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Friday, 20 February, 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-9)/ मजहबी आधार पर देश के विभाजन का प्रयास

यूपीए सरकार ने ब्रिटिश राज्य की तर्ज पर 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाते हुए अनेक ऐसे निर्णय लेने शुरू किए जो उनके राजनैतिक हितों के अनुकूल रहें चाहे उसके प्रभाव देश के लिए घातक ही क्यों न हों। 'वन्देमातरम्' का विरोध करना और प्रधानमंत्री का यह कहना कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक है, क्या राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा नहीं बन सकते? अगर भारत में भाईचारे का संबंध नहीं होता और हमारी धर्म-निरपेक्षता की भावना प्रबल नहीं होती तो वातावरण बहुत दूषित हो जाता। संप्रग सरकार इतने पर ही नहीं रूकी। वह शायद तय कर चुकी है कि उनके निर्णयों की प्रतिक्रिया हो। गरीबी को साम्प्रदायिकता का रंग देना कहां तक वाजिब है? अल्पसंख्यक समुदाय दृष्टि से तो खतरनाक है ही, परन्तु आर्थिक दृष्टि से भी बिल्कुल निराधार है। विकास और गरीबी से लड़ाई में साम्प्रदायिक दृष्टि का सर्वथा त्याग करना चाहिए, परन्तु हमें यूपीए की केन्द्र सरकार ने ऐसे भी जिले चयनित किए हैं, जहां पर अल्पसंख्यकों की जनसंख्या अधिक है। इन जिलों के विशेष विकास पर केन्द्र सरकार का विशेष ध्‍यान रहेगा और इसके लिए बजट भी विशेष रूप से रखा गया है।

अल्पसंख्यक तुष्टिकरण
यूपीए सरकार के द्वारा साढ़े चार वर्षों में किये गये चिंताजनक कार्यों में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण प्रमुख है। सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में साम्प्रदायिक आरक्षण के अपने प्रयासों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नकार दिये जाने के बाद केन्द्र सरकार ने बैंकों के ऋण और विकास योजनाओं में साम्प्रदायिक आधार पर अलग कोटा निर्धारित करने का प्रयास किया। देश के संसाधनों पर मुस्लिम समुदाय का पहला हक होने का प्रधाानमंत्री का बयान अचंभित करने वाला रहा। समाज के सभी वर्गों का विकास होना चाहिए। विकास को साम्प्रदायिक रंग में रंगने का कोई भी प्रयास निन्दनीय है।

भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय के विकास के लिए आवंटित धन को 400 करोड़ से बढ़ाकर 1400 करोड़ रूपए कर दिया गया है। दूसरी तरफ अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़े वर्ग के विकास के लिए आवंटित धन में 2प्रतिशत की कटौती की गई है। यह समाज के पिछड़े और अनुसूचित वर्ग के साथ अन्याय है। यदि वास्तविकता में समाज के किसी वर्ग तक सरकारी सहायता और विकास के वास्तविक स्वरूप को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है तो वे है अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति। सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आवंटित धन में कटौती को समाप्त करना चाहिए और वह धन उचित ढंग से इन वर्गों के गरीब लोगों तक पहुंच सकें उस पर नजर रखने के लिए यदि आवश्यकता हो तो एक नोडल एजेंसी भी बनानी चाहिए।

अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक विभाजन
यूपीए ने देश की शिक्षा पध्दति में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक विभाजन की दीवार को चौड़ा करने का गहन प्रयास किया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुस्लिमों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का निर्णय एकदम साम्प्रदायिक निर्णय है। इसका उद्देश्य चुनावों में कांग्रेस के लिए अल्पसंख्यकों के वोट हासिल करना है। कांग्रेस नेतृत्व इस प्रकार की विभाजनकारी राजनीति के दीर्घकालीन परिणामों से पूरी तरह उदासीन है।

प्रधानमंत्री का साम्प्रदायिक बयान
कांग्रेस के अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति को हवा देते हुए प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय विकास परिषद में यहां तक कह दिया कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यक समुदायों और विशेषकर मुस्लिम समुदाय का है। यदि देश के संसाधनों पर किसी का पहला हक बनता है तो गरीबों का बनता है, अनुसूचित जनजाति के लोगों का बनता है, दलितों का बनता है। परन्तु केन्द्र सरकार की नजर में निर्धान, वनवासी और दलित से अधिक महत्व मुस्लिम समुदाय दिखाई पड़ता है। पूरे समुदाय को सांप्रदायिक आधार पर सुविधा, आरक्षण या पहला हक देने की बात करना असंवैधानिक है। ऐसे प्रयासों के द्वारा यू.पी.ए. सरकार मुस्लिम समुदाय को राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग-अलग रखने का प्रयास कर रही है।

राष्‍ट्रगीत वंदेमातरम् का अपमान
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने वंदेमातरम् राष्ट्रगीत शताब्दी वर्ष के अवसर पर राज्य सरकारों से 7 सितंबर, 2006 को स्कूलों में वंदेमातरम् गीत गाये जाने का निर्देश दिया। इसका देश के कुछ मुस्लिम समुदाय के नेताओं और सेकुलर बुद्धिजीवियों ने विरोध किया। तथाकथित मुस्लिम नेताओं एवं अल्पसंख्यक समुदाय की वोट बैंक की राजनीति को ध्‍यान में रखते हुए अर्जुन सिंह ने अपने आदेश से पलटते हुए कहा कि वंदेमातरम् को गाने के लिए किसी प्रकार की अनिवार्यता नहीं है। कांग्रेस एक बार फिर अपने ही जाल में फंस गई। उसके अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का एक और नायाब उदाहरण तब सामने आया जब कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के सौ वर्ष पूरा होने के मौके पर गत 7 सितंबर को पार्टी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वंदेमातरम् समारोह समिति के अध्‍यक्ष भी थे।

अल्पसंख्यकों के लिए पृथक ऋण व्यवस्था
अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करने के चक्कर में संप्रग सरकार धार्म के नाम पर समाज में जहर घोलने का काम कर रही है। संप्रग राज में जल्द ही ऐसा समय आने वाला है जब बैंकों को किसी व्यक्ति को उधाार देने के लिए चैक लिखकर देना होगा तो उसे जानना होगा कि उसका धार्म क्या है? सरकार ने इण्डियन बैंक एसोसिएशन (आईबीए) से कहा है कि वह इस बात पर विचार करे कि वे जितना ऋण देती हैं, उसका कुछ हिस्सा अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अलग से रख लिया जाए। यह हिस्सा बैंकिंग सेक्टर द्वारा दिए जाने वाले ऋण का लगभग 6 प्रतिशत की ऊंचाई तक जा पहुंचेगा। वित्ता मंत्रालय के बैंकिंग प्रभाग से अपने 9 जनवरी के पत्र में आईबीए से कहा है कि वह इस प्रस्ताव पर विचार करे कि क्या अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के लिए प्राथमिक सेक्टर में 15 प्रतिशत ऋण अलग से रखा जा सकता है?

1 comment:

इंडियन said...

मेरा शुरू से ये प्रबल विश्वास है कि इस देश के सभी समस्याओं की जनक मुख्य रुप से कोंग्रेस रही है जिनका खामियाजा ये देश भुगत रहा है, जिनमें प्रमुख है मुस्लिम तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार, बंगलादेशी घुसपैठिये, कश्मीर समस्या अदि इन सभी समस्याओं के लिए विशुद्ध रूप से सिर्फ़ और सिर्फ़ कांग्रेस ही जिम्मेदार है इतने पर भी यदि हम नही समझे तो इस देश का भागवान भी कुछ नही कर सकेगा। एक और थोपा हुआ प्रधानमंत्री इस देश को राहुल गांधी के रूप में भुगतना होगा आने वाले चुनाव इस देश के लिए की निर्णायक साबित होने वाले हैं