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Saturday 31 May 2008

भाजपा की जीत के मायने- वेदप्रताप वैदिक

कर्नाटक में भाजपा की जीत अखिल भारतीयता की जीत है। पिछले 20-25 वर्षों में भारत नामक राष्ट्र-राज्य के लिए एक नई चिंता का उदय हुआ था। राष्ट्र को 100 साल से एक सूत्र में बांधे रखने वाली महान पार्टी कांग्रेस का अखिल भारतीय स्वरूप धीरे-धीरे नष्ट होता जा रहा था और उसका स्थान छोटी-छोटी स्थानीय परिवारवादी पार्टियां लेती जा रही थीं। कांग्रेस का कोई अखिल भारतीय विकल्प नहीं उभर रहा था। अखिल भारतीय सरकारें तो बन रही थीं लेकिन अखिल भारतीय दल नहीं बन रहे थे। अखिल भारतीय विकल्प के अभाव में खतरा यह था कि भारत का हाल सोवियत संघ जैसा हो सकता था। मजबूत सरकार, मजबूत प्रशासन, मजबूत फौज और परमाणु हथियारों के बावजूद जैसे सोवियत संघ बिखर गया, भारत भी बिखर सकता था। कांग्रेस ने भारत की जनता को वैसे ही सहेज रखा था, जैसे कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ जैसे विविधातामय विशाल देश को संभाल रखा था। कांग्रेस के विकल्प के तौर पर भाजपा उभर रही थी लेकिन यह उभार अधूरा और सीमित था। पहली बार इसने विंध्‍याचल को लांघा है। कोई आश्चर्य नहीं कि दिग्विजय का यह अश्व अब कुछ ही वर्षो में आंध्र और केरल में भी दौड़ता हुआ नजर आए। बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में भाजपा का खाता पहले से ही खुला हुआ है। देश के बहुत कम जिले ऐसे हैं जहां भाजपा नहीं है। कर्नाटक में लहराया भाजपा का ध्‍वज अन्य अहिंदीभाषी राज्यों में भी अब लहराए जाने को आतुर है। यह केवल भाजपा का विस्तार नहीं है, अखिल भारतीयता का विस्तार है। कांग्रेस को धाक्का जरूर लगा है लेकिन उसे खुश होना चाहिए कि यदि उसे पर्दे से गायब होना पड़ा तो इसके पहले उसने अपनी आंखों से अपने योग्य उत्तराधिकारी को देख लिया है।


इन चुनाव नतीजों का संदेश यह नहीं है कि कांग्रेस कर्नाटक या भारत से गायब होने वाली है। कर्नाटक में तो कांग्रेस की शक्ति बढ़ी ही है लेकिन उसके मुकाबले भाजपा को जो बढ़त मिली है, उससे कांग्रेस संकट के बादलों से घिर गई है। सबसे पहले तो कांग्रेस-नेतृत्व की अक्षमता पर मुहर लग गई है। सोनिया गांधी और उनके पुत्र ने किन-किन राज्यों में जोर नहीं लगाया? एक के बाद एक कांग्रेस के किले ढहते जा रहे हैं। हरियाणा और गोवा जैसे राज्यों की जीत भी क्या जीत है? उसका अखिल भारतीय वजन कितना है? अगर आंधा्र प्रदेश और महाराष्ट्र को छोड़ दें तो शेष 9 राज्य मिलकर भी दो-तीन बड़े राज्यों के बराबर नहीं हैं। 11 राज्यों में फैली कांग्रेस वास्तव में आठ राज्य में जमी हुई भाजपा से बड़ी पार्टी नहीं रह सकी है। अब कांग्रेस- गठबंधन में जुड़ी पार्टियों को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है। अगला आम चुनाव आते-आते कांग्रेस कहीं अकेली न पड़ जाए। कर्नाटक के विधानसभा चुनाव ने नई राष्ट्रीय राजनीति की नींव रख दी है।


यह ठीक है कि भाजपा को सहानुभूति- वोट मिला है लेकिन अगर कांग्रेस गठबंधान की केंद्र सरकार ने लोकहित के असाधारण कार्य किए होते तो भाजपा के मुकाबले में वह इतनी नहीं पिछड़ती। यह कहना कि महंगाई, आतंकवाद, लचर नेतृत्व और आपसी कलह का कांग्रेस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, स्वप्नलोक में विहार करने जैसा है। यह मान लिया जाए कि स्थानीय तत्वों ने ही कर्नाटक का चुनाव-परिणाम तय किया है तो मूल प्रश्न यह खड़ा होता है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व आखिर किस मर्ज की दवा है? यदि वह खाली घास-फूस है तो मध्‍यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली आदि राज्यों के चुनावों में क्या कांग्रेस का बिस्तर गोल नहीं हो जाएगा और उसका असर क्या लोकसभा चुनाव पर नहीं पड़ेगा? क्या कांग्रेस की शक्ति ऊपर से नीचे की तरफ ही बहती रहेगी? जिस पौधो की जड़ जमीन में न हो और आसमान में लटकी रहे, उसके सूखने में कितनी देर लगती है। यदि कांग्रेस ने अब अपने प्रामाणिक नेतृत्व का आविष्कार नहीं किया और अपनी नीतियों और संगठन में क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं किए तो अगले आम चुनाव के बाद उसके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा। कर्नाटक ने कांग्रेस को आत्मावलोकन का अवसर प्रदान किया है।


कर्नाटक ने भाजपा को नए रूप में उभरने का न्यौता दिया है। कर्नाटक की जनता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव जीतने के लिए भाजपा को भावनात्मक मुद्दों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। यदि वह विकास, स्वच्छ नेतृत्व, अनुशासित संगठन और प्रगतिशील नीतियों को लेकर जनता के सामने जाएगी तो उसकी झोली खाली नहीं रहेगी। गुजरात और कर्नाटक अन्य राज्यों के लिए भी नमूना बन सकते हैं। जो सफलता नरेंद्र मोदी और येदियुरप्पा को मिली है, वह लालकृष्ण आडवाणी को क्यों नहीं मिल सकती? जैसे येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद के निर्विवाद उम्मीदवार थे, वैसे ही प्रधाानमंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी तो पहले से ही हैं।


कर्नाटक के चुनाव ने दोनों अखिल भारतीय पार्टियों का नक्शा तो बदल ही दिया है, देश के समस्त नेताओं को भी अनेक मुखर संदेश दिए हैं। सेक्युलरिज्म सत्ता के लिए कैसी-कैसी दंड-बैठक लगाता है, यह देवगौड़ा-परिवार ने देश को भली-भांति बता दिया है। इसी तरह कर्नाटक की जनता ने उन नेताओं को भी सबक सिखाया है, जो वचनभंग करते हैं।


ऐसे लोगों की जो दुर्दशा कर्नाटक में हुई है, वह भारतीय राजनीति में नैतिकता के पलड़े को भारी करेगी। गांवों और शहरों में भी भाजपा की जीत ने सबसे बड़ा अखिल भारतीय संदेश यह भी दिया है कि भारतीय राजनीति जातिवाद के जंजाल के ऊपर भी उठ सकती है। भाजपा सिर्फ लिगायत वोटों के दम पर ही नहीं जीती है, उसे दलितों, आदिवासियों और वोक्क लिग्गा लोगों ने भी यथेष्ट समर्थन दिया है।
कर्नाटक ने हमारे अनेक चुनाव विशेषज्ञों और कई टीवी चैनलों की प्रतिष्ठा को पैंदे में बैठा दिया है। उसने सिध्द कर दिया है कि चुनावों के पहले जो भी प्रचार किया जाता है, उसे खूब चबाए बिना निगलना नहीं चाहिए। इसी प्रकार चुनाव के पहले और बाद में बुलाए जाने वाले तथाकथित विश्लेषकों की बातें आंख मींचकर नहीं सुननी चाहिए। कर्नाटक ने उनको विश्लेषक कम, विदूषक अखिल सिध्द किया है।
(साभार : दैनिक भास्कर, 27 मई, 2008)

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