Monday, October 29, 2007

श्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता


पहचान

पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी
ऊंचा दिखाई देता है।
जड़ में खड़ा आदमी
नीचा दिखाई देता है।

आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है,
न बड़ा होता है, न छोटा होता है।
आदमी सिर्फ आदमी होता है।

पता नहीं, इस सीधे-सपाट सत्य को
दुनिया क्यों नहीं जानती है?
और अगर जानती है,
तो मन से क्यों नहीं मानती

इससे फर्क नहीं पड़ता
कि आदमी कहां खड़ा है?

पथ पर या रथ पर?
तीर पर या प्राचीर पर?

फर्क इससे पड़ता है कि जहां खड़ा है,
या जहां उसे खड़ा होना पड़ा है,
वहां उसका धरातल क्या है?

हिमालय की चोटी पर पहुंच,
एवरेस्ट-विजय की पताका फहरा,
कोई विजेता यदि ईर्ष्या से दग्ध
अपने साथी से विश्वासघात करे,

तो उसका क्या अपराध
इसलिए क्षम्य हो जाएगा कि
वह एवरेस्ट की ऊंचाई पर हुआ था?

नहीं, अपराध अपराध ही रहेगा,
हिमालय की सारी धवलता
उस कालिमा को नहीं ढ़क सकती।

कपड़ों की दुधिया सफेदी जैसे
मन की मलिनता को नहीं छिपा सकती।

किसी संत कवि ने कहा है कि
मनुष्य के ऊपर कोई नहीं होता,
मुझे लगता है कि मनुष्य के ऊपर
उसका मन होता है।

छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता,
टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।

इसीलिए तो भगवान कृष्ण को
शस्त्रों से सज्ज, रथ पर चढ़े,
कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े,
अर्जुन को गीता सुनानी पड़ी थी।

मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते,
न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।

चोटी से गिरने से
अधिक चोट लगती है।
अस्थि जुड़ जाती,
पीड़ा मन में सुलगती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि
चोटी पर चढ़ने की चुनौती ही न माने,
इसका अर्थ यह भी नहीं कि
परिस्थिति पर विजय पाने की न ठानें।

आदमी जहां है, वही खड़ा रहे?
दूसरों की दया के भरोसे पर पड़ा रहे?

जड़ता का नाम जीवन नहीं है,
पलायन पुरोगमन नहीं है।

आदमी को चाहिए कि वह जूझे
परिस्थितियों से लड़े,
एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।

किंतु कितना भी ऊंचा उठे,
मनुष्यता के स्तर से न गिरे,
अपने धरातल को न छोड़े,
अंतर्यामी से मुंह न मोड़े।

एक पांव धरती पर रखकर ही
वामन भगवान ने आकाश-पाताल को जीता था।

धरती ही धारण करती है,
कोई इस पर भार न बने,
मिथ्या अभियान से न तने।

आदमी की पहचान,
उसके धन या आसन से नहीं होती,
उसके मन से होती है।
मन की फकीरी पर
कुबेर की संपदा भी रोती है।

नन्दीग्राम में ममता बनर्जी के काफिले पर गोलियां बरसाईं


नन्दीग्राम में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी किसानों, मजदूरों और महिलाओं पर बर्बर जुल्म ढा रही हैं। किसानों का हक छीना जा रहा है। माकपा के अत्याचारों के खिलाफ महाश्वेता, मेधा और ममता बनर्जी संघर्ष कर रही हैं। अपने को सर्वहारा वर्ग की शुभचिंतक होने का ढोल पीटने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग पर गोलियाँ बरसा रही हैं। गत मार्च महीने से मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के गुंडे किसानों, मजदूरों और महिलाओं पर हिंसक हमले कर रहे हैं।

गत 28 अक्टूबर को खेजुरी और नंदीग्राम के बीच तेखाली पुल पर धरना देने जा रही ममता बनर्जी के काफिले पर अज्ञात लोगों ने 28 अक्टूबर को हमला कर दिया। हमले में वे बाल-बाल बच गईं। उनका काफिला सुरक्षा घेरे में नहीं चल रहा था। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख सुश्री बनर्जी का काफिला तेखाली पुल की ओर जा रहा था तभी खेजुरी की ओर से उनकी कार के दाहिने हिस्से से उस पर गोलियाँ बरसाई गई। ममता ने गाड़ी के सामने गिरी कुछ गोलियाँ उठाकर घटनास्थल पर मौजूद मीडियाकर्मियों को दिखाईं। उन्होंने बताया कि वे 303 सीरीज की गोलियाँ थीं, जिनका इस्तेमाल पुलिस करती है।

इत्तेफाक से उनके काफिले के साथ पुलिस की कोई पायलट कार नहीं थी और न ही एक भी पुलिसकर्मी घटनास्थल पर मौजूद था। सुश्री बनर्जी के साथ उनके सिर्फ निजी सुरक्षाकर्मी ही थे। विधायक और तृणमूल कांग्रेस के नेता शुभेन्दु अधिकारी ने बताया कि उन्होंने पूर्वी मिदनापुर के पुलिस अधीक्षक को सुश्री बनर्जी के दौरे की जानकारी दे दी थी।

इस बीच सुश्री बनर्जी ने भूमि प्रतिरोध समिति के कार्यकर्ताओं पर हमले के लिए माकपा कार्यकताओं के खिलाफ कार्रवाई पर केंद्रीय गृह मंत्रालय से आश्वासन की माँग को लेकर गोकुलनगर के निकट धरना शुरू कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने पूर्वी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम में माकपा समर्थकों की गोलीबारी और बमबाजी की हरकतों पर लगाम लगाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री शिवराज पाटिल से हस्तक्षेप करने की माँग की है।

गढ़चक्रबेरिया में एक जनसभा में ममता ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को पत्र लिखे हैं तथा उनके जवाब की प्रतीक्षा कर रही हैं। ममता ने इन पत्रों में कहा है कि दोषियों को दंड दिया जाए। इस बीच ममता ने कहा कि नंदीग्राम की जनता को मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के गुंडों के खिलाफ संघर्ष जारी रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि माकपा कार्यकर्ता बंदूकों के जोर पर अपनी मनमानी नहीं कर सकते हैं। शांतिप्रिय जनता अंतत: स्थिति पर नियंत्रण कर लेगी और राज्य प्रायोजित आतंकवाद खत्म हो जाएगा। ममता नंदीग्राम के कई इलाकों के दौरे पर हैं और उन्होंने पहले ही घोषणा की है कि वह खेजुरी भी जायेंगीं जो माकपा का गढ़ माना जाता है।







Friday, October 26, 2007

नक्सलियों ने मरांडी के बेटे सहित 17 को गोलियों से भून डाला



झारखंड के गिरिडीह जिले में कल देर रात हुए नक्सली हमले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी के बेटे अनूप मरांडी समेत 17 लोग मारे गए। नक्सलियों का यह हमला देर रात करीब साढे बारह बजे गिरिडीह जिले के चिलकारी गांव में एक समारोह के दौरान हुआ। गांव में पिछले तीन दिनों से एक जनजातीय फुटबाल प्रतियोगिता चल रही थी तभी नक्सलियों ने समापन सम्मान समारोह के दौरान इलाके को घेरकर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई। गोलीबारी में बाबू लाल मरांडी के छोटे भाई नीमू मरांडी बच निकलने में सफल रहे। जबकि बाबू लाल मरांडी के बेटे अनूप मरांडी समेत 17 लोग मारे गए।

हमले में करीब 25 नक्सली शामिल थे। नक्सली आधुनिक हथियारों से लैस थे। कार्यक्रम में बाबू लाल मरांडी के बेटे समेत करीब 100 लोग शामिल थे। उसी वक्त करीब 25 नक्सलियों ने आधुनिक हथियारों से लैस होकर हमला कर दिया। अनेक लोग घायल हुए हैं। घायलों में महिलाएं भी शामिल हैं।











Wednesday, October 24, 2007

कम्युनिस्टों का दोहरा चरित्र- प्रो.देवेन्द्र स्वरुप

केरल में कम्युनिस्ट नेतृत्व भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा है। उसके कई मंत्री भ्रष्टाचार या यौन-उत्पीड़न के आरोप में त्यागपत्र देने को मजबूर हुए हैं। केरल की 20 प्रतिशत ईसाई जनसंख्या कम्युनिस्टों के विरोध में गोलबंद हो रही है। एक माकपा नेता मथाई चाको की एक वर्ष पूर्व कैंसर से मृत्यु पर कैथोलिक चर्च और माकपा के बीच वाकयुध्द छिड़ गया है। एक प्रतिष्ठित कैथोलिक पादरी का कहना है कि मथाई चाको ने मृत्यु के समय अन्तिम ईसाई उपदेश सुना। माकपा के महामंत्री पिनरई विजयन, जिनके विरुध्द भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, उन पादरी को 'महाझूठा' व 'दुष्ट पुरुष' कह डाला। पिनरई का दावा है कि मथाई चाको जैसा सच्चा कम्युनिस्ट कभी भी धार्मिक कर्मकांड नहीं अपना सकता। चर्च ने इसके उत्तर में चाको के विवाह का चर्च में रजिस्ट्रेशन का प्रमाण प्रस्तुत किया है। चर्च का आग्रह है कि पिनरई सार्वजनिक माफी मांगें। चर्च ने बुधवार (17 अक्तूबर) को सभी ईसाई संस्थान बंद करके विरोध प्रदर्शन किया। वैसे भी वामपंथी गठबंधन सरकार की शैक्षणिक नीतियों के विरुध्द भी चर्च आन्दोलन की तैयारी कर रहा है और 1957 की नम्बूदिरीपाद सरकार को गिराने वाले आंदोलन की पुनरावृत्ति करने की धमकी दे रहा है। धर्म से घृणा और नास्तिकता में आस्था के इस दावे को एम.वी. राघवन एवं सी.पी. जोश जैसे पुराने कम्युनिस्ट भी महज ढोंग बता रहे हैं। उन्होंनें ई.एम.एस. नम्बूदिरीपाद और पूर्व मुख्यमंत्री ई.के. नायनार की मृत्यु के पश्चात् धार्मिक कर्मकाण्ड होने का उदाहरण दिया। माकपा की केन्द्रीय समिति के सदस्य एवं गृहमंत्री कोडियारी बालकृष्णन् के लिए उत्तर केरल के मन्दिर में धार्मिक अनुष्ठान कराने का उल्लेख किया। पोलित ब्यूरो सदस्य एस.रामचन्द्रन की पत्नी की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने की अनुमति स्वयं पोलित ब्यूरो ने दी थी। अपने पुत्र के विवाह के समय ई.एम.एस. नम्बूदिरीपाद के सपरिवार मीनाक्षी मन्दिर मदुरै जाकर पूजा करने की घटना बहुचर्चित है।

भौतिकवाद और नास्तिकता में आस्था के ढोंग का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि अभी हाल ही में कोच्चि के रीजेंट होटल के हाल में माकपा की बैठक के बीच में मौलवी की अजान की आवाज कान में पड़ने ही बैठक स्थगित कर दी गई। मुस्लिम कार्यकर्ताओं को बैठक छोड़कर बाहर जाने की अनुमति दी गई। वहां उनके रोजा तोड़ने के लिए पार्टी की तरफ से नाश्ते की व्यवस्था की गई। यह है भारतीय कम्युनिस्टों के दोगले चरित्र का कच्चा चिट्ठा। केरल में कोयम्बतूर बम विस्फोट कांड के सूत्रधार नासिर मदनी की पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट, इंडियन नेशनल लीग व जमाते इस्लामी आदि मुस्लिम संस्थाओं को रिझाने के लिए कम्युनिस्ट कितने समझौते कर रहे हैं, इसकी पूरी कहानी प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। कितना अच्छा हो कि संप्रग के सभी घटक दल मजहब के प्रति कट्टर मुस्लिम समाज के सामने कम्युनिस्टों की मजहब विरोधी नास्तिकता को नंगा करें। उन्हें बतलायें कि किस प्रकार रूस, चीन और पूर्वी यूरोप में इस्लाम और कम्युनिज्म में टकराव हमेशा से रहा है और आज भी है। भारतीय मुसलमानों को भी हिन्दू विरोधी मानसिकता से ऊपर उठकर नास्तिकता के विरुध्द मोर्चा खोलना चाहिए। इस्लाम के प्रति निष्ठा और नास्तिकता साथ-साथ नहीं चल सकते।

Tuesday, October 23, 2007

जब कम्युनिस्ट फासिस्ट होते है तो पुराने जमाने के फासिस्ट भी लजा जाते हैं:महाश्वेता देवी

सिंगुर की ही जमीन चाहिए, ऐसी कोई बात रतन टाटा ने नहीं कही थी। टाटा भारत के अन्यतम बड़े उद्योगपति हैं। उनके लिए छोटी कार के कारखाने के लिए सिंगूर की बहुफसली जमीन की मांग ही गलत होती। इसलिए उन्होंने वह जमीन नहीं चाही। चाही थी मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य ने। मुख्यमंत्री के मन में क्या था, कहना कठिन है। तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने अनशन किया, आंदोलन पर आंदोलन किए जा रही है, मेधा पाटेकर विरोध किए जा रही हैं उधर बुध्ददेव की पुलिस असामान्य आचरण कर रही है। आंदोलनकारियों पर ही नहीं, पत्रकारों-छायाकारों की भी बेधड़क पिटाई हो रही है। माकपा के राज्य में सब कुछ किया जा सकता है। मैं चाहती हूं, देश के सामने माकपा का मुखौटा खुल जाए। आम जनता, छात्र, महिला संगठन, दलित-आप सब बुध्ददेव और विमान बसु का मुखौटा नहीं मुख देखिए। वे कितना सफेद धोती ऑर पंजाबी कुर्ता पहने हुए हैं पर असली मुंह कितना भयानक है। सिर्फ मेधा पाटेकर और ममता के विरूध्द ही नहीं, मेरे विरूध्द माकपा सरकार क्या कहेगी? इस सरकार ने मेरे आदिवासियों को क्या दिया है? विमान बसु आखिर अपनी शिक्षा परियोजना लेकर पुरुलिया क्यों गए? पुरुलिया और बांकुड़ा में वामराज के 30 वर्षों के शासन के बाद भी सड़कें क्यों नहीं है? बिजली वहां क्यों नहीं पहुंची? पीने और सिचाई के पानी का प्रबंध क्यों नहीं हुआ? गरीबों के लिए भोजन व आवास का प्रबंध क्यों नहीं हुआ? लोधा और खेड़िया शबरों की हत्या क्यों नहीं बंद हो रही है?

माकपा के नेता, पार्टी कैडर, घृणित चमचे यह जानकर दुखी होंगे कि मैं और अन्य कई लोग आज भी बाहर रह गए हैं। सोचकर भी कष्ट होगा। शांति निकेतन में जब जन सुनवाई चल रही थी तो माकपा के ही मानस पुत्र चिल्ला कर कह रहे थे-'महाश्वेता देवी का तो शांति निकेतन में बड़ा महल है, उनकी बात हम नहीं सुन रहे हैं, नहीं सुनेंगे।'

हमारा वहां कोई महल नहीं। मुख्यमंत्री को पता होना चाहिए कि मैं मनीष घटक की बेटी हूं, विजन भट्टाचार्य की पूर्व पत्नी, ऋत्विक घटक की भतीजी-हमारा परिवार खरीद-फरोख्त से बाहर रह गया है। क्या सौभाग्य है कि इतिहास ने हमें और हमारे परिवार को सही राह पर चलना ही सिखाया था।

सटीक राह बंधुत्व की होती है, पांव रक्तरंजित होता है। क्या माकपा नेता इसे कभी जानते थे? अब भूल गए हैं। यदि नहीं भूले होते तो सिंगूर के लोगों के चेहरे का सटीक तथ्य पढ़ लिए होते। सिंगूर की जमीन जबरन अधिग्रहीत करने के विरोध में उस इलाके में जो लोग आंदोलनरत थे, उनमें एक प्रमुख नाम तापसी मालिक का भी था। उसने अनशन भी किया था। दिन भर भूखे रहने के बाद रात को खाना खाया और सो गई, किन्तु सूर्योदय नहीं देख पाई। वह जब तड़के नित्य कर्म करने मैदान गई, तो उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उसके बाद उसके शरीर पर कैरोसिन तेल छिड़ककर उसे जला कर मार डाला गया। ध्यान देने योग्य है कि सिंगुर के जिस बाजमेलिया गांव में यह हादसा हुआ, वहां पुलिस तैनात है। पुलिस के अलावा रात्रि प्रहरी भी थे। चूंकि शुरू से ही तापसी अधिग्रहण के विरोध में आंदोलन का नेतृत्व कर रही थी, इसलिए माकपा के स्थानीय कैडरों के वह निशाने पर थी।

लगातार 30 वर्षों तक शासन में रहने के बाद वाममोर्चा के अधोपतन का ये हाल है। राज्य सरकार का यह कौन-सा मूल्यबोध है। मरी है तापसी मालिक, वह हेतेल पारेख तो नहीं है। तापसी के बलात्कारियों-हत्यारों को फांसी चाहिए, किसी ने नहीं कहा। क्या वाम नेताओं के घर लड़कियां नहीं है? अपनी बेटियों में उन्हें तापसी का चेहरा देखने का विवेक नहीं है? वामदलों के महिला संगठनों भी सामने नहीं आए। जो मीरा भट्टाचार्य (मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य की पत्नी) हेतेल पारेख के बलात्कारी व हत्यारे धनंजय चटर्जी को फांसी देने की मांग चीख-चीख कर करती थीं, उन्होंने भी तापसी के मामले में कुछ नहीं कहा। क्या सिल्क की दामी साड़ी पहनकर संसद या विधानसभा या जनसभा या सेमिनार में चेहरा दिखाने भर से कर्तव्य पूरा हो जाता है?

सोचना चाहती हूं कि रतन टाटा ने सिंगूर की जमीन चाही थी। पर सिंगूर उन्होंने नहीं चाही थी। सिंगूर चाही थी माकपा ने। उन्होंने ही कहा था-सिंगूर ही चाहिए। किन्तु मुझे विश्वास है कि रतन टाटा ने वह जमीन नहीं चाही थी। टाटा समूह को यह नहीं पता था कि उस जमीन पर कई हजार किसान, बर्गादार, खेत मजदूर निर्भरशील हैं फिर उनके पेट पर उन्होंने क्यों लात मारी। सिंगूर को लकड़ी की हांडी पर क्यों चढ़ाया गया? क्या इसलिए कि उस इलाके से माकपा नहीं जीतती? इसलिए कि वहां के विधायक और पंचायत प्रधान सभी तृणमूल कांग्रेस के है?

रतन टाटा को गुजरात सरकार का एक प्रसंग बताना चाहती हूं। गुजरात सरकार के पास 60 हेक्टेयर जमीन थी। वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा कर रखी थी कि वह जमीन वे उद्यांगपतियों को देंगे किन्तु राज्य के तमाम गैर-सरकारी जनसंगठनों ने उसका तीव्र प्रतिवाद किया तो मोदी पीछे हट गए। वह जमीन भूमिहीनों को दी जा रही है। सुना कि उसका मूल्य दे कर ले रहे है। इस राज्य में यह सब खबर अखबारों में क्यों नहीं छपती?

प्रधानमंत्री भी बंगाल आकर मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य की औद्योगिक लाइन को हरी झंडी दिखाकर चले गए। क्या करेंगे, दिल्ली में उनकी सरकार वामपंथियों के समर्थन पर ही टिकी है। प्रधानमंत्री द्वारा पीठ ठोंके जाने के बाद मुख्यमंत्री अपनी लाइन चलाते जाएंगे। रुपए के साथ इस खेल का ही नाम वैश्वीकरण है और यह खेल कम्युनिस्ट कर रहे हैं। कहना न होना कि ये कम्युनिस्ट फासिस्ट हो गए हैं। जब कम्युनिस्ट फासिस्ट होते है, तो उनका फासिज्म देखकर पुराने जमाने के फासिस्ट भी लजा जाते हैं। (साभार-वर्तिका त्रैमासिक पत्रिका, हिन्दी रूपान्तर : रंजू सिंह)

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कोष 5 हजार करोड़ रुपए!

लेखक-प्रदीप कुमार

माकपा
चाहे सत्ता में हो या न हो, यह सीधे या उल्टे तरीकों से पैसा इकट्ठा करती रहती है। केरल में माकपा ने, कहा जाता है कि, 5 हजार करोड़ रुपए की सम्पदा इकट्ठी कर ली है। माकपा कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम और ईसाई गुटों से अवसरवादी गठजोड़ करके पैसे की दृष्टि से सबसे अमीर पार्टी बन गई है। आज यह ऐसे कारपोरेट समूह की शक्ल में दिखती है जिसकी न जाने कितनी सम्पत्ति यहां-वहां बिखरी है।

कामरेड खुद को भले ही सर्वहारा वर्ग की पार्टी बताते हों मगर पिछले 5 दशकों में पार्टी की केरल इकाई 5 हजार करोड़ रुपए की स्वामी बन गई है।

खाड़ी के देशों में केरलवासियों के नौकरी करने के बाद से केरल में जमीन की कीमतें आसमान छूने लगी हैं और माकपा ने इसी मौके का फायदा उठाते हुए बड़ी मात्रा में जमीन, इमारतें तथा अन्य सम्पदा जुटा ली। माकपा और उसके सहयोगी संगठनों, जैसे सीटू, एस.एफ.आई., डी.वाई.एफ.आई., महिला संगठन, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, कालेज और अन्य व्यावसायिक संस्थान, चाहे किसी ताल्लुक में हों या जिले में, अपने-अपने प्रमुख स्थानों में बने भवनों में काम कर रहे हैं। माकपा मुख्यालय ए.के. गोपालन भवन तो माकपा की अकूत दौलत की एक झलक ही है। 15 सौ सीटों वाला एक एयर कण्डीशन्ड सभागार इसमें है। 60 एकड़ के मैदान में एक बड़ा नगर बसाया गया है जिसे ई.एम.एस. अकादमी कहते हैं और यहां माकपा कार्यकर्ताओं को 'प्रशिक्षण' दिया जाता है। केरल में ऐसे कापरेटिव बैंकों और अस्पतालों की कमी नहीं है जो माकपा के निर्देश पर चलते है। ईसाई मिशनरियों की तरह माकपा इन रास्तों से भी पैसे कमा रही है।

माकपा की फासीवादी सोच खतरनाक

लेखक-प्रदीप कुमार

आखिरकार माकपा का फासीवादी चेहरा उजागर हो ही गया। माकपा और उसके नेताओं की फासीवादी सोच ही ऐसी है कि वे किसी आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर सकते। जब संदिग्ध स्रोतों से पैसा जोड़ने की पार्टी की चाल को बेनकाब किया गया तो कोई और नहीं खुद पार्टी के राज्य सचिव पिनरई विजयन ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मलयालम दैनिक मातृभूमि के बारे में बोलते हुए अपनी असहिष्णुता जाहिर कर दी।

उल्लेखनीय है कि मातृभूमि ने माकपा मुखपत्र देशाभिमानी द्वारा एक फरार लाटरी माफिया सांतियागो मार्टिन से दो करोड़ रुपए लेने का खुलासा किया था। पार्टी में पिनरई के सहयोगी जयराजन ने भी इस मामले में राज्य विधानसभा और उसके बाहर अपनी दुर्भावना व्यक्त की थी। पिनरई गुट के वरिष्ठ नेता जयराजन देशाभिमानी के महाप्रबंधक हैं और राज्यसचिव पिनरई के पक्के अनुयायी हैं। कन्नूर में इन्हीं जयराजन ने अपने भाषण में साफ दर्शाया कि माकपा में फासीवादी रंग-ढंग अब स्थापित हो चुका है। जयराजन ने न्यायमूर्ति सुकुमारन के लिए जमकर अपमानजनक शब्द प्रयोग किए। न्यायमूर्ति सुकुमारन ने पार्टी सचिव पिनरई के संदिग्ध धनस्रोतों और संदिग्ध छवि वाले लोगों से कथित सम्बंधों पर पिनरई की आलोचना की थी। पिनरई विजयन ने कुछ दिन पहले दैनिक मातृभूमि के सम्पादक गोपालकृष्णन के लिए भी तीखे शब्द इस्तेमाल किए थे क्योंकि दैनिक मातृभूमि ने देशाभिमानी के संदिग्ध पैसे के लेन देन की रपट छापी थी, जिससे पार्टी को शर्मसार होना पड़ा था। कन्नूर में जयराजन ने एक कार्यक्रम में इससे भी एक कदम आगे जाते हुए न्यायमूर्ति सुकुमारन के लिए बहुत हल्के शब्द प्रयोग किए।

दैनिक मातृभूमि के कालीकट स्थित मुख्यालय में गत 8 जुलाई को सम्पन्न एक सम्मेलन में माकपा नेताओं के इस दुर्भावनापूर्ण फासीवादी व्यवहार के विरुध्द तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई। सम्मेलन में मौजूद प्रमुख पत्रकारों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, मीडियाकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों ने अपने वक्तव्यों में लोगों से ऐसी फासीवादी सोच के प्रति सावधान रहने का आह्वान किया।

Monday, October 22, 2007

पश्चिम बंगाल के राशन दंगे क्या कह रहे हैं?

-दीनानाथ मिश्र

राशन के लिए दंगे-फसाद की खबरें 60 के दशक के बाद मैंने कभी नहीं सुनी। लेकिन आज पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा, वीरभूमि, चौबीस परगना, बर्धवान, मुर्शिदाबाद, हुगली और नादिया जिलों से राशन के लिए हो रहे दंगों की खबर आ रही हैं। पश्चिम बंगाल में अकाल के प्रकोप का एक लम्बा इतिहास रहा है। ब्रिटिश राज के दौरान 1943 में भयानक अकाल पड़ा था। ब्रिटिश राज में आम जनता की उपेक्षा, अनाज का मनमाना भण्डारण, और जमाखोरों के कारण ऐसा दुर्भिक्ष पड़ा था, जिसमें तीस लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे। विश्व विख्यात फिल्म निर्माता सत्यजीत रे ने दुर्भिक्ष पर एक फिल्म बनाई थी। इसके कारण बंगाल के जनमानस ने उस अकाल की तस्वीर गहराई से बैठ गई है। उसके बाद साठ के दशक में राशन के संकट ने फिर एक बार दस्तक दी थी। और सच तो यह है कि उसी अभाव का राजनैतिक शोषण करके माक्र्सवादी पार्टी का मोर्चा सत्ता में आया। लेकिन पार्टी ने अगले कुछ दशकों में इस दिशा में हुई प्रगति का जबरदस्त ढोल देश भर में पीटा। राज्य में भूमि सुधार कानून को विशाल पैमाने पर लागू करने का दावा किया। ग्रामीण बंगाल की खुशहाली के बहुत से तराने गाए गए।

पार्टी का राज्य में तीस वर्षों से ज्यादा समय से अखण्ड राज चल रहा है। लेकिन इस दौरान औद्योगिक और कृषि क्षेत्र में प्रगति की बजाए अवनति हुई। मार्क्सवादी पार्टी का शासन कैसा है? आज 2007 में राशन के लिए हो रहे दंगे फसादों ने मार्क्सवादी पार्टी के शासन की पोल खोलकर रख दी है। गरीबी एवं भुखमरी के नाम पर सत्ता में आई मार्क्सवादी पार्टी के दीर्घकालीन शासन के बावजूद आज क्या हालत है? भूखे लोग राशन की दुकानों पर हमला कर रहे हैं। और विचित्र बात यह है कि पश्चिम बंगाल में कोई बीस हजार सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकाने हैं। उनमें से बहुत बड़ी संख्या माक्र्सवादी पार्टी के कार्डधारी सदस्यों को आवंटित है। सच तो यह है कि ये दुकाने उनको ही दी गई हैं जो या तो कार्डधारक हों, या पार्टी के सक्रिय समर्थक हों। गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को सस्ते अनाज देने के लिए जारी किए गए कार्ड के अलावा गरीबी रेखा के ऊपर के गरीब लोगों को भी दूसरे कार्ड दिए गए हैं।

कार्ड है लेकिन राशन की दुकान से राशन नहीं मिलता। केन्द्र की तरफ से मिलने वाला सस्ता अनाज खुले बाजार में दुगुने भाव में बिक जाता है। कार्डधारियों को परिवार के सदस्यों की संख्या के अनुसार गेहूं, चावल और चीनी के वितरण की व्यवस्था है। लेकिन यह व्यवस्था बहुत कम काम कर पा रही है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा है। गांव में राशन की दुकान वाले लोग समृध्द होते चले जा रहे हैं। वह बड़े-बड़े मकानों में रहते हैं। गांवों में एक नया धनाढय तबका तैयार हो गया। उनका धन बोलता है।

दक्षिण बंगाल राशन डीलर्स एसोसिएशन के निर्मल सरकार ने आरोप लगाया कि ''स्थानीय नेताओं, पंचायत अधिकारियों आदि को नियमित रूप से हफ्ता देना पड़ता है। हम लोगों के पास कोई रास्ता नहीं होता सिवाय इसके कि राशन के अनाज को खुले बाजार में बेच दें।'' दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है। जिसमें पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में गरीबों के नाम आने वाले 30 हजार करोड़ रुपए के गेहूं और चावल को खुले बाजार में दुगुने दाम पर बेच देने का अभियोग लगाया गया है।

अब तक राशन के दंगों में करीब आधा दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है। कई हजार लोग घायल हो चुके हैं। पुलिस गोलाबारी से भी कुछ मौतें हुई हैं। राशन की दुकानों के संगठन के प्रवक्ता भी दबी जुबान से यह स्वीकार करते हैं कि उनके बीच कुछ काली भेंडें हैं जो सरकारी राशन का भण्डार खुले बाजार में बेच डालते हैं। स्थिति का अंदाज कुछ इस तरह लगाया जा सकता है कि अनेक स्थानों पर राशन दुकानों के मालिकों पर हमला किया जाता है। डीलरों के बुलावे पर कहीं पुलिस आती है कहीं पर नहीं आती है।

राशन दंगों की शुरूआत 16 सितम्बर से ही हो गई थी। भीड़ ने बांकुड़ा में माक्र्सवादी पार्टी की रैली पर हमला किया। कारण सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की बदहाली ही था। 17 सितम्बर को बांकुड़ा में भीड़ अचानक एकत्र हुई और राशन डीलर पर हमला किया। 22 सितम्बर को राशन दंगे बांकुड़ा से वीरभूमि पहुंचे। 25 सितम्बर को राज्य सरकार ने 38 डीलरों को निलंबित कर दिया। बाद में निलंबित डीलरों की संख्या 117 हो गई। बांकुड़ा में ही एक डीलर ने आत्महत्या कर ली। बर्धवान जिले में राशन दंगे फैलते गए। कई अन्य डीलरों ने आत्महत्या की। एक माक्र्सवादी विधायक को भीड़ ने पीट दिया। पुलिसवालों के मकानों में आग लगा दी गई। राशन दंगों का व्याप्त एक एक करके कई जिलों में फैल गया।

स्थिति की भयानकता देखते हुए राज्य सरकार ने केन्द्र के सिर पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को अनाज के कोटे में पिछले महीनों में दो बार कमी कर दी। इस दावे के विपरीत केन्द्रीय खाद्यमंत्री शरद पवार ने आंकड़ों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की कि न तो खाद्यान्न की कमी है और न ही कोटे में कमी की गई है। बदइंतजामी और भ्रष्टाचार प्रदेश के वितरण तंत्र में भयानक रूप से पेवस्त हो चुका है। केन्द्र ने यह भी संकेत दिया है कि पश्चिम बंगाल से अनाज की तस्करी बांग्लादेश की तरफ हो रही है। इसके जवाब में राज्य सरकार ने कहा है कि सीमा पर बीएसएफ तैनात है और उन्होंने इस तस्करी की जानकारी राज्य सरकार को नहीं दी।

आरोप प्रत्यारोप का यह सिलसिला मार्क्सवादी पार्टी और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकारों के बीच चल रहा है। और उधर राशन दंगों का सिलसिला पिछले चार हफ्तों से लगातार चल रहा है। कभी एक जगह दंगा भड़क जाता है तो कभी दूसरी जगह। पूछा जा सकता है कि क्या मार्क्सवादी सरकार ने केन्द्रीय खाद्य मंत्रालय से पश्चिम बंगाल को कोटा बढ़ाने की मांग की? जवाब मिलेगा 'नहीं'। आबंटित गेहूं और चावल के बारे में प्राय: यह देखा गया है कि जितना आबंटन होता है राज्य सरकार उतना भी कोटा नहीं उठा पाती। ऐसी दिशा में कोटा बढ़ाने की मांग वह कर ही नहीं सकते थे। यह सही है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने कृषि और खाद्य व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। खाद्य मंत्री शरद पवार अपने क्रिकेट प्रेम के लिए जाने जाते हैं। वह महाराष्ट्र की राजनीति को भी संचालित कर रहे हैं। ऐसे में मंत्रालय के काम को तरजीह न मिले तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

याद कीजिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासन को। खाद्यान्न के मामले में कभी कोताही नहीं हुई। अनाज के भण्डार हमेशा भरे पूरे रहे। समस्या अनाज की कमी की नहीं, अनाज की विपुलता की रही। यही कारण था कि अनाज का निर्यात कई वर्षों तक करना पड़ा। आज हर दो महीने पर एक खबर आ जाती है कि भारत ने इतने लाख टन गेहूं अमेरिका से खरीदा या कहीं और से खरीदा। मंहगे भाव से गेहूं खरीदने की शिकायतें भी हैं। भारत जब गेहूं खरीदता है तो गेहूं के दाम चढ़ ही जाते हें। क्योंकि भारत विपुल मात्रा में खरीदता है। राशन के गेहूं और चावल को केन्द्रीय सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए सहायता देकर कम दोमों में बेचती हैं। जैसे चावल 6 रूपए किलो। बाजार में इसी चावल को 13 रुपए किलो में ग्राहक खरीदते हैं। यह अंतर बहुत बड़ा है। आज राशन से सम्बंधित जो दंगे हो रहे हैं, उसमें एक कारण गरीबी और भुखमरी से जूझने वाली जनता का आक्रोश भी हैं। स्वाभाविक रूप से राज्य की माक्र्सवादी पार्टी और सरकार बहुत चिंतित है। इसलिए नहीं कि गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे लोग हिंसक प्रदर्शन पर उतर आए हैं। बल्कि इसलिए कि पंचायत चुनाव होने वाले हैं। चिंता का विषय यह है कि राशन के इन दंगों का असर पार्टी के चुनावी विजय को दुष्प्रभावित कर सकता है। कभी पश्चिम बंगाल के माक्र्सवादी नेता राशन की दुकानों पर दंगों के लिए माओवादियों पर दोष मढ़ रहे हैं तो कभी जमात-ए-उल-हिंद पर और कभी ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस पर।

केन्द्र द्वारा जारी किया गया राशन का अनाज किस हद खुले बाजार में जाता है, इस सम्बंध में एक अध्ययन किया गया है। अध्ययन केन्द्रीय उपभोक्ता मंत्रालय ने कराया है। उसके मुताबिक सबसे अधिक दुरूपयोग उत्तर प्रदेश में और दूसरे नम्बर पर पश्चिम बंगाल में होता है। अध्ययन के मुताबिक जो अनाज गरीबों के लिए निर्धारित था वह खुले बाजार में चला गया। पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों को मिलाकर अध्ययन का निष्कर्ष है कि राज्यों में 32,89,317 करोड़ रूपए का गेहूं और चावल खुले बाजार में बेच दिया गया। यह पिछले तीन वर्षों का समेकित आंकड़ा है। अध्ययन का एक निष्कर्ष यह है कि 53 प्रतिशत गेहूं और 39 प्रतिशत चावल राशन की दुकान की बजाए, बाजार का मुंह कर लेता है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की ख्याति सबसे अधिक बदइंतजाम राज्यों के रूप में हुई हैं। राशन की दुकानों की लूटपाट भी होनी चालू हो गई। अनेक डीलरों ने मजबूरन डीलरशिप लौटा दी है। कई सौ डीलर हिंसक उत्पात के आतंक में कहीं न कहीं छिपे हुए हैं। नंदीग्राम और सिंगूर में कुछ महीने पहले जो हिंसक आक्रोश फूटा था, उसे पुलिस दमन करके मामले को निपटाया गया। छिटपुट घटनाएं हाल तक होती रही है। लेकिन राशन के दंगे उससे कहीं व्यापक हैं।

इस सारे घटना-क्रम में अनाज की मंहगाई का बड़ा भारी योगदान है। जो लोग गरीबी रेखा के ऊपर हैं, वह राशन का गेहूं और चावल नहीं उठाते थे। लेकिन अनाज जैसे-जैसे मंहगे होते गए, वैसे-वैसे वह भी राशन की दुकान पर पहुंच कर अपने हिस्से का अनाज लेने लगे। अचानक त्योहारों का मौसम आया तो यह संख्या बढ़ गई। उधर डीलर आबंटित गेहूं और चीनी नहीं उठाते थे क्योंकि कार्ड धारकों की मांग नहीं थी। अब मंहगाई के कारण मांग बढ़ी तो तुरंत राशन में बढ़ोतरी नहीं की जा सकी। अभाव इस तरह पैदा हुआ। कुल मिलाकर राशन दंगों के पीछे माक्र्सवादी शासन की चहुंमुखी विफलता ही रेखांकित होती है। हफ्ता देने की मजबूरी, राशन के गेहूं और चावल को खुले बाजार में बेचने की मजबूरी, मंहगाई के कारण राशन दुकानों की तरफ देखने की फिर से आम लोगों की मजबूरी, पार्टी तंत्र को मजबूत करने के लिए पार्टी तंत्र को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लगाने के कारण तंत्र खोखला और कमजोर हो गया। इधर सीमा सुरक्षा बाल की तैनाती के बावजूद अनाज और जानवरों की तस्करी का सिलसिला लगातार चल रहा है। जहां राशन दंगा माक्र्सवादी शासन के विदू्रप को उजागर करता है वहीं ये दंगे केन्द्रीय सरकार की विफलता को भी खोलकर रख देते हैं।

गरीबी और भुखमरी में आज भी भारत, चीन और यहां तक कि पाकिस्तान से भी आगे है। अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान ने भूख सूचकांक बनाया है। उसमें भारत का स्थान 94वें नम्बर पर है। असल में कृषि उत्पादन में भारत पिछड़ रहा है। कृषि उत्पादन दर में दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले बहुत कम वृध्दि हो रही है। वैसे कहने को कहा जाता है कि भारत विश्व की दो सबसे तेज अर्थव्यवस्थाओं में से है। अन्य क्षेत्रों में होगा, कृषि में नहीं। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और आधा दर्जन अन्य राज्यों के कारण यह स्थिति बनी।