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Thursday 6 September 2007

आतंकविरोधी मनमोहक अंदाज : डा. दिलीप अग्निहोत्री



यह सच है कि इस्लामी आतंकवादी की जड़ें मजहबी ऊर्जा से लगातार मजबूत हो रही है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मानवता को बचाने के प्रयासों में लापरवाही की जाए। फिर भी ऐसा हो रहा है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की केन्द्र व प्रांतीय सरकारें आतंकवाद के बढ़ते खतरे को रोकने के प्रति हद दर्जे तक लापरवाह है। इतना ही नहीं इनकी नीतियों, कार्यों से आतंकवादियों के हौसले बढ़ रहे हैं। इनके खिलाफ कठोर कदम उठाने की बात तो दूर विद्वान प्रधानमंत्री यह भी समझने को तैयार नहीं है कि वह जिस पद पर आसीन है वहां से कही गई बात के दूरगामी असर हो सकते है। हैदराबाद विस्फोट के बाद उनका फैसला यही प्रदर्शित करता है कि आतंकी घटनाओं को रोकने की सरकार में कोई इच्छाशक्ति नहीं है। उन्होंने आतंकवाद पीड़ितों के लिए स्थायी सहायता कोष बनाने की आवश्यकता बताई है। यह देश के शासनाध्यक्ष का बयान है, जिसके ऊपर आतंकवाद को स्थायी रूप से समाप्त करने की जिम्मेदारी है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी उनसे कम नहीं है। उनका कहना है कि आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान और बांग्लादेश का हाथ है, इसलिए वह इसके खिलाफ कदम उठाने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। गृहमंत्री शिवराज पाटिल इसके प्रति कितने गंभीर है, इसे उन्हीं के बयान से समझा जा सकता है। हैदराबाद से लौटने के तत्काल बाद उनका कहना था कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए बनाए गए पोटा कानून लागू करने की आवश्यकता नहीं है।

प्रधानमंत्री, उनके गृहमंत्री संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री इनमें से किसी ने संदेश देने का प्रयास नहीं किया कि वह आतंकवाद रोकने के प्रति गंभीर है। इनके कथन से आतंकियों के हौसले बढ़ना स्वभाविक है। प्रधानमंत्री की विवशता का अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन क्या उन्हें यह नहीं समझना चाहिए कि उनके इस महत्वपूर्ण पद पर बने रहने की अपेक्षा देश की आंतरिक सुरक्षा कहीं ज्यादा जरूरी है। हैदराबाद बम विस्फोट के बाद यह कहने की क्या आवश्यकता थी कि आतंकवाद से पीड़ित लोगों की सहायता हेतु कोष बनाना चाहिए। क्या उनकी इस बात से यह संदेश मिला कि उनकी सरकार आतंकवाद को समाप्त करना चाहती है? पीड़ितों के लिए स्थायी राहत कोष बनाने की बात से यही लगता है कि सरकार ने मान लिया है कि यह समस्या स्थायी रूप से बनी रहेगी, सरकार की भूमिका पीड़ितों को सहायता व राहत पहुँचाने तक सीमित है। जबकि यह तो विवाद या विचार विमर्श का कोई मुद्दा ही नहीं था। आतंकी घटनाओं से पीड़ित लोगों की सहायता के संबंध में तो कोई मतभेद नहीं हो सकता। निश्चित रूप से यह सरकार की जिम्मेदारी है। पीड़ितों को सहायता कम मिलने पर तो मतभेद विरोध हो सकता है, लेकिन पर्याप्त सहायता देने के प्रति कोई असहमति नहीं हो सकती। ऐसे में आतंकी घटनाओं से पीड़ित लोगों की सहायता हेतु कोष बनाने का फार्मूला एक अर्थशास्त्री की नजर में चाहे जो महत्व रखता हो, किंतु ऐसी घोषणा आंतरिक सुरक्षा के लिए घातक साबित होगी। आतंकवाद की समाप्ति के लिए कोष बनाने की बात तो समझ में आ जाती, लेकिन पीड़ितों के लिए ऐसे कोष बनाने की बात से यह साबित होता है कि सरकार ने इस समस्या को जड़ से समाप्त करने का इरादा त्याग दिया है।

आतंकवादी अपनी गतिविधियां चलाते रहें, अर्थशास्त्रियों की इस सरकार के पास पीड़ित लोगों की सहायता के लिए कोष है ना। आतंकी अपना काम करें, अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के आवास पर जो अन्य स्तरीय बैठक हुई उसमें पीड़ितों के लिए स्थायी सहायता कोष बनाने का फैसला सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। सिलसिलेवार चल रही आतंकी घटनाओं के बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक क्या ऐसे फैसलों के लिए होती है? कौन नहीं जानता कि आतंकवादियों की दिलेरी का कहर हमेशा निर्दोष और निहत्थे लोगों पर बरसता है। ट्रेन, बस,बाजार आदि स्थानों पर बम-विस्फोट इनके लिए जेहाद है। इस जेहाद से पीड़ित लोगों की सहायता स्वभाविक रूप से चले, जिम्मेदार मशीनरी इस संबंध में अपना काम करती रहे। लेकिन प्रधानमंत्री की समीक्षा बैठक से यही संदेश निकलना चाहिए कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने का फैसला हो चुका है। आतंकवादी निर्दोष लोगों, यहां तक कि महिलाओं, बच्चों की जिंदगी से खेलते रहे और सरकार आतंकियों में उनके गुनाहों के लिए सजा देने व खौफ बनाने के कदम न उठाना चाहे, इसे आंतरिक सुरक्षा के प्रति गंभीर उदासीनता और लापरवाही ही कहा जाएगा। उच्च स्तरीय बैठक से ऐसी कोई उम्मीद नहीं बनी। इस बैठक का दूसरा फैसला भी अनूठा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि जनसाधारण को शांति और भाईचारा बनाए रखना चाहिए। जनसाधारण की तरफ से तो कोई समस्या नहीं थी। चुनौती तो आतंकियों की तरफ से थी। उच्च स्तरीय बैठक में इन्हें सबक सिखाने का कोई मंसूबा नहीं था।

आतंकवादी घटनाओं के बाद क्या कहना है, इसे लेकर गृहमंत्री शिवराज पाटिल के सामने कोई दुविधा की स्थिति नहीं रहती। अब तक उनकी सब बातें पूरी तरह याद हो चुकी है। प्रत्येक विस्फोट के बाद यही सब तो दोहराना होता है। इस बार भी वही बातें। उन्होंने दोहराया कि सरकार आतंकी वारदात के सामने घुटने नहीं टेकेगी। उनकी सरकार का पूरा प्रयास रहेगा कि आतंकी हमलों में कमी आए और यह पूरी तरह समाप्त हो जाए। इसे समाप्त कौन करेगा? पाटिल इसके जवाब के लिए कभी परेशान नहीं दिखे। जैसे तीन साल से ज्यादा समय बीता कुछ समय और निकल जायेगा। लेकिन पोटा लगाने के मामले में उनकी दृढ़ता में कोई कमी नहीं है। आतंकवादियों के खिलाफ कारगर कानून लागू करके वह अपने गठबंधन की वोटबैंक संबंधी रणनीति पर प्रतिकूल असर नहीं होने देंगे। राजशेखर रेड्डी अपनी लाचारी बयान कर चुके हैं। उन्हें आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान-बांग्लादेश का हाथ तो दिखाई दिया, लेकिन उनके खुफिया तंत्र को समय रहते कुछ पता नहीं चला, ऐसे में उनकी लाचारी दूर भी कैसे हीे सकती है? आतंकवादियों को इससे बेहतर माहौल कहां मिलेगा?
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

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