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Saturday 31 May 2008

दक्षिण बदलेगा देश की राजनीति- तरुण विजय

कर्नाटक में भाजपा की विजय अब वर्ष 2009 के आम चुनावों का एजेंडा तय करेगी। जैसे-जैसे कर्नाटक के चुनाव परिणाम घोषित हो रहे थे और भाजपा जीत के निकट पहुंच रही थी, मीडिया के सेकुलर पंडितों की परेशानी दिलचस्प होती जा रही थी। इन परिणामों ने न केवल देवगौड़ा-कुमारस्वामी के विश्वासघात को सजा देते हुए सेकुलर शिविर को किनारे धकेला, बल्कि यह भी सिध्द किया कि मीडिया में बैठे सेकुलर तालिबान का अंध भगवा विरोध स्वयं उन्हें अप्रासंगिक बना रहा है। कर्नाटक के परिणाम ने अनेक मिथक तोड़े हैं- भाजपा उत्तर तक सीमित व्यापारियों-उच्च जाति वालों की पार्टी है, वह विकास के नाम पर नहीं जीतती, विंधय के पार भाजपा का कोई प्रभाव नहीं, वह सांप्रदायिक है और इसलिए सुशिक्षितों में अस्वीकार्य है इत्यादि। कर्नाटक में भाजपा ने न सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजातीय क्षेत्रों में असाधारण जीत दर्ज कराई, बल्कि बंगलुरू के आईटी गढ़ से लेकर ग्रामीण इलाकों तक उसकी भगवा पताका बड़ी शान से लहराई।


पर इन सबसे बढ़कर कर्नाटक चुनाव परिणाम का संदेश है कि दस जनपथ का सोनिया-राहुल जादू निष्प्रभावी साबित हुआ है। एक भी प्रदेश ऐसा नहीं है, जहां सोनिया या राहुल बाबा का जनता पर प्रभाव निर्णायक चुनावी जीत हासिल कराने में सफल हुआ हो। इसका नतीजा न केवल राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों पर होगा, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी हताशाजनित असंतोष और विद्रोह पनप सकता है। कांग्रेस नेता सोनिया के प्रति अंधा भक्ति सिर्फ तब तक दिखाते हैं, जब तक वह उन्हें जिताकर सत्तासुख दिला सकें। जैसे ही यह आशा खत्म होती है, अर्जुन सिंह, शरद पवार जैसे दिग्गज भी कांग्रेस छोड़कर अलग होने लगते हैं। यह कांग्रेस का वंशवादी दरबारी इतिहास बताता है। वैसे कांग्रेस ने कर्नाटक में अपने तपे-तपाए नेता एस एम क्रिष्णा को पहले राज्यपाल बनाकर प्रदेश के बाहर भेज दिया। चुनाव से पहले वह वापस तो लाए गए, पर पार्टी ने मुख्य चुनाव प्रचार की भूमिका राहुल गांधी के कथित 'करिश्मे' में ही केंद्रित रखी। राहुल कर्नाटक प्रवास में कहीं भी किसी को प्रभावित नहीं कर सके। बंगलुरू में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के युवा वैज्ञानिकों और आईटी विशेषज्ञों की एक सभा में राहुल अपरिपक्व वक्ता सिध्द हुए और उस बैठक से अधिकांश युवा यह कहते हुए बीच से उठ गए कि राहुल भविष्य के भारत के बारे में एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सके।


भाजपा ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपार लोकप्रिय बी एस येदियुरप्पा को भावी मुख्यमंत्री घोषित किया था। तीन फरवरी 2006 को बंगलुरू विधानसभा में कुमारस्वामी के नेतृत्व में विश्वास मत अर्जित कर बनी भाजपा-जद (सेकुलर) गठबंधान सरकार में येदियुरप्पा उप मुख्यमंत्री थे। लेकिन जब भाजपा को प्रदेश का नेतृत्व देने का समय आया, तो कुमारस्वामी मुकर गए और राजनीतिक चालबाजी करने लगे। येदियुरप्पा मुख्यमंत्री तो बने, मगर सात दिन बाद ही कुमारस्वामी के जनता दल (सेकुलर) ने धाोखा दिया और सरकार गिर गई। येदियुरप्पा ने धीरज नहीं खोया और कर्नाटक में उनकी छवि एक सज्जन नेता की बनी, जिसे दुष्टों ने धोखा दिया। 27 फरवरी 1943 को जन्मे येदियुरप्पा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं और 1972 में शिकारीपुरा तालुके में जनसंघ की इकाई के सचिव पद से उन्होंने राजनीति शुरू की। वह 1983 से आज तक लगातार छह बार इसी विधानसभा क्षेत्र से चुने जाते रहे हैं। इस बार भी शिकारीपुरा ने अपने प्रिय नेता के साथ धोखा नहीं किया।


कर्नाटक में भाजपा की विजय राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिण के प्रभावी उभार का भी प्रतीक है। भारत की विद्या और वैभव तो विंध्‍य पार गया ही है, अब राजनीतिक सत्ता की निर्णायक शक्ति भी दक्षिण से प्रभावित होगी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भाजपा ने कर्नाटक चुनाव केवल विकास और अपनी बेहतर राष्ट्रीय छवि के आधार पर जीते हैं। और राष्ट्रीय एकता को मजबूत सिध्द करने वाला तथ्य यह है कि भाजपा के प्राय: सभी राष्ट्रीय नेता उत्तर से रहे, चाहे वह पार्टी अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह हों, कर्नाटक के प्रभारी अरुण जेटली, वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज, लेकिन इन सबकी कर्नाटक में बहुत लोकप्रिय छवि बनी। जबकि अन्य दाक्षिणात्य नेता प्रांतवाद, भाषावाद, स्थानीय क्षुद्रताओं को उभारकर एक दूसरे प्रांत के साथ ही शत्रुतापूर्ण व्यवहार की राजनीति के सहारे सत्ता की शतरंज खेलते हैं। वहीं भाजपा के विशुध्द राष्ट्रवादी चेहरे ने आतंकवादियों के प्रति कठोर नीति, रामसेतु संरक्षण, यूपीए के मुसलिम तुष्टीकरण और देशद्रोही अफजल की फांसी टालने के विरोधा के साथ-साथ स्थानीय विकास के मुददे उठाए। विगत अप्रैल में एक साक्षात्कार में जब येदियुरप्पा से पूछा गया कि चुनाव में उनके मुददे क्या रहेंगे, तो उनका उत्तर था-सिर्फ तीन मुददे होंगे-पहला विकास, दूसरा विकास और तीसरा भी विकास!


कांग्रेस को उम्मीद थी कि यदि वह कर्नाटक में कुछ जोड़-तोड़ करके सरकार बना पाई, तो राजस्थान, मध्‍य प्रदेश, दिल्ली और छत्तीसगढ़ जैसे प्रमुख राज्यों के विधानसभा चुनावों में वह आक्रामक ढंग से कुछ हासिल कर पाएगी। लेकिन कर्नाटक ने न केवल कांग्रेस के सिकुड़ते-सिमटते प्रांतीय स्वप्न और घटा दिए हैं, बल्कि अगले लोकसभा चुनावों में पराजय की इबारत भी दस जनपथ के बाहर लिख दी है। राजनाथ सिंह भाजपा के लिए अच्छे शुभंकर साबित हुए हैं। वह जब से आए हैं, पार्टी जीत रही है।
दक्षिण भारत के चार राज्यों में जनता उन्हीं पुराने, ऊबाऊ, भ्रष्ट, सत्ता लोलुप नेताओं के चेहरे देख-देखकर अब परिवर्तन की अभीप्सा पाल रही है। सत्ता नजदीक देख कल के कटटर विरोधी भी दरवाजे खटखटाने लगते हैं। इसलिए परिवर्तन की आहट सुनकर अब अगर चंद्रबाबू नायडू, जयललिता आदि क्षत्रप एनडीए के द्वार पर खड़े दिखाई पड़ें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


भाजपा अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड जैसे इलाकों में भी सरकार बनाने का दमखम दिखा चुकी है और कर्नाटक के साथ वह सात महत्वपूर्ण राज्यों में शासन कर रही है। पर सोनिया की कांग्रेस कहां है? वह सिर्फ दिल्ली केंद्रित मीडिया और आभाहीन मंत्रालयों में दिखती है। डूबती नौका के साथ कोई नहीं तैरता, वैसे ही राष्ट्रीय गठबंधान की राजनीति के इस युग में कांग्रेस का साथ अब कौन देगा, कौन छोड़ेगा, यह प्रश्न भी खड़ा हो जाएगा।


दक्षिण विजय का पहला पग भारतीय जनता पार्टी के लिए भी खतरों और चुनौतियों से भरा हुआ होगा। अगर सरकार का प्रारंभिक दौर अच्छा, विनम्र, कामकाज में जनोन्मुखी और भीतरी एकजुटता प्रकट करने वाला हुआ, तो आंधा्र, तमिलनाडु और केरल का रंग ही नहीं, लाल किले का रंग भी बदलने में सफलता मिल सकती है। (साभार : अमर उजाला 26 मई 2008)
(लेखक श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान के निदेशक हैं)

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