हितचिन्‍तक- लोकतंत्र एवं राष्‍ट्रवाद की रक्षा में। आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

Tuesday, 3 February, 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-4) / आर्थिक कुप्रबंध

यूपीए सरकार ने सत्ता में आने के बाद वायदा किया था कि वह लोगों को और अधिक रोजगार दिलाएगी, निर्धनता मिटायेगी, कीमतें कम करेंगी और आर्थिक सुधारों में तेजी लायेगी परन्तु वह इस सम्पूर्ण काल में इन क्षेत्रों में कोई विशेष प्रगति करने में विफल रही है। डा. मनमोहन सिंह व उसकी टीम की नीतियों से हमारे आर्थिक सिद्धांत बुरी तरह से बदतर होते चले गए हैं।

यदि एक वाक्य में यह कहा जाय कि इन पौने पांच वर्षों में यूपीए सरकार ने भारत को क्या दिया है तो हम कह सकते हैं कि देश की जनता को सिर्फ दो चीजें मिली है- 'असंतुलित समाज' और 'असुरक्षा का एहसास'।

आर्थिक नीति की विफलता
एनडीए सरकार के शासनकाल में आर्थिक नीति सिर्फ सर्विस सेक्टर, हाउसिंग, आई.टी. और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में ही भारत को आगे लाने की नहीं थी बल्कि आम आदमी के दैनन्दिन जीवन में प्रयोग होने वाली सभी चीजों में तात्कालिक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार भारत को अग्रणी स्थान पर खड़ा कर दिया था। एनडीए के शासनकाल में भारत दूध उत्पादन, फल और सब्जी उत्पादन, चाय उत्पादन और जूट उत्पादन में विश्व में पहले नंबर पर आ गया था। गेहूं और चावल उत्पादन में भारत पूर्णत: आत्मनिर्भर होकर विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक बन गया था। ऐसा इसलिए भी था कि एनडीए सरकार ने अर्थव्यवस्था को कृषि से जोड़ने का प्रयास किया था। जबकि आज यूपीए सरकार के कार्यकाल में गेहूं जैसा मूलभूत खाद्यान्न भी आयात करना पड़ रहा है और वह भी ऊंचे दामों पर और निम्न श्रेणी का। इस कारण से भारत में खाद्यान्न को लेकर भी एक असुरक्षा की भावना विकसित हुई है। कृषि रोजगार की दृष्टि से बहुत रोजगारोन्मुख क्षेत्र है जो बड़ी संख्या में मानव संसाधन का समुचित उपयोग कर सकता है। कृषि भारत का सबसे बड़ा इम्पलायमेंट सेक्टर है। इसके विकास के बिना न बेरोजगारी पर नियंत्रण हो सकता है और न महंगाई पर।

आधारभूत संरचना की योजनाओं की अनदेखी
केन्द्र में एनडीए सरकार के जाने के बाद वर्तमान यूपीए सरकार ने केवल राजनैतिक कारणों से विकास के अनेक कार्य या तो स्थगित कर दिये या उनकी उपेक्षा शुरू कर दी। उदाहरण के लिए भारत में आधारतभूत संरचना के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुये राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना की गति सरकार बदलते ही बेहद मंद हो गयी। चार महानगरों को जोड़ने वाले स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का कार्य अब तक पूर्ण हो जाना चाहिए था। देश के लिए हितकारी स्वर्णिम चतुर्भुज, उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम गलियारा और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजना जैसे कार्य सत्ता परिवर्तन से अप्रभावित रहने चाहिये।

उच्च स्तर की चिकित्सा सुविधाओं को देश के सभी क्षेत्रों में उपलब्ध कराने के लिये दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की तर्ज पर एनडीए सरकार ने 6 अन्य संस्थान खोलने का निर्णय लिया था। वह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।

किसानों को अपनी भूमि के आधार पर एक निश्चित निर्धारित आय प्रदान करवाने के लिए प्रारंभ की गई कृषि आय बीमा योजना रोक दी गई। किसान क्रेडिट कार्ड का कार्य भी ठंडे बस्ते में चला गया। जिन किसानों के पास क्रेडिट कार्ड हैं उन्हें भी क्रेडिट मिलना बंद हो रहा है।

आने वाले समय में भारत में जल की उपलब्धता एक प्रमुख समस्या बन कर आती दिख रही है। इस संभावित जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल के कुशल प्रबंधन की परियोजना और नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना जिसकी परिकल्पना एनडीए सरकार ने की थी, यूपीए सरकार ने आने के बाद उस पर पर विचार तक नहीं किया गया।

ये सारी योजनायें किसी एक दल के हित के लिए नहीं थी बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के आम जनमानस के हित के लिए थी। इनका अनायास बंद होना अथवा धीमा पड़ना एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरते हुये भारत के लिए बहुत समस्याजनक है।

आम आदमी: मूल आवश्यकताओं और सुरक्षा का संकट
आम आदमी के लिए न तो आज भोजन और आवास जैसी मूल आवश्यकताएं सहज और सस्ते रूप में उपलब्ध हैं और न ही उसकी सुरक्षा सुनिश्चित है। आज रोटी महंगी और जान सस्ती हो रही है। यह एक विचित्र विडम्बना है कि विकसित भारत बनने की बातों के बीच एक ऐसा समय भी चल रहा है जब भूख से मौतें हो रही हैं और खाद्यान्न को लेकर दंगे तक हुए। महंगाई ने आम जनता के घर का बजट चौपट कर दिया है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कल तक एनडीए शासन में अनाजों से भरे रहने वाले गोदामों में आज आस्ट्रेलिया से गेहूं मंगाकर भरे जा रहे हैं। यूपीए की नासमझी और अदूरदर्शिता देश को कहां से कहां ले गई।

दाल-सब्जी-रोटी, फल, दूध, नमक और गैस सभी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसा लगता है कि मानो आम आदमी की सुख-शांति पर ग्रहण लग गया हो। किसानों की आत्महत्या बंद होने के बजाए बढ़ ही रही है। यूपीए सरकार के ऐजेण्डे से भारत का अन्नदाता बाहर हो चुका है। किसानों के हित में गत पौने पांच वर्ष में यूपीए ने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिससे किसानों की समस्याएं कम हो सके। गरीब-किसानों की बात करने वाले वामपंथी अपनी सत्ता और सुविधा के कारण किसानों की मौत के विरोध में मौन धारण किए हुए है। महंगाई के विरोध में वामपंथी प्रदर्शन तो दूर संसद में मुंह तक नहीं खोलते। यूपीए सरकार में मानव विकास की पोल श्री अर्जुन सेन गुप्ता की एक रिपोर्ट में सामने आयी है। इस रिपोर्ट में श्री गुप्ता ने कहा है कि भारत में 77 प्रतिशत के करीब नागरिकों की जिंदगी बहुत कठिन परिस्थितियों में है। इनमें से बहुत सारे बीस रूपये रोज ही कमा पाते हैं। आर्थिक विषमता का यह दौर हमारे लिए खतरे की घंटी है।
क्रमश:

No comments: