा

पश्चिम बंगाल के दो जिलों बीरभूम और बांकुडा में पिछले तीन दिन लगातार सरकारी राशन की दुकानों पर आम लोगों के छापे पडे। धांधली के दोषी कोटेदार घरों-दुकानों से खींचकर पीटे गए और उन्‍हें बचाने गई पुलिस द्वारा चलाई गई लाठियों-गोलियों से कई लोग घायल हुए या मारे गए।

यह वही पश्चिम बंगाल है जहां साठ और सत्‍तर के दशक में तब की विपक्षी और फिलहाल सत्‍तारूढ मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने भ्रष्‍ट कोटा राज के खिलाफ 'दमदम हवाई' जैसा फार्मूला ईजाद किया था। उस समय राशन वितरण में धांधली करनेवाले दुकानदारों के खिलाफ चलाए गए माकपा के हिंसक आंदोलनों ने उसे एक ट्रेड यूनियन चलाने वाली पार्टी से आम जनता की प्रतिनिधि पार्टी बना दिया था। लेकिन आज बीरभूम और बांकुडा में चल रहे ठीक वैसे ही आंदोलनों के पक्ष में खडा होना तो दूर, उनके प्रति सहानुभूति के दो शब्‍द बोलना भी माकपा के लिए संभव नहीं हो पा रहा है। और तो और, माकपा नेतत्‍व को इन आंदोलनों के पीछे कांग्रेस, तणमूल कांग्रेस और भाजपा ही नहीं, नक्‍सलियों का भी हाथ नजर आने लगा है।

पार्टी ने कोलकाता में जारी किए गए एक आधिकारिक बयान में समूचे संसदीय और गैर-संसदीय विपक्ष पर राज्‍य में जन वितरण प्रणाली को बाधित करने का आरोप लगाया है। इस बयान में अगर सच्‍चाई का कोई अंश हो, तब भी यह आश्‍चर्यजनक है। तीन दिनों से लगातार कोटे की दुकानों पर गदर मचा हुआ है, कोलकाता से कोई सरकारी या गैर-सरकारी जांच दल भी अभी तक बीरभूम और बांकुडा में जमीनी हकीकत की पडताल करने नहीं जा सका है। फिर माकपा नेतत्‍व इतने दावे के साथ कोटेदारों को क्‍लीन चीट देते हुए इन फसादों के पीछे बाकायदा नाम लेकर कुछ पार्टियों का हाथ होने की बात कैसे कर रहा है। क्‍या इसके पीछे यह धारणा काम कर रही है कि राज्‍य में सारे कोटे, परमिट और लाइसेंस तो माकपा कार्यकर्ताओं को ही दिए जाते है और ये कार्यकर्ता और चाहे जो भी करें, धांधली या भ्रष्‍टाचार तो किसी भी सूरत में नहीं कर सकते। ऐसी खुशफहमियां अपने प्रभाव क्षेत्र से बाहर के राज्‍यों में अपनी पीठ थपथपाने और केन्‍द्र की राजनीति में अपने जलवे दिखाने के काम जरूर आती हैं, लेकिन गरीबी और भूखमरी से जूझ रही पश्चिम बंगाल की गरीब जनता का इनसे कोई भला नहीं होता।

पिछले एक साल में सिंगूर से लेकर नंदीग्राम तक लोगों को कम्‍युनिस्‍ट कार्यकर्ताओं और कम्‍युनिस्‍ट सरकार के कुछ ऐसे चेहरे देखने को मिले हैं, जिनसे उनका कुछ साल पहले ज्‍यादा परिचय नहीं था। अब शायद उन्‍हें कोटा-परमिटदारों से ऐसे ही चेहरों की कुछ अलग बानगियां दिखाई दे रही हों। जिस पार्टी और गठबंधन को इस राज्‍य में 1977 से लेकर अब तक लगातार छह कार्यकाल हासिल हो चुके हों, उसके अन्‍य दलों की तुलना में बेहतर होने को लेकर कोई सवाल उठाना उचित नहीं होगा, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि जमीन पर दिखाई दे रहे जनाक्रोश की अनदेखी कर दी जाए। क्‍या यह अच्‍छा नहीं होगा कि केंद्र में अपने सहयोग से चल रही सरकार की देश-दुनिया के तमाम मुद्दों को लेकर लगभग रोज ही खिंचाई करने वाली माकपा अब थोडी चिंता पश्चिम बंगाल की जमीनी तकलीफों की भी करना शुरू कर दे।
( साभार- संपादकीय, राष्ट्रीय सहारा, शुक्रवार, 5 अक्टूबर, 2007 )

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