Wednesday, September 26, 2007

सुषमा स्वराज पहली महिला सर्वश्रेष्ठ सांसद


भारतीय जनता पार्टी की प्रखर नेता व राज्यसभा सदस्य सुषमा स्वराज उत्कृष्ट सांसद का पुरस्कार पाने वाली देश की पहली महिला सांसद बन गई हैं। गत 13 सितम्बर को संसद के केन्द्रीय कक्ष में सम्पन्न एक गरिमामय कार्यक्रम में राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता राज्यसभा सांसद श्रीमती सुषमा स्वराज को वर्ष 2004 हेतु उत्कृष्ट सांसद सम्मान से अलंकृत किया।

राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल ने श्रीमती सुषमा स्वराज की प्रशंसा करते हुए उन्हें राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों की प्रखर वक्ता बताया। इस मौके पर सुषमा ने इस पुरस्कार के लिए पहली बार किसी महिला को चुनने के लिए चयन समिति को धन्यवाद दिया और कहा कि यह सौभाग्य की बात है कि उन्हें यह पुरस्कार देश की पहली महिला राष्ट्रपति के हाथों मिला है। उन्होंने कहा] मेरा कद तो छोटा था। सहयोगियों ने यह पुरस्कार देकर मेरे कद को बड़ा कर दिया है। साथ ही उन्होंने ईश्वर से इस पुरस्कार की मर्यादा को बनाए रखने की शक्ति प्रदान करने की कामना की और वचन दिया कि वह हर संभव प्रयास कर इस पुरस्कार का मान सम्मान बनाए रखेंगी।

श्रीमती स्वराज को अर्पित प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष में रहते हुए सांसद के रूप में प्रशंसनीय भूमिका निभायी है। यहां प्रस्तुत है श्रीमती सुषमा स्वराज को अर्पित प्रशस्ति पत्र का मूल पाठ-


प्रशस्ति-पत्र
श्रीमती सुषमा स्वराज का तीन दशकों से अधिक का उत्कृष्ट सार्वजनिक जीवन रहा है। उन्हें हरियाणा सरकार में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री तथा दिल्ली की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है। एक प्रतिभाशाली वक्ता होने के साथ-साथ उन्होंने देश में संसदीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में विशिष्ट योगदान दिया है।

श्रीमती सुषमा स्वराज बारी-बारी से लोक सभा तथा राज्य सभा की सदस्य रही हैं और उन्होंने सत्ता पक्ष तथा विपक्ष में रहते हुए बखूबी प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। उन्होंने संसदीय मंच का उपयोग लोगों के सरोकारों को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करने में किया है। सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के सदस्य के रूप में नियमों तथा आचार सम्बंधी मानदंडों का कड़ाई से पालन करते हुए उन्होंने सदैव संसदीय संस्थाओं की गरिमा कायम रखी है। संसदीय कार्य मंत्री के रूप में उन्होंने सभा में सार्थक तथा उद्देश्यपूर्ण वाद-विवाद सुनिश्चित किया। सूचना और प्रसारण मंत्री के रूप में दूरगामी परिणामों वाली नीतियां लागू करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। संसद के कार्यकरण की उनकी गहरी समझ] देश के समक्ष मुद्दों के प्रति उनके वास्तविक सरोकार तथा उनकी तीक्ष्ण बुध्दि एवं विचारों को प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करने की उनकी शैली ने दोनों सभाओं में वाद-विवाद को जीवंतता प्रदान की है। लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रबल समर्थक होते हुए उन्होंने संसद की गरिमा तथा मर्यादा को कायम रखने का सजग और सतत प्रयास किया है।

श्रीमती सुषमा स्वराज ने देश की अनेक वर्षों की सेवा के दौरान चुनौतियों का डटकर सामना किया है। सामाजिक मुद्दों के प्रति उनकी संवेदनशीलता तथार् कत्तव्यों के प्रति उनकी निष्ठा को सभी ने सराहा है। संघर्ष की उनकी अदम्य क्षमता तथा उनके अटूट विश्वास ने उन्हें भारत के लोक जीवन में उनकी एक विशिष्ट नेता के रूप में पहचान बनाई है।

सार्वजनिक जीवन में विभिन्न क्षमताओं में उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए भारतीय संसदीय ग्रुप द्वारा श्रीमती सुषमा स्वराज को उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार 2004 से सम्मानित किया जाना सर्वथा उचित है।

सेतुसमद्रम् परियोजना-दिवालियेपन की निशानी

लेखक-विनोद बंसल

श्रीराम सेतु को तोड़ने से भगवान श्री राम की एक दुर्लभ निशानी समाप्त होगी बल्कि भारत को काफी नुकसान भी होगा। जैसा कि श्रीराम और श्रीराम सेतु के अस्तित्व को लेकर कुछ ओछी मानसिकता वाले वोटों के भूखे राजनेता बयान बाजी कर रहे हैं, विश्व भर के हिन्दुओं की भावना आहत होना स्वाभाविक ही है। यदि श्रीराम को भगवान एंव श्रीराम सेतु को उनके द्वारा निर्मित न मानने वालों की ही मानें तो भी इस परियोजना में भारत सरकार को कितना नुकसान होगा इसका अन्दाज इस परियोजना को प्रारम्भ करने से न पूर्व में सोचा गया न किसी ने इस दिशा में कोई कदम उठाने का प्रयत्न किया।

बारह मीटर गहरे, 48 किमी. लम्बे व तीन किमी. चौडे श्रीराम सेतु को तोडकर सन् 2008 तक नहर का काम पूरा कराने वालों ने यह नहीं सोचा कि इससे सुनामी के खतरे को हम मोल ले रहे हैं, थोरियम के विश्व के सबसे बडे भण्डार को नष्ट किया जा रहा है तथा क्षेत्र में विद्यमान 3300 समुद्री वनस्पतियों व लगभग 450 प्रकार के समुद्री जीव जन्तुओं के जीवन के साथ-साथ जो लाखों मछुआरे इस क्षेत्र में अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं उनका क्या होगा।

अब यह देखते हैं कि इस परियोजना से जुडे महारथी इसके बारे में क्या कहते हैं। रामेश्वरम् से लगभग 666 किमी दूर चैन्नई स्थित एल एण्ड टी रामबोल नामक संस्था (जो इस परियोजना की इंजिनियंरिग सलाहकार है तथा जिसने इसके लिए वर्ष 2004 में एक रिर्पोट तैयार की थी) के टीम प्रमुख श्री टी. श्रीनिवासन को इस परियोजना की खामियों के बारे में बताते हुए पूछा गया कि क्या वाकई परियोजना से जहाजों के आवागमन में लगने वाले समय की बचत हो पायेगी, तो श्री श्रीनिवासन के चेहरे पर विस्मयकारी चुप्पी थी। इन्फ्रास्ट्रक्चर अर्थशास्त्री श्री जेकब जौन के अनुसार जो समुद्री जहाज कन्याकुमारी एवं तूतीकोरिन से चलेंगें उनके बारे में जो समय की बचत का अनुमान मै. एल एण्ड टी रामबोल रिर्पोट में लगाये गये है वे बहुत बढ़चढ़ कर बनाये गये आंकडे हैं, जो वास्तविकता से परे हैं। उनके अनुसार ''यूरोप व अफ्रीका से आने वाले जहाज कभी इन बन्दरगाहों पर नहीं जाते तो उतना समय कहां बच पायेगा'' यह बात बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि परियोजना के कुल खर्च का 60 प्रतिशत से अधिक भाग विदेशी समुद्री जहाजों से मिलने का अनुमान लगाया गया है। सेतुसमुद्रम् कोर्पोरेशन लि. के अधीक्षक अभियन्ता श्री मैनिक्कम से जब यह पूछा गया कि क्या किसी देशी या विदेशी जहाजरानी कम्पनी से पूछा गया है कि इस परियोजना के पूरा होने पर आप अपने जहाज इस 'छोटे' रास्ते से ले जाओगे? तो उन्होनें अपना पल्ला झाडते हुए कहा कि ''मै ड्रैजिंग कार्पोरेशन आंफ इण्डिया इस कार्य को देखते हैं''।

समुद्री मामलों के अर्थशास्त्री एवं रिसर्च एण्ड इंफोरमेशन सिस्टम फौर डवलपिंग कन्ट्रीज के एशोसिएट फैलो श्री प्रवीर डे के अनुसार परियोजना में बचने वाले समय को गलत तरीके से आंका गया है। क्योंकि जब बडे समुद्री जहाज इस नहर में से होकर गुजरेंगें तो उनकी गति बहुत धीमी हो जायेगी तथा वहां पर विशेष तौर से इसके लिए प्रशिक्षित पाइलटों की आवश्यकता पडेगी। इस कारण कोई भी जहाज इस रास्ते से जाना पसन्द नहीं करेगा।

सेवा निवृत्त नौ सेना कैप्टेन एच बाला कृष्णन के अनुसार 'परियोजना के दस्तावेजों के अनुसार 32,000 डी डब्ल्यू टी (डेड वेट टोनेज) भार क्षमता के जहाज ही इस नहर से निकल सकेंगे जबकि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को देखें तो 60,000 से अधिक क्षमता के जहाज भी बहुतायत में हैं जो कि इस क्षेत्र से नहीं गुजर सकेंगे'। अर्थात् कोई भी बडा जहाज इस नहर से नहीं जा सकेगा। श्री वी.एम.वैन्द्रे जो कि पुणे के पास सैन्ट्रल वाटर एण्ड पावर रिसर्च स्टेशन सीडब्ल्यूपीआरएस के निदेशक हैं, कहते हैं कि ऐसे प्रोजेक्ट को प्रारम्भ करने से पूर्व हाईड्रोलिक माडल्स विभिन्न प्रकार के टैस्ट करने हेतु तैयार किये जाते हैं जो कि इस परियोजना के लिए नहीं किये गये।

आखिर इस परियोजना में लगने वाले 3000 करोड से अधिक रूपयों तथा विश्व में करोडों राम भक्तों की भावनाओं से खिलवाड करने के पीछे क्या मानसिकता है? शिंपिंग इंण्डस्ट्री को तो इससे कुछ मिलने वाला है नहीं क्यों कि न समय की बचत और न ही तेल की बचत होगी। भला, कोई क्यों गली कूंचों में भटकना चाहेगा जब उसके पास हाइवे उपलब्ध है। जिस 'शौर्टकट' की बात सरकार कर रही है, वह महज एक दिखावा है। श्री प्रवीर डे कहते हैं ''यह सिर्फ राजनीति है, जो भारत को रामसेतु तोड़ने के लिए वाध्य कर रही है''। इससे कुछ लोगों का व्यक्तिगत लाभ तो हो सकता है किन्तु उससे होने वाली हानि सिर्फ एक देश को ही नही, पूरे विश्व को है। हो सकता है कि इस परियोजना के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ हो जो कि परमाणु ऊर्जा के प्रमुख श्रोत यूरेनियम के जनक थोरियम के विपुल भण्डार को सदा के लिए भारत से छीन कर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में हमें अपंगु बनाना चाहते हैं। यदि हम थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर बनाने का कार्य आरम्भ करते हैं तो आगामी लगभग तीन सदियों तक हम न खाडी के देशों पर निर्भर रहेंगे न अमेरिका के साथ परमाणु करार के लिए वाध्य होगें। साथ ही करोडों बेरोजगारों को अपने ही देश में काम मिल सकेगा तथा लोगों की आस्था के साथ भी खिलवाड़ रूक सकेगा ।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

पार्टी लाइन से अलग राह पकड़ते बुध्ददेव भट्टचार्य

लेखक- दीनानाथ मिश्र

पश्चिम बंगाल के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टचार्य ने कहा है कि ''मैं अंध-अमेरिका विरोध में विश्वास नहीं करता। समय के साथ हम बदलते हैं। हम अपनी सोच भी बदलते हैं। और अगर परिवर्तन करना लोगों के हित में है तो हम भी क्यों न बदलें?'' दिग्गज माक्र्सवादी नेता बुध्ददेव भट्टाचार्य के ये विचार बहुत महत्वपूर्ण हो जाते, जबकि पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत अमेरिका के प्रति धर्मान्ध विरोध पर अड़े हुए हैं।

यद्यपि बुध्ददेव का यह बयान अमेरिका से आणविक ईंधन से सम्बंधित समझौते के संदर्भ में नहीं है। मगर राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोग जानते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां और वाममोर्चा कठमुल्लों की तरह अमेरिका विरोधी विचार रखते रहे हैं। यह केवल परमाणु करार 123 से सम्बंधित हाल में आए घोर अमेरिका विरोधी बयान की बात नहीं है। शीत युध्द के दिनों में जब विश्व अमेरिका और रूस के दो ध्रुवों में टकराव देख रहा था तब से वामपंथियों के विचार सोवियत समर्थक और अमेरिका विरोधी रहे हैं। वह अमेरिका के लिए पूंजीवादी, साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी, नव उपनिवेशवादी जैसे शब्दों का प्रयोग करते रहे हैं। और इस समय जब माक्र्सवादी पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत ने अपनी पुरानी लाइन पर अड़े रहने वाले बयानों की झड़ी लगा रखी हो ऐसे में बुध्ददेव भट्टाचार्य का उक्त बयान कारत और पार्टी को चुनौती देने वाला भाषित होता है। इसलिए भी यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है।

पिछले दो-तीन महीनों से माक्र्सवादी पार्टी के अंदर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को परमाणु करार के सवाल पर गिराने या नहीं गिराने को लेकर बहस चल रही है। और कम्युनिस्ट पार्टियां इस सवाल पर सरकार को गिराने की गरम-नरम धमकियां देते रहे हैं। संयुक्त प्रगतिशील की जान अटकी हुई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कब तक बर्दाश्त करते। उन्होंने भी एक अवसर पर कह दिया कि समर्थन वापस लेना हो तो ले लें। देश में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल बन गया है। बाजार प्रभावित होने लगे। साथी दल चुनाव की तैयारी में लग गए। इससे समझा जा सकता है कि देश में राजनैतिक अस्थिरता किस धरातल पर पहुंच गई है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का बेड़ा राजनैतिक हिलोरों में अब डूबा, तब डूबा की हालत में पहुंच गया। ऐसे में बुध्ददेव भट्टाचार्य का यह बयान बहुत अहम अर्थ वाला हैं और यह पार्टी के भीतर उथल पुथल का भी द्योतक है।

पश्चिम बंगाल के ही पूर्व मुख्यमंत्री ज्योतिबसु सीधे-सीधे तो बुध्ददेव जैसी लाइन नहीं ली लेकिन वह इतना जरूर कहते रहे हैं कि मध्यावधि चुनाव नहीं होंगे। हमारी पार्टी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथ बातचीत करती रहेगी और कोई न कोई रास्ता निकलेगा। बुध्ददेव भट्टाचार्य का उक्त बयान अपने में एक गाली समेटे हुए है। अमेरिका विरोधवाद का, जिसको और कड़ी भाषा में कहा जाए तो कठमुल्लापन कह सकते हैं। जहां तक माक्र्सवादी पार्टी के वर्तमान नेतृत्व का सवाल है, प्रकाश कारत घनघोर और कट्टर विचारधारा के नेता माने जाते हैं। दूसरा संयोग यह है कि माक्र्सवादी पार्टी पर आज केरल का गु्रप हॉवी है। इसे समझने के लिए माक्र्सवादी पार्टी के नीति नियामक निकायों को समझना होगा। सर्वोच्च निकाय 17 सदस्यी पोलित ब्यूरो है। और दूसरी निकाय केन्द्रीय समिति है। इसमें 79 सदस्य होते हैं। पोलित ब्यूरो में 17 में से 5 सदस्य पश्चिम बंगाल के थे। उसमें पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव अनिल विश्वास और सीटू के महासचिव चित्रव्रत मजुमदार का निधन हो गया। पश्चिम बंगाल के प्रभावी सदस्यता 5 से घटकर तीन हो गई है। इसीलिए प्रकाश कारत पोलित ब्यूरो में अपना दबदबा बनाए हुए हैं। केरल का गु्रप हॉवी है। पोलित ब्यूरो में प्रकाश कारत की पत्नी बृंदा कारत भी हैं। अलबत्ता केन्द्रीय समिति में पश्चिम बंगाल के पन्द्रह-सोलह सदस्य हैं। मगर पोलित ब्यूरो सभी बड़े निर्णयों में निर्णायक होता है। इसी फैसले के कारण ज्योति बसु प्रधानतंत्री बनते-बनते रह गए थे। जिसे उन्होंने ऐतिहासिक भूल बताया था। इसी निकाय की भूल के कारण संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में माक्र्सवादी पार्टी और वाममोर्चा सरकार में सम्मिलित नहीं हुए थे।

पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत ने जिस दिन केन्द्रीय सरकार को भारत-अमेरिका समझौते के 6 महीने के लिए टालने का सुझाव दिया, उसके दूसरे दिन ही ज्योति बसु की यह नसीहत आना कि अंध अमेरिका विरोधवाद के वह कायल नहीं हैं। भले ही वह अपने बारे में कह रहे थे। लेकिन वह न केवल एक महत्वपूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री हैं बल्कि पोलित ब्यूरो के सदस्य भी हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसका विषय अमेरिका के प्रति रूख ही है जो अमेरिका पार्टी की निगाह में शत्रु रहा है। इस अमेरिका विरोधी नीति पद से पार्टी अपने पूरे इतिहास में कभी विचलित नहीं हुई। बुध्ददेव भट्टाचार्य के इस बयान के गर्भ में गम्भीर परिवर्तन के संकेत हैं अमेरिका के साथ परमाणु करार के प्रबल विरोध का एक कारण तो अमेरिका के प्रति पार्टी का परम्परागत रवैया रहा है।

मगर दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण कारण चीन परस्ती भी रहा है। कम्युनिस्ट पार्टियां हमेशा राष्ट्रहित के बजाए अन्तर्राष्ट्रीय नजरिए से सोचती नहीं हैं। उनके लिए राष्ट्रयी हित गौण है। और अन्तर्राष्ट्रीय कम्युनिज्म मे हित प्रमुख हैं। आज कम्युनिस्ट विश्व का नेता निसंदेह चीन है। और जहां तक माक्र्सवादी पार्टी का सवाल है उसका चीन से जुड़ाव जन्मजात है। इसी सवाल पर पार्टी टूटी थी। सोवियत संघ के समर्थक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अलग हो गई है और चीन समर्थित माक्र्सवादी पार्टी अलग हो गई। चीन ने भारत पर हमला किया था तो माक्र्सवादी नताओं के प्रभाव में ही पार्टी ने चीन को हमलावर मानने से इनकार किया और भारत को ही हमलावर बताया। पिछले महीने से चीन के अरूणाचल पर दावे की चर्चा चलती रही है। चीनी सरकार के प्रतिनिधि भारत आकर खुलकर यह सवाल खड़ा करते रहे हैं। अभी कुछ महीने पहले ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में माक्र्सवादी पार्टी के छात्र संगठन ने प्रकारांतर से अरूणाचल पर चीनी दावे को सही बताया। आज जब परमाणु करार पर टकराव की स्थिति पैदा हुई है तो उसकी पृष्ठभूमि में भी पार्टी की चीनपरस्ती ही बोल रही है। अब जरा हम बुध्ददेव भट्टाचार्य के बयान को फिर से एक बार देखें। वह कहते हैं- समय बदलता है, सोच बदलती है, नीतियां बदलती हैं, तो हम क्याें न बदलें? उन्होंने यह भी कहा कि हमें अमेरिकी निवेश की शिक्षा आईटी आदि क्षेत्रों में जरूरत है।

यह स्मरणीय है कि पश्चिम बंगाल के उद्योग सचिव पश्चिम बंगाल में निवेश के लिए अमेरिकी यात्रा कर रहे थे। उन्होंने तर्क देते हुए यहां तक कह दिया कि आज वियतनाम जैसा कम्युनिस्ट देश भी अमेरिकी मदद ले रहा है। हालांकि तर्क पश्चिम बंगाल के आर्थिक हित का दिया गया। लेकिन स्थानीय हित को अन्तर्राष्ट्रीय हित के ऊपर महत्व दिया गया है। यह रास्ता प्रदेश से राष्ट्रीय हित की ओर जाता है। और इसीलिए मैं कहता हूं कि माक्र्सवादी पार्टी में गम्भीर मतभेद पनप रहे हैं। मैं उस तरह के मतभेदों की बात नहीं कर रहा जिससे माक्र्सवादी पार्टी की केरल इकाई गृहकलह में उलझी हुई है। एक तरफ मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंद हैं और दूसरी तरफ पिनरई विजयन हैं। दोनों का संघर्ष कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी हिंसक संघर्ष की नौबत आ जाना माक्र्सवादी पार्टी के लिए तो सोचनीय है ही। पार्टी महासचिव प्रकाश कारत ने दोनों पोलित ब्यूरो सदस्यों को अनुशासनहीनता के सवाल पर निलंवित कर दिया। भले ही केरल की इकाई के इन झगड़ों को नरमपंथी गरमपंथी या कोई और नाम क्यों न दिया जाए या कोई वैचारिक मुलम्मा क्यों न चढ़ाया जाए।

मूल में यह व्यक्तिवादी झगड़े हैं लेकिन बुध्ददेव भट्टाचार्य का बयान जिस बदलाव का संकेत दे रहा है यह माक्र्सवादी पार्टी की आधारभूत सोच को बदलने की दिशा में संकेत देता है। भले ही महासचिव बनकर प्रकाश कारत पार्टी के वैचारिक अधिष्ठान की कितनी ही कड़ाई से पहरेदारी करें, लेकिन पार्टी में एक गम्भीर विभाजन प्रवृति साफ साफ नजर आ रही है। क्योंकि बुध्ददेव भट्टाचार्य ने इस तरह के बयान पहली बार नहीं दिए हैं। पार्टी तो बीसियों साल तक सड़कों पर पूंजीवाद हाय-हाय, टाटा बिरला मुर्दाबाद, का नारा भी लगाया करती थी। लेकिन बुध्ददेव भट्टाचार्य उन्हीं टाटा, बिरला के लिऐ पलक पांवड़े बिछा दिए। आर्थिक सुधारों के लिए भी तरफदारी की। जिसका केन्द्रीय स्तर पर आज भी पार्टी जमकर विरोध कर रही है। या तो नन्दीग्राम और सिंगूर की घटनाओं के कारण बुध्ददेव भट्टाचार्य उस दिशा में सरपट नहीं दौड़ सके। लेकिन आज भी वह जुटे हुए जरूर हैं। पार्टी अपनी लकीर के फकीर की नीति के कारण चीन-परस्ती की लाइन लेकर भारत अमेरिकी करार पर तरह तरह के तर्कजाल बुन रही है।

विश्व पटल पर अगर हम देखें चाहे बड़ी शक्ति हो या छोटी शक्ति, सब अपने राष्ट्रीय हित की तरफ बढ़ रहे हैं। अबने वर्चस्व की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। वर्चस्व की लड़ाई में अमेरिका सबसे आगे है। चीन भी अमेरिका की तरह एक ध्रुव बन कर उभरना चाहता है। भारत के चारों तरफ नाकेबंदी को मजबूत करता रहा है। यहां तक कि रूस सोवियत संघ के ध्वस्त होने के बावजूद झटके से उबरने की कोशिश कर रहा है। बदलते परिदृश्य में भारत के राष्ट्रीय हितों की मांग है कि हित रक्षा करते हुए चीन के बढ़ते खतरों से सचेत रहें और इसीलिए माक्र्सवादी पार्टी की तरह राष्ट्रवादी खेमे में अंध-अमेरिकी विरोध वाला रास्ता नहीं अपनाया। बल्कि सावधानी रखते हुए अमेरिका की तरफ भी हाथ बढ़ाया। कदाचित बुध्ददेव भट्टाचार्य की भी यही मंशा हो। लेकिन उनकी इकलौती मंशा से क्या होता है? अभी तो प्रकाश कारत जैसे कठमुल्लों का पार्टी में बोलबाला है।

Tuesday, September 25, 2007

आतंकवाद से लड़ने का हमारा मनोबल न्यूनतम

लेखक-हरिकृष्ण निगम

हाल की राष्ट्रसंघ की एक गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार भारत की देश के अंदर फैले आतंकवाद से लड़ने की क्षमता आज न्यूनतम है क्योंकि देश की सरकार की इस विकट समस्या से जूझने की न तो कोई सुनियोजित रणनीति है और न ही मनोबल।

यह खुलासा राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद द्वारा गठित आतंकवाद विरोधी समिति की एक गोपनीय रिपोर्ट के प्रारूप द्वारा हाल में किया गया है, जो किसी को भी चौंका सकता है। हमारे देश में आतंकवादियों द्वारा पिछले लगभग 15 वर्षों में लाखों जानें ली जा चुकी हैं पर ऐसा लगता है कि भारतीयों के जीवन का कोई मूल्य नहीं है। न तो सरकार में दृढ़ता है और न ही न्यायिक प्रक्रिया त्वरित निर्णय लेने के अनुरूप है और न ही अधिकांश राजनीतिक दलों के नेता इस विषय को गंभीरता से ले सके हैं। यह भी आरोप लगाया गया है कि हमारा सरकारी ढांचा या शासनतंत्र देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए कोई प्रभावी व दूरगामी नीति नहीं बना सका है। औरतों और देश के मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी हर आतंकवादी हादसे के बाद इन अपराधों के शिकार हुए लोगों या उनके परिवार से सहानुभूमि दिखाने के स्थान पर आतंकवादियों के मानवाधिकार का मुखर समर्थन ही नहीं उन्हें महिमामण्डित भी करता है। साफ है कि आतंकवाद की जड़ों की तलाश के बहाने आतंकवादियों का खुलकर पक्ष लिया जाता है।

स्पष्ट है कि आज हमारी सरकार की आतंकवाद से लड़ने की नाकामी ने हमें 'सॉफ्ट स्टेट' या पूरी व्यवस्था को 'पिलपिला और अक्षम' बना दिया है। मज़े की बात है कि उपर्युक्त रिपोर्ट इसी जुलाई 2007 में भारत सरकार को सौंपी जा चुकी है।

यदि देश में आतंकवादी हमलों में मरने वालों की संख्या पर ही जाएं तो विश्व के रंगमंच पर भारत ही ऐसा देश है जो आतंकवाद का पहले नंबर का सबसे बड़ा क्षेत्र है। एक अनुमान के अनुसार जम्मू कश्मीर सहित देश में पिछले कुछ वर्षों में 70,000 लोग मारे जा चुके हैं और इतने ही हताहत हो चुके हैं। हम भूल रहे हैं कि जब मुंबई में 1992 में बम विस्फोटों की श्रृंखला को अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के साथ-साथ दुनिया भर के विख्यात जोखिम प्रबंधन के विश्लेषकों ने इसे तब तक का 'सर्वाधिक भयावह-निर्मित शहरी आतंकवादी हादसे की संज्ञा दी थी।'

आज राष्ट्रसंघ की 'काऊंटर टेरिरिज्म कमेटी' 9/11 के विमानों द्वारा आत्मघाती बमबारों द्वारा न्यूयार्क के विश्वव्यापार केन्द्र को ध्वस्त करने के बाद से हर तिमाही दुनिया की स्थिति की पुनर्वीक्षा करती है। हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि चाहे राष्ट्रप्रेमी बुध्दिजीवी हों, सुरक्षा विशेषज्ञ हों या सुरक्षा एजेंसियाँ उनका मनोबल तोड़ने के लिए उन्हें कथित सेकुलरवादी 'दक्षिणपंथी' या 'अल्पसंख्यक विरोधी' कहकर हतोत्साहित करने की कोशिश करते हैं। हमारी सरकार व मीडिया के एक बड़े वर्ग की यह आपराधिक नादानी लगती है।

हमारे कानूनों की प्रक्रिया भी ऐसी है कि आतंकवादी हादसों के आरोपियों को सजा दिलवाने में 15-20 वर्ष भी लग जाते हैं। हमारी आज स्थिति है कि राष्ट्रसंघ की समितियाँ कई बार कह चुकी हैं कि आतंकवादियों को घर व अन्य संसाधन मुहैया कराने वालों को नियंत्रित करने में भारत के कानून सक्षम नहीं है। राष्ट्रसंघ का एक चर्चित संकल्प क्र. 1373 जो 9/11 के हादसे के बाद आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए पारित हुआ था और सभी सदस्य देशों पर लागू है हमारे देश में अनदेखा कर दिया गया। राष्ट्रसंघ की समिति ने दो टूक शब्दों में कहा है-भारत में आतंकवादियों को अनेक अनौपचारिक श्रोतों से धन मिल रहा है, जो चाहे 'हवाला' की चैनल हों, जाली भारतीय करेंसी नोटों का बड़े स्तर पर लाना हो या नशीले पदार्थों की तस्करी हो। पर यह चिंता का विषय है कि भारत सरकार के पास इस पर रोक लगाने की कोई प्रभावी नीति नहीं है।

हमारे देश में वर्तमान कानूनों को लागू कराने की भी कोई सन्नध्दता या तैयारी नहीं है क्योंकि अधिकांश राजनेता भ्रष्ट भी हैं और उनमें आतंकवाद से न तो लड़ने का इरादा है और न ही साहस। सिर्फ ऊपरी दिखावे के लिए वे घड़ियाली आंसू बहाते हैं और अपने वोट बैंक को संवारने के लिए सेकुलरवादी ढोंग रचते हैं। यद्यपि यह भी सच है कि हम पश्चिमी देशों व अमेरिका की तरह हिंसा, अपराध, मादक व द्रव्यों की तस्करी व आतंकवाद के कारण से जांच के घेरे में आए लोगों का जातीय या धार्मिक वर्गीकरण नहीं कर सकते, पर निष्पक्ष व असंप्रक्त होकर ऐसे तत्वों का 'डेटाबेस ' तैयार करना भी विषाक्त राजनीतिक माहौल या तुष्टीकरण की नीति के कारण संभव नहीं है। राष्ट्रसंघ ने यह भी स्पष्ट कहा है कि समिति की रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र की खुफिया एजेंसियों या सुरक्षा संगठनाें के काम में राज्य सरकारों या पूर्वाग्रह युक्त मंत्रियों द्वारा अनपेक्षित हस्तक्षेप करना आम बात है। यदि राज्य सरकार के प्रभावशाली नेताओं में ही अपने वोट बैंक के कारण दुराग्रही दृष्टि होगी तो आंतरिक सुरक्षा-होमलैण्ड सिक्यूरिटी की बात भी एक मखौल बन सकती है। इसी रिपोर्ट के अनुसार चाहे नेपाल हो या बंगलादेश बाहरी नागरिकों का देश में अवैध प्रवेश या मानव तस्करी भारत में आम बात है और उनको यदा कदा राजनीतिक संरक्षण भी मिलता है जो देश के लिए घातक सिध्द हो सकता है। आज भी देश में प्रवेश करने वाले लोगों की गुमशुदगी, चोरी गए अथवा खोए हुए पासपोर्टों की वर्तमान उपलब्ध सूचनाएं 'इंटरपोल' तक पहुंचाने का कोई प्रावधान नहीं है। देश में कोई ऐसा कानून नहीं है जिससे 'इलेक्ट्रॉनिक सर्विलेंस' को गुप्त रखा जा सके और किसी भी कार्यक्रम जो सुरक्षा एजेंसियां चलाती हैं उसकी गोपनीयता बरकरार रखी जा सके। आतंकवाद संबंधी समस्या अधिनियम बहुत पुराने हैं और उनमें कोई दम नहीं है। समग्र व प्रभावी तात्कालिक रणनीति के अभाव में देश की 15,100 किमी लंबी जमीनी सीमा और 7500 किलोमीटर की समुद्र तटीय क्षेत्र हमारी लापरवाही के कारण असुरक्षित हैं। आज के 76 सीमावर्ती क्षेत्रों की चौकियों में मात्र 33 ऐसी हैं जहाँ कम्प्यूटरों का प्रयोग होता है और यह स्थिति आतंकवादियों के लिए खुला आमंत्रण है।

चाहे नक्सलवादी हिंसा हो या आतंकवादियों की घुसपैठ यदि हमारी स्वयं की दृष्टि व प्रकृति शुतुर्मुगी हो तब इस देश की रक्षा करना मुश्किल है। बिहार में तो अब तक माओ कम्युनिस्ट सेंटर जैसी देशद्रोही सत्तारूढ़ राजद सरकार की सहयोगी पार्टी थी। आंध्र में कई बार स्वयं राज्य सरकार युध्द विराम के नाम पर स्थानीय अवैधानिक तत्वों से वार्ता करती थी। उसके ऊपर सशक्त पर दिशाहीन अंग्रेजी मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा आतंकवादियों के लिए मानवाधिकार के नाम पर अपने पृष्ठ खोल देना आज सुरक्षा को ध्वस्त करने वाला घातक कदम सिध्द हो सकता है। कश्मीर से हिन्दुओं का पलायन, उत्तरपूर्व में क्षत-विक्षत होते हुए मानचित्र के बावजूद तावांग को देने का समर्थन, हर आतंकवादी हादसे में, घर में छिपे दुश्मनों को पहचानने की जगह मात्र मिनटों में पाकिस्तान को दोष देने की घोषणाएं यह सब हमारे कथित बुध्दिजीवियों की धोखाधड़ी को कई बार सिध्द कर चुका है।

आज विश्वस्तर पर अनेक देश जो कर रहे हैं वह हमें भी करना होगा। चाहे, बाली हो या मेड्रिड, लंदन हो या जर्मनी व डेनमार्क के कुछ शहर, वहां भी आतंकवादी हादसों के बाद जो कदम लिए गए वैसा ही हमें करना होगा। क्या अमेरिका, इंग्लैण्ड' आस्ट्रेलिया, स्पेन और फ्रांस परिपक्व प्रजातंत्र नहीं है? अपने लोकतंत्र की रक्षा व नागरिकों की सुरक्षा के लिए यदि वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? इन सभी देशों से अधिक मरने वालों की संख्या भारत में रही हैं, पर हमारे राजनीतिज्ञ हमें सुलाये रखने की कला में माहिर हैं? जो इनके विरूध्द आवाज उठाता है उसे वे 'साम्प्रदायिक' या 'दक्षिणपंथी' कहकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। आज हमें अपनी प्राथमिकताएं बदलकर ऐसे देशविरोधियों का पर्दाफाश करना जरूरी है जो एक 'वृंदवादन' के रूप में नकली सेकुलरिज्म की आड़ में देश को तोड़ने वालों की साजिश में जाने-अनजाने मोहरे बने हुए हैं।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Monday, September 24, 2007

एकात्ममानव दर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय : समन्वय नंद


आज (25 सितंबर, 2007) दीनदयाल जयंती है। पं दीनदयाल उपाध्याय महान चिंतक और संगठक थे। वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्ममानव दर्शन जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी। प्रस्तुत है उनके विचारों पर आधारित एक प्रेरणास्पद लेख :

जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय का स्थान भारतीय चिंतन परंपरा में काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय चिंतन परंपरा में उनकी महत्ता इसलिए है कि उन्होंने पश्चिम के खंडित दर्शन के स्थान पर भारतीय जीवन पध्दति में समाहित एकात्म मानववाद के दर्शन को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विकास की अवधारणा पश्चिमी अवधारणा से बिलकुल विपरीत है। इतना तो सब मानते हैं कि मानव जीवन के समस्त क्रियाकलापों का उद्देश्य सुख की प्राप्ति है और मानव के यह क्रियाकलाप ही उसके विकास का रास्ता है। पश्चिम के लोग और शायद हमारे देश के नीति निर्धारक भी यह मानते हैं कि जहां ज्यादा उपभोग होते हैं वहां ज्यादा सुख होता है और वही विकास की प्रतीक होता है। परंतु पंडित दीनदयाल उपाध्याय उपभोग या सुख को विकास का पर्याय नहीं मानते थे। वे इसके लिए एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया करते थे। वह कहते थे कि व्यक्ति को गुलाब जामुन खाना अच्छा लगता है। व्यक्ति को लगता है कि गुलाब जामुन खाने से सुख प्राप्त हो रहा है। कई वह व्यक्ति सचमुच यह मान लेता है कि गुलाब जामुन में ही सुख है। गुलाम जामुन का उपभोग करने से ही सुख प्राप्त होता है। लेकिन मान लीजिये कि जब व्यक्ति गुलाब जामुन खा रहा हो तो उसके पास उसके किसी परिजन के देहांत की खबर आ जाए। तब व्यक्ति भी वही रहेगा और उसके हाथ में वही गुलाब जामुन रहेगा लेकिन सुख उसके पास नहीं होगा। अगर गुलाब जामुन में ही सुख है तो फिर उस समय भी व्यक्ति को सुख प्राप्त होना चाहिए था। लेकिन ऐसा होता नहीं है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि मन की स्थिति ही सुख की अवधारक है। मन पर नियंत्रण ही वास्तविक विकास है। वह स्पष्ट तौर पर कहते थे कि उपभोग के विकास का रास्ता राक्षसत्व की और जाता है और मन को नियंत्रित करने का विकास का रास्ता देवत्व की ओर जाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस देवत्व के रास्ते का अनुसंधान कर रहे थे । परंतु यह ठीक है कि यह नया रास्ता नहीं था। भारतीय साधु संत तथा सामान्य जन हजारों-हजारों वर्षों से इसकी साधना कर रहे थे । महात्मा गांधी भी एक सीमा तक उपभोग के खिलाफ थे ।

मनुष्य की जितनी भौतिक आवश्यकताएं हैं उनकी पूर्ति का महत्व को भारतीय चिंतन ने स्वीकार किया है, परंतु उसे सर्वस्व नहीं माना। मनुष्य के शरीर, मन, बुध्दि और आत्मा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए और उसकी इच्छाओं व कामनाओं की संतुष्टि और उसके सर्वांगीण विकास के लिए भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थ चतुष्टय की जो अवधारणा है पंडित दीनदयाल उपाध्याय उसे आज के युग में भारत के समग्र विकास का मूल आधार मानते थे । पुरुषार्थ के यह चार अवधारणाएं है- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। पुरुषार्थ का अर्थ है उन कर्मों से है जिनसे पुरुषत्व र्साथक हो। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की कामना मनुष्य में स्वाभविक होती है और उनके पालन से उसको आनंद प्राप्त होता है।

जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि मनुष्य की भौतिक आवश्यकता व अन्य आवश्यकताओं को पश्चिम की दृष्टि में सुख माना गया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार अर्थ और काम पर धर्म का नियंत्रण रखना जरुरी है और धर्म के नियंत्रण से ही मोक्ष पुरुषार्थ प्राप्त हो सकता है। यद्यपि भारतीय संस्कृति में मोक्ष को परम पुरुषार्थ माना गया है. तो भी अकेले उसके लिए प्रयत्न करने से मनुष्य का कल्याण नहीं होता। वास्तव में अन्य पुरुषार्थ की अवहेलना करने वाला कभी मोक्ष का अधिकारी नहीं हो सकता।

इसी प्रकार धर्म आधारभूत पुरुषार्थ है लेकिन तीन अन्य पुरुषार्थ एक दूसरे के पूरक व पोषक हैं। यदि व्यापार भी करना है तो मनुष्य को सदाचरण, संयम, त्याग, तपस्या, अक्रोध, क्षमा, धृति, सत्य आदि धर्म के विभिन्न लक्षणों का निर्वाह करना पडेगा। बिना इन गुणों के पैसा कमाया नहीं जा सकता। व्यापार करने वाले पश्चिम के लोगों ने कहा कि आनेस्टी इज द बेस्ट पालीसी अर्थात सत्य निष्ठा ही श्रेष्ठ नीति है। भारतीय चिंतन के अनुसार आनेस्टी इज नट ए पालीसी बट प्रिसिंपल अर्थात सत्यनिष्ठा हमारे लिए नीति नहीं है बल्कि सिध्दांत है। यही धर्म है और अर्थ और काम का पुरुषार्थ धर्म के आधार पर चलता है। राज्य का आधार भी हमने धर्म को ही माना है। अकेली दंडनीति राज्य को नहीं चला सकती। समाज में धर्म न हो तो दंड नहीं टिकेगा। काम पुरुषार्थ भी धर्म के सहारे सधता है। भोजन उपलब्ध होने पर कब, कहां, कितना कैसा उपयोग हो यह धर्म तय करेगा। अन्यथा रोगी यदि स्वस्थ्य व्यक्ति का भोजन करेगा स्वस्थ व्यक्ति ने रोगी का भोजन किया तो दोनों का अकल्याण होगा। मनुष्य की मनमानी रोकने को रोकने के लिए धर्म सहायक होता है और धर्म पर इन अर्थ और काम का नियंत्रण को सही माना गया है।

पंडित दीनदयाल जी के अनुसार धर्म महत्वपूर्ण है परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि अर्थ के अभाव में धर्म टिक नहीं पाता है। एक सुभाषित आता है- बुभुक्षित: किं न करोति पापं, क्षीणा जना: निष्करुणा: भवन्ति। अर्थात भूखा सब पाप कर सकता है। विश्वामित्र जैसे ऋषि ने भी भूख से पीडित हो कर शरीर धारण करने के लिए चांडाल के घर में चोरी कर के कुत्ते का जूठा मांस खा लिया था। हमारे यहां आदेश में कहा गया है कि अर्थ का अभाव नहीं होना चाहिए क्योंकि वह धर्म का द्योतक है। इसी तरह दंडनीति का अभाव अर्थात अराजकता भी धर्म के लिए हानिकारक है ।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार अर्थ का अभाव के समान अर्थ का प्रभाव भी धर्म का द्योतक होता है। जब व्यक्ति और समाज में अर्थ साधन न होकर साध्य बन जाएं तथा जीवन के सभी विभुतियां अर्थ से ही प्राप्त हों तो अर्थ का प्रभाव उ