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Saturday, 31 May, 2008

कर्नाटक के संकेत- अमर उजाला

कर्नाटक के चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि देश की राजनीति अंगड़ाई लेने के मूड में है। उसका चरित्र बदल रहा है। इसका तात्कालिक प्रभाव प्रांतीय और राष्ट्रीय राजनीति पर तो पड़ेगा ही, भावी राजनीत की दिशा निर्धारित करने में भी उसकी अहम भूमिका होगी। उसने निश्चय ही भाजपा के चेहरे पर से उत्तर भारत के सवर्णों की पार्टी का ठप्पा साफ कर दिया है। अब वह बेधड़क दक्षिण की ओर कूच कर सकती है। गंगा-यमुना के दोआब की पार्टी अब कृष्णा-कावेरी के तटों, पर अपना भाग्य आजमाने की दिशा में बढ़ रही है। कर्नाटक भाजपा के लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार है। हालांकि वर्ष 2004 में हुए विधानसभा चुनावों में भी वह कर्नाटक की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी थी, लेकिन इस बार उसे बहुमत के लगभग करीब पहुंचा कर वहां की जनता ने उस पर सर्वाधिक भरोसा किया है। जबकि राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे थे कि भाजपा और जेडी-एस की खींचतान में कांग्रेस को फायदा हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस के बजाय भाजपा को ज्यादा स्थिर और बेहतर विकल्प माना है। इसके लिए कांग्रेस की प्रांतीय राजनीति तो जिम्मेदार है ही, केन्द्रीय राजनीति भी अपनी जिम्मेदारी से हाथ नहीं खींच सकती। वर्ष 2004 में कांग्रेस वहां दूसरे नंबर की पार्टी थी। उसने जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पुत्र कुमारस्वामी की महत्वाकांक्षा के चलते यह गठबंधान चल नहीं पाया। बाद में उन्‍होंने वही गठबंधान भाजपा के साथ किया, लेकिन वहां भी उसका वही हश्र हुआ। इस सारे घटनाक्रम में जनता की सहानुभूति भाजपा को ही मिली। कांग्रेस चाहती, तो उस लहर को अपने पक्ष में मोड़ सकती थी। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई, क्योंकि एक तो उसके भीतर कई गुट बन गए थे और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भी अनेक हो गए थे। भाजपा के येदियुरप्पा के समक्ष वे टिक नहीं पाए। दूसरा, केन्द्र की संप्रग सरकार की आर्थिक नीतियां भी जनता को रास नहीं आई। आसमान छूती महंगाई और अभिजात्य वर्ग को भाने वाली नीतियों से जनता का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। यदि कोई उपलब्धि थी भी, तो कांग्रेस उसे जनता तक पहुंचा नहीं पाई। दक्षिण भारत जो कांग्रेस का मजबूत आधार रहा है, वहां से भी कांग्रेस बेदखल हो रही है। पूरी हिंदी पट्टी से वह उखड़ चुकी है। उत्तार प्रदेश, बिहार, मधय प्रदेश, राजस्थान में वह सत्ता से बाहर है। गुजरात, उत्ताराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब से भी वह निकल गई। ऐसे में कर्नाटक जैसे राज्य में भाजपा की जीत ने उसका भावी मार्ग कंटककीर्ण बना दिया है। यदि उसने अपनी भावी रणनीत नहीं बदली, तो तय मानिए, अगले साल का लोकसभा चुनाव उसके लिए खुशखबरी लाने वाला नहीं है। जबकि सात राज्यों में अपनी सरकार और पांच राज्यों में गठबंधान सरकार में शामिल भाजपा आगे बढ़ती नजर आ रही है। तो क्या अब भी नहीं चेतेगी कांग्रेस?
(26 मई 2008)

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